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BBC Impact: महिला किसान ज्योति देशमुख के गांव को मंत्री ने लिया गोद
- Author, श्रीकांत बंगाले
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, मराठी सेवा
महाराष्ट्र के अकोला ज़िले के कट्यार गांव की ज्योति देशमुख के गांव को प्रदेश के महिला और बाल कल्याण राज्य मंत्री ने गोद ले लिया है.
12 साल पहले ज्योति के ससुर, पति और देवर ने खेती में हुए नुक़सान के कारण ख़ुदकुशी की थी. इसके बाद से वो ख़ुद खेती कर अपने परिवार का भरण पोषण कर रही हैं.
बीबीसी मराठी में उनकी कहानी प्रकाशित होने के बाद होने के बाद कई लोगों ने फ़ोन पर उनको बधाई दी. कई राजनीतिक दलों के नेता भी उनसे मुलाक़ात करने पहुंचे.
शुक्रवार सवेरे महाराष्ट्र के महिला और बाल कल्याण राज्य मंत्री बच्चु कड़ु ने ज्योति देशमुख का गांव गोद लेने की घोषणा की.
बच्चु कड़ु ने चार सितंबर को ज्योति देशमुख के घर जाकर उनका सम्मान किया और कहा, "घर चलाने वाले व्यक्ति ने ख़ुदकुशी की लेकिन उसके बावजूद ज्योति देशमुख इसकी मिसाल बनीं कि ज़िंदगी कैसे संवारते हैं. जब मैंने उन्हें ट्रैक्टर चलाते देखा तब मुझे लगा कि शायद हममें ही कुछ कमी है. ख़ुदकुशी कोई रास्ता नहीं है, हमें उससे आगे करे बारे में सोचकर जीवन बिताना चाहिए. ज्योति जी ने हमें जीना सिखाया है."
बच्चु कड़ु ने कहा, "कट्यार गांव हम खेती के लिए गोद लेंगे. अगले साल वहां खेती का कैसे विकास हो सकता है ये देखना हमारी ज़िम्मेदारी होगी. हम अपना सारा ध्यान और पैसा खेती पर ख़र्च करेंगे."
"एक मिसाल के तौर पर ये गांव कैसे बेहतर बन सकेगा इसके लिए हमारी पूरी कोशिश रहेगी. ज्योति देशमुख के नाम से ही इसके लिए एक योजना तैयार करेंगे."
ज्योति देशमुख ने बीबीसी से कहा कि ख़बर के छपने के बाद कई लोगों ने उनसे संपर्क किया है. वो कहती हैं, "मुझे नहीं पता था कि लोग मेरा वीडियो देखेंगे. इसलिए मैं बीबीसी का तहेदिल से शुक्रिया अदा करती हूं. ख़बर के बाद राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्ताओं ने मेरा सम्मान किया और मेरी परेशानी समझी."
गुरुवार को अकोला ज़िला राष्ट्रवादी कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने ज्योति देशमुख से मुलाक़ात की थी.
ज्योति देशमुख का सफ़र
ज्योति देशमुख के ससुर ने 2001 में अपनी जान ले ली थी. उनके देवर ने 2004 में और पति ने 2007 में ख़ुदकुशी कर ली थी.
ज्योति देशमुख कहती हैं, "मेरे घर में तीन लोगों ने ख़ुदकुशी की. 2007 में हमने पूरे खेत में मूंग की खेती की थी. उस साल बारिश बहुत ज़्यादा हुई और पूरी फसल खेत में ही सड़ गई. इसके कारण मेरे पति परेशान हो गए थे और उन्होंने ख़ुदकुशी कर ली."
ज्योति बताती हैं कि उन्हें खेतों के कामों का कुछ भी अनुभव नहीं था. पति की ख़ुदकुशी के बाद कई लोगों ने उन्हें ज़मीन बेचने की सलाह दी.
वो कहती हैं, "लोगों का कहना था कि औरत खेती कैसे कर सकती है. देशमुख खानदान की औरतों को खेती करना शोभा नहीं देता. खेती बेचकर आप अकोला ज़िले में चले जाइए. लेकिन मेरा छोटा बेटा मुझसे बोला कि मां अगर एक बार खेत बेच दिए तो फिर वो हमें वापिस नहीं मिलेंगे. इसके बाद मैंने खेती करने की ठान ली."
ज्योति कहती हैं कि इसके बाद उन्होंने धीरे-धीरे खेतों के सारे काम सीखे और मूंग के बदले पहले सोयाबीन बोने का फ़ैसला किया.
एक साल उनके खेत में सोयाबीन की बंपर खेती हुई जिसे देखकर गांव के सभी लोगों ने सोयाबीन बोना चालू कर दिया.
बीते बारह सालों से वो खुद 29 एकड़ की खेतों में खुद काम करती हैं. उन्होंने एक ट्रैक्टर ख़रीदा है और खेत में बोरवेल भी लगाया है.
उन्होंने अपने बेटे की पढ़ाई पूरी करवा कर उसे इंजीनियर बनाया है. उनका बेटा फ़िलहाल पुणे में नौकरी कर रहा है.
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ज्योति का कहना है कि खेती की वजह से उनके मन का ये डर ख़त्म हो गया कि लोग क्या कहेंगे, और अब वो रात को भी खेतों में काम कर सकती हैं.
वो कहती हैं कि जिन घरों में किसी किसान ने आत्महत्या की है उनके घरों की औरतों को अब लोगों की बातों की तरफ़ ध्यान न देते हुए खेतों में काम करने की शुरुआत करनी चाहिए.
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