कोरोना वायरस: लॉकडाउन में बढ़ रही है बच्चों की तस्करी और शादी

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- Author, दिव्या आर्य
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पंकज लाल का बेटा सिर्फ़ 13 साल का है. उसे एक दलाल के भरोसे, बिहार से सैकड़ों किलोमीटर दूर राजस्थान में चूड़ी की फ़ैक्ट्री में काम पर भेजने का फ़ैसला उन्होंने तब लिया जब लॉकडाउन के चार महीनों में उनका अपना ठेला चलाने का काम ना के बराबर रह गया.
फ़ोन पर मुझसे कहा कि घर में खाने को कुछ नहीं था, "भूखे पेट तीन बेटे और दो बेटियों का मुंह देखा नहीं गया, दलाल से कहा कि हमें काम दे दो पर उसने कहा बच्चे की उंगलियों के लायक़ ही काम है, बड़ों की कोई ज़रूरत नहीं."
जब मैंने पूछा कि डर नहीं लगा छोटे बेटे को भेजते हुए और उसने मना नहीं किया जाने से? तो पंकज फफक कर रो पड़े.
दलाल ने बेटे को काम सिखाने के बाद उन्हें महीने का 5,000 रुपए भेजने का वायदा किया था.
लॉकडाउन से जुड़ी आवाजाही पर लगी रोकटोक के बावजूद दलाल उनके बेटे समेत दो दर्जन लड़कों को एक लग्ज़री बस में बिहार से जयपुर तक, कई राज्यों के बॉर्डर पार करवाने में कामयाब रहा.
लेकिन चूड़ी की फ़ैक्ट्री पहुँचने से ठीक पहले बस जयपुर में पकड़ी गई. पंकज का बेटा अब वहां के बाल गृह में है. क्वारंटीन की मियाद पूरी होने के बाद बाक़ी बच्चों के साथ उसे घर पहुँचा दिया जाएगा.
पंकज ने कहा, "मुझसे भूल हो गई, दिमाग़ में तब बस आ गया तो भेज दिया, पर हमें ठोकर लग गई, अब कभी नहीं करेंगे, दो जून की रोटी खाएंगे पर बच्चे को बाहर नहीं भेजेंगे."
पंकज का मामला अब बाल सुधार समिति और स्थानीय ग़ैर-सरकारी संगठन, 'सेंटर डायरेक्ट' की नज़र में है ताकि वो दोबारा अपने किसी भी बच्चे को बाल मज़दूरी में धकेलने की कोशिश ना करें.
भारत में बाल मज़दूरी एक बड़ी समस्या है. 2011 की जनगणना के मुताबिक़ देश में पाँच से 14 साल की उम्र के क़रीब 26 करोड़ बच्चों में से एक करोड़ बाल मज़दूरी करने को मजबूर थे.
उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के बाद देश के सबसे ज़्यादा (4,51,590) बाल मज़दूर बिहार राज्य में थे.
लॉकडाउन और बाल तस्करी

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नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के मुताबिक़ बिहार में बाल तस्करी बहुत व्याप्त है, और साल 2018 में बिहार में लगभग रोज़ एक बच्चा तस्करों के चंगुल से छुड़ाया गया.
ग़रीबी और जागरूकता की कमी के चलते, बच्चों की तस्करी के व्यापार को पनपने के लिए मानो लॉकडाउन में अनुकूल परिस्थितियां मिल गई हैं.
सेंटर डायरेक्ट के सुरेश कुमार के मुताबिक़ तस्करी के मामले पिछले साल की तुलना में दोगुने हो गए हैं, "पिछले महीनों में ये बड़े पैमाने पर हुआ है, गांव के गांव ख़ाली हो गए हैं, ट्रेन नहीं तो बसें सही, तस्करों ने बच्चों को भगाने के नए रास्ते निकाल लिए हैं और छोटी-पतली उंगलियों के काम की माँग है तो बेरोज़गारी से परेशान मां-बाप उसकी पूर्ति के लिए बच्चे देने को तैयार हो जाते हैं".
लॉकडाउन से पहले भी राजस्थान की चूड़ी फ़ैक्ट्रियों में काम करने के लिए बिहार से बच्चों की तस्करी की जाती रही है. तस्करों को पकड़ना बड़ी चुनौती है और वो अक्सर जुर्माना देकर छूट जाते हैं.
पिछले सालों में सामाजिक कल्याण विभाग, श्रम विभाग, पुलिस और ग़ैर-सरकारी संगठनों के तालमेल से कुछ तस्करों की गिरफ़्तारी हुई है और तस्करी के मामलों में गिरावट भी दर्ज की गई है पर ये व्यापार ताक़त, पैसे और ज़रूरत के बल पर अब भी मज़बूत है.
सुरेश बताते हैं, "साल 2016 में बिहार से जयपुर बच्चों की तस्करी करनेवाला एक शख़्स पकड़ा गया और तीन साल बाद उसे उम्र क़ैद की सज़ा हुई, लेकिन उसके बाद शिकायत करनेवाला परिवार अग़वा कर लिया गया, ये दिखाता है कि तस्कर बहुत ताक़तवर होते हैं, उन्हें सुरक्षा हासिल है, और उनके जाल को तोड़ना बहुत मुश्किल."
17 घंटे काम, खाने को खिचड़ी

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तस्करी का अनुभव नवयुवक की ज़िंदगी पर गहरा असर छोड़ सकता है. बिहार का रहनेवाला 15 साल का मुकेश, जयपुर की चूड़ी फ़ैक्टरी में सात महीने काम करने के बाद मई में आख़िर अपने घर लौट पाया.
मुकेश ने बताया कि पिता को टीबी होने की वजह से वो खेतिहर मज़दूरी नहीं कर पा रहे थे और परिवार को महाजन का क़र्ज़ चुकाना था, जिस वजह से जब तस्कर उनके घर आया वो काम करने को तैयार हो गया. लेकिन ये फ़ैसला ग़लत था.
फ़ोन पर बातचीत में उसने कहा, "फ़ैक्ट्री में सुबह सात बजे से रात 12 बजे तक काम करना पड़ता था, खाने को सिर्फ़ खिचड़ी मिलती थी और बहुत सी गालियां, महीने का 2,500 रुपए देने का वायदा किया था पर 1,000 भी नहीं दिया, मैं अब ऐसे काम कभी नहीं करूंगा".
पंकज लाल के बेटे की ही तरह मुकेश भी तस्करों के चंगुल में फँसने से पहले स्कूल जाता था. उसके भी पाँच भाई-बहन हैं, पर इस वक़्त सब घर पर हैं.
दो छोटी बहनों की शादी 18 साल की उम्र से पहले कर दी गई है.
लॉकडाउन की वजह से बंद हुए स्कूल ऐसे ग़रीब परिवारों के बच्चों की ज़िंदगी को हमेशा के लिए बदल सकते हैं.
बाल विवाह पर युनीसेफ़ के एक विशेष प्रोग्राम में काम कर रहे अंतरराष्ट्रीय एनजीओ, ऐक्शन एड की स्मिता खानजाओ के मुताबिक़, "इस वक़्त की परिस्थितियों में ग़रीबी से जूझ रहे परिवारों में लड़कों को बाल मज़दूरी में धकेला जा रहा है और लड़कियों की शादी करवा दी जा रही है, लड़कियों को तो वैसे ही पढ़ाई नहीं करने दी जाती, एक बार स्कूल छूट जाए तो लौटना और मुश्किल हो जाता है".
13 की उम्र में हो जाती शादी

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बच्चों के ख़िलाफ़ अपराध जैसे बाल विवाह, बाल मज़दूरी, तस्करी इत्यादि पर सरकार द्वारा चिन्हित संस्था, 'चाइल्डलाइन', के आंकड़ों के मुताबिक़ लॉकडाउन में ढील देने के बाद बाल विवाह के मामलों में बढ़ोत्तरी हुई है.
जून और जुलाई 2019 के मुक़ाबले जून और जुलाई 2020 में 17 फ़ीसद ज़्यादा मामले सामने आए हैं. हालांकि वो ये भी बताते हैं लॉकडाउन से पहले जनवरी और फ़रवरी में भी साल 2019 के मुक़ाबले मामलों में 20 फ़ीसदी की बढ़ोत्तरी हुई.
ओडिशा की रानी आठवीं क्लास में पढ़ती थी जब लॉकडाउन हो गया. स्कूल बंद हो गया और घर में पिता टीबी की बीमारी से लड़ रहे थे. उन्होंने ही उस पर शादी का दबाव डाला.
शादी हो भी जाती पर रानी ने 'चाइल्डलाइन' को संपर्क किया और समय रहते सब रुकवा दिया. उसने अपनी एक सहेली की शादी ऐसे ही होती देखी थी और वो इससे बचना चाहती थी.
रानी के पिता की कुछ ही दिनों में मौत हो गई. वो अब भी लड़ाई लड़ रही है कि उसे बोझ ना समझा जाए बल्कि पढ़-लिख कर रोज़गार कमाने का मौक़ा दिया जाए.
फ़ोन पर बातचीत में मुझसे कहा, "अपने लिए ख़ुद कमा पाना बहुत ज़रूरी होता है, पता नहीं क्यों सबको लड़की की शादी की इतनी जल्दी होती है, अब तो पिता जी भी नहीं हैं, मैं कॉलेज तक पढ़ूंगी और घर चलाने में मदद करूंगी."
लॉकडाउन के दौरान बच्चियों की शादी के पीछे एक वजह ये भी है कि कई प्रवासी मर्द वापस गांव लौट आए हैं, लड़कियां स्कूल की जगह घर पर हैं जिससे परिवार उनकी सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं.
भाग कर कर ली शादी

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लेकिन सिर्फ़ परिवार ही शादी करवा रहे हों ऐसा भी नहीं है. कई मामलों में लड़कियां ख़ुद अपने अनिश्चित भविष्य को देखते हुए अपनी पसंद के लड़के के साथ शादी करने की कोशिश कर रही हैं.
जैसे ओडिशा की 14 साल की वनीता के साथ हुआ. 25 साल का एक आदमी जो ट्रक ड्राइवर का काम कर रहा था, अप्रैल में अपने गांव लौट आया और क्वारंटीन सेंटर में रह रहा था.
उसी दौरान दोनों में दोस्ती हुई और उन्होंने भागकर शादी करने की कोशिश की.
ऐक्शन एड के प्रियाब्रत सत्पथी बताते हैं कि ओडिशा के इस तटवर्ती इलाक़े में लड़कियों की जल्दी शादी का प्रचलन है.
वो कहते हैं, "कई लड़कियां सोचती हैं कि अगर हमें बोझ समझकर, पढ़ाई छुड़वाकर शादी किया जाना ही हमारी नियति है तो क्यों ना हम अपना मनपसंद साथी चुनें."
ग़रीब मछुआरे परिवार में पली बढ़ी वनीता की इस योजना की जानकारी मिलने पर स्थानीय पुलिस ने शादी रुकवा दी.

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पर मां-बाप ने वनीता को घर वापस लेने से मना कर दिया. उनके मुताबिक़ इस सबसे उनकी बेइज़्ज़ती हो गई थी, "बच्चों की शादी मां-बाप को ही तय करनी चाहिए, यही हमारी रीत रही है."
जब उनसे पूछा कि कम उम्र में शादी पर उनका क्या विचार है तो उन्हें उससे कोई परेशानी नहीं थी, "जब अच्छा रिश्ता आ जाए तब शादी कर देनी चाहिए, बस रिश्ता ठीक होना चाहिए."
पुलिस के दबाव में मां-बाप ने वनीता को घर में वापस ले लिया है और वनीता के मुताबिक़, उसका होने वाला पति उसके 18 साल के होने का चार साल लंबा इंतज़ार भी करने को तैयार है.
वनीता के गांव के सरपंच कहते हैं कि मां-बाप थोड़े पढ़े-लिखे हों तो बेटी को बोझ समझनेवाली मानसिकता उन पर इतना हावी ना हो और अपनी बेटियों को पढ़ाने पर पैसा ख़र्च करें तो वो भी इन रीत-रिवाजों के दबाव में ऐसे क़दम ना उठाएं.
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