बिहार की लड़कियों का सैनिटरी पैड बैंक जो कोरोना महामारी में भी नहीं हुआ बंद

सैनिटरी पैड

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    • Author, सीटू तिवारी
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

बिहार की राजनीति से 'जेपी' चले गए.

जेपी यानी लोकनायक जयप्रकाश नारायण. जेपी के 'चेलों' ने उनके मूल्य और आदर्श दोनों की बलि चढ़ा दी. लेकिन बिहार के अंदरूनी इलाक़ों में जेपी के बनाए आश्रम आज भी स्थानीय लोगों के जीवन में बदलाव ला रहे हैं.

1952 में जयप्रकाश नारायण ने नवादा के कौआकोल प्रखंड के शेखोदेवरा आश्रम स्थापित किया था.

127 किशोरी समूह, 27 सैनिटरी पैड बैंक

आज इसी आश्रम की कोशिशों से बिहार के नवादा ज़िले के रजौली और अकबरपुर प्रखंड में 127 किशोरी समूह बने हैं जिन्होंने 27 सैनिटरी पैड बैंक बनाए हैं. जिसमें पांच हज़ार से ज़्यादा किशोरियां जुड़ी हुई हैं.

रजौली प्रखंड के प्रखंड विकास पदाधिकारी प्रेम सागर मिश्रा ने बीबीसी से फ़ोन पर कहा, "गांव टोलों की किशोरियों द्वारा चलाया जा रहा ये बैंक अपने आप में अद्भुत है. समाज में सैनिटरी पैड को लेकर बहुत बड़ा टैबू है जिसे इन किशोरियों की ये पहलकदमी तोड़ रही है. बाकी प्रखंड में कई ऐसे इलाक़े, गांव हैं जहां तक पहुंचना मुश्किल है, लेकिन वहां भी ये लड़कियां सैनिटरी पैड पहुंचा रही हैं."

सैनिटरी पैड

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रजौली की बदलाव की कहानी

नवादा का रजौली प्रखंड पठारी, जंगली और नक्सल प्रभाव वाला इलाक़ा है.

ये बदलाव साल 2016 से शुरू होता है जब सर्वोदय आश्रम की संस्था ग्राम निर्माण मंडल ने पॉपुलेशन फ़ांउडेशन ऑफ़ इंडिया के साथ किशोरियों के बीच काम करना शुरू किया.

रजौली के हरदिया गांव की स्वीटी बताती हैं, "दीदी लोग आई तो हम लोगों के परिवार ने उनसे मिलने नहीं दिया. लेकिन वो लोग लगातार आती रहीं, जिसके बाद गांव वालों ने तय किया कि पहले लड़कियों की मां के साथ मीटिंग होगी. मां लोगों ने बेमन से अनुमति दे दी."

इसके बाद 13 से 19 साल की किशोरियों के समूह बनाए गए. इन समूहों ने बाल विवाह, माहवारी, किशोरियों के स्वास्थ्य और परिवार नियोजन पर खुद को केन्द्रित करके काम करना शुरू किया.

ग्याहरवीं की छात्रा स्वीटी बताती हैं कि किशोरी समूह में जुड़ने के बाद ही उन्होंने कपड़ा छोड़कर सैनिटरी पैड इस्तेमाल करना शुरू किया.

अपने जीवन के दूसरे बदलावों को भी बीबीसी के साथ साझा करते हुए उन्होंने बताया, "स्कूल भी अब अकेले चले जाते हैं. इससे पहले स्कूल जाने के लिए घर का या फिर आस-पड़ोस का कोई एक पुरुष साथ जाता था. अगर आप घर में इसका विरोध करते तो आपका स्कूल छुड़वा दिया जाता था."

मौसम बनी रोल मॉडल

मौसम कुमारी

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पूरे रजौली प्रखंड में किशोरियों के बीच बदलाव की रोल मॉडल 19 साल की मौसम कुमारी हैं. के.एल.एफ़ कॉलेज, नवादा की ग्रेजुएशन फर्स्ट ईयर की छात्रा मौसम ने सितंबर 2017 में सैनिटरी पैड बैंक का एक मॉडल विकसित किया.

उन्होंने अपने समूह 'एकता किशोरी समूह' से जुड़ी लड़कियों को रोज़ाना एक रुपये जमा करने को कहा. इस तरह महीने में 30 रुपये जमा होते और समूह की दो लड़कियां गांव से तीन किलोमीटर दूर रजौली बाज़ार जाकर सैनिटरी पैड ख़रीद कर लातीं.

ट्रक ड्राइवर छोटे लाल सिंह की बेटी मौसम बताती हैं, "पहली बार पैड ख़रीदने के बाद हमने दुकानदार से होलसेल रेट पर पैड मांगा, जिसके लिए वो राज़ी हो गए. इसके बाद हमने किशोरी समूह की सदस्य लड़कियों को होलसेल रेट पर देना शुरू किया. साथ ही गांव की भाभियों के लिए भी ये पैड लाना शुरू किया. लेकिन उन्हें ये पैड हमने थोड़े बढ़े हुए रेट पर दिए. ऐसे में जो किशोरी रुपये नहीं जमा कर पाती हैं, उसकी भी हम मदद कर पाते हैं."

ग्राम निर्माण मंडल के ब्लॉक प्रोजेक्ट कोऑर्डिनेटर भरत भूषण शर्मा बताते हैं, "जब हरदिया पंचायत के हरदिया गांव में ये मॉडल सफल रहा तो हम लोगों ने मौसम से अन्य किशोरी समूहों में ट्रेनिंग दिलवाई जिसके चलते आज 27 सैनिटरी पैड बैंक हैं, जो सिर्फ़ किशोरी समूहों को ही नहीं बल्कि गांव की महिलाओं को भी महावारी के दौरान मदद कर रहे हैं."

साधारण-सा है बैंक का इंफ्रास्ट्रक्चर

बैंक के इंफ्रास्ट्रक्चर के नाम पर इन किशोरी समूहों के पास सिर्फ़ एक रजिस्टर, रुपये जमा करने के लिए एक बक्सा और सैनिटरी पैड रखने के लिए एक कार्टन है.

समूह में अध्यक्ष या सचिव के पास ये सब सामान रहता है. किशोरी समूह की महीने में एक बार बैठक होती है जिसमें किशोरी के खाते में जमा राशि और ज़रूरत के हिसाब से पैड दिए जाते हैं.

सैनिटरी पैड का बैंक

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यदि गांव की किसी अन्य महिला को पैड की ज़रूरत है तो वो अध्यक्ष या सचिव के घर जाकर पैड की तय कीमत चुकाकर पैड ले लेती हैं. समूह को अनुदान के तौर पर कई स्वयं सहायता समूह या समय-समय पर आने वाले विज़िटर्स भी मदद करते रहते हैं.

समूह रोक रहा बाल विवाह, दिला रहा बीमारियों से मुक्ति

इन किशोरी समूह की बच्चियों ने अब तक 53 बाल विवाह रुकवाए हैं.

इसके अलावा माहवारी में गंदगी के कारण होने वाली बीमारियों से भी किशोरियों को मुक्ति मिल रही है.

राजकीय मध्य विद्यालय सुरैला की छात्रा सानिया बताती हैं, "पहले मैं कपड़ा इस्तेमाल करती थी जिसके चलते ल्यूकोरिया हो गया था. लेकिन बाद में जब से पैड इस्तेमाल करना शुरू किया तो बीमारी ठीक हो गई."

आलम ये रहा कि कई बच्चियों को इन किशोरी समूहों की जागरूकता ने बचाया. अनीता (बदला हुआ नाम) के पेट में दर्द रहता था. उसके पेट में सूजन थी और लगातार उल्टियों की भी शिकायत थी. नतीजा ये हुआ कि अनीता को समाज के साथ-साथ अपने माता-पिता के ताने भी सहने पड़ते थे.

मौसम बताती हैं, "उसके मां-बाप भी मान चुके थे कि वो प्रेगनेंट हैं. वो बहुत रोती रहती थी. हम लोगों ने उसे ढांढस बंधाया और डॉक्टर के पास ले गए. वो ठीक हो गई."

लड़कियों ने खुलवा लिया युवा क्लीनिक, लड़के भी उठा रहे फ़ायदे

इस प्रखंड में ग्राम निर्माण मंडल की कोशिशों से प्रशासनिक जवाबदेही बढ़ाने के लिए प्रत्येक 6 माह में जन सुनवाई होती है. इसमें प्रखंड स्तरीय अधिकारी लोगों के सामने आते हैं और लोग अपनी मांग रखते है.

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किशोरियों के साथ काम कर रही शीला कुमारी ने बीबीसी को बताया, "ये लड़कियां जो समूह में आने से पहले माहवारी, परिवार नियोजन के बारे में बात करने पर भाग जाती थीं, उन्हीं लड़कियों ने सबके सामने युवा क्लीनिक खोलने की मांग अधिकारियों के सामने रखी."

"ये लोग स्वास्थ्य मंत्री मंगल पाण्डेय के पास अपनी मांग लेकर गए, जिसके बाद रजौली अस्पताल में युवा क्लीनिक खुला. इसमें प्रत्येक मंगलवार को एक एएनएम और डॉक्टर बैठते हैं."

इस युवा क्लीनिक का फ़ायदा सिर्फ़ किशोरियां ही नहीं, बल्कि युवा लड़के भी उठा रहे हैं. 19 साल के आदित्य को जब शीघ्रपतन होना शुरू हुआ, तो वो बहुत 'असहज' हो गए.

बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने कहा, "समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें. फिर युवा क्लीनिक गए, काउंसलिंग हुई और ठीक हो गए. उसके बाद तो हमने अपने दोस्तों को भी बताया, जिसके बाद बहुत लड़के अपनी परेशानी लेकर वहां गए हैं."

लॉकडाउन में व्हाट्सऐप ग्रुप से बनी बात

इस इलाक़े में ज़्यादातर लोग खेती किसानी पर निर्भर हैं. रजौली जंगल में होने वाले उत्पाद और वहां से अभ्रक (स्थानीय भाषा में डीबरा) चुनकर ये लोग अपनी जीविका चलाते हैं. झारखंड-बिहार के बॉर्डर पर बसे रजौली में कई जगहों पर जाने के लिए आपको पहले झारखंड के कोडरमा स्टेशन जाना पड़ता है.

ऐसे में लॉकडाउन में स्थानीय लोगों का जीवन ख़ासतौर पर महिलाओं का जीवन कितना मुश्किल भरा होगा, इसका अंदाज़ा लगाया जा सकता है.

लॉकडाउन के दौरान किशोरी समूहों ने व्हाट्सऐप ग्रुप बनाकर अपनी गतिविधियां चालू रखीं. सैनिटरी पैड की ख़रीदारी से लेकर किशोरियों के बीच इसका वितरण और गांव की अन्य ज़रूरतमंद महिलाओं को देने का काम व्हाट्सऐप ग्रुप पर समन्वय के ज़रिए ही होता रहा.

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रजौली के डुमरकोल की लक्ष्मी देवी बताती हैं, "दुकान जा नहीं सकते थे तो यहीं बच्ची लोग पैड ले आईं. हम इनसे ख़रीद लिए, तो जान बची. अब कपड़ा इस्तेमाल करना अच्छा नहीं लगता."

सैनिटरी पैड ने इन किशोरियों के जीवन का दायरा भी बढ़ाया है. मौसम यूथ लीडर के तौर पर नई दिल्ली में आयोजित कई कार्यक्रमों में शिरकत कर चुकी हैं तो अन्य लड़कियां जिनकी दुनिया 'स्कूल से घर और घर से स्कूल ' तक ही थी, वो अब पटना सहित दूसरे शहरों की यात्रा कर चुकी हैं.

बीते कुछ सालों में सैनिटरी पैड राजनेताओं की शब्दावली और सरकारी नीतियों में शामिल हो गए हैं. फिर भी भारत के एक बड़े हिस्से की महिलाएं माहवारी और इससे जुड़ी मुश्किलों को आज भी झेल रही हैं.

मौसम, किशोरी समूह और जेपी का ये आश्रम इन मुश्किलातों को कम करने में छोटा ही सही लेकिन प्रभावी क़दम उठा रहा है.

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