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आरक्षण मामले में राज्यों को सब-कैटेगरी बनाने का अधिकार: सुप्रीम कोर्ट
आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट के गुरुवार के फ़ैसले ने शिक्षण संस्थानों और सरकारी नौकरियों में रिज़र्वेशन का मुद्दा फिर से बहस में ला दिया है.
देश की सबसे ऊंची अदालत ने कहा है कि आरक्षण का लाभ वैसे लोगों तक पहुंचाने के लिए जो अबतक इससे वंचित रह गए हैं रिज़र्वेशन लिस्ट में उप-वर्ग तैयार किया जा सकता है.
अदालत ने ये बात अनुसूचित जाति/जनजाति और आर्थिक-सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े (एसइबीसी) वर्गों के लिए कही है.
सुप्रीम कोर्ट ने ये बातें पंजाब सरकार बनाम दविंदर सिंह और अन्य और इससे जुड़े मुक़दमों की सुनवाई करते हुए कहीं.
अदालत का कहना था कि आरक्षण सूची में शामिल जातियों में से भी बहुत सारी ऐसी हैं जो रिज़र्वेशन का फ़ायदा नहीं उठा सकी हैं, जबकि कुछ इसकी वजह से आगे बढ़ गईं हैं इसलिए ज़रूरी है कि पीछे रह गए वर्ग को आरक्षण के भीतर ही एक सब-कैटेगरी बनाकर संविधान के इस प्रावधान का फ़ायदा पहुंचाया जाए.
मामले की सुनवाई करते हुए पाँच जजों की खंडपीठ ने कहा कि रिज़र्वेशन के मामले में पहले 2005 में सुनाए गए निर्णय को फिर से परखने की ज़रूरत है और उसके लिए न्यायधीशों की एक बड़ी खंडपीठ तैयार की जाए.
आंध्र प्रदेश हुकूमत बनाम इवी चिनैय्या केस की सुनवाई करते हुए अदालत ने कहा था कि राज्यों को ये अधिकार नहीं है कि वो अनुसूचित जातियों/जनजातियों की लिस्ट के भीतर एक उप-वर्ग (सब-लिस्ट) तैयार करे.
आरक्षण में कौन-कौन सी जातियों को शामिल किया जाएगा इसकी सूची राष्ट्रपति भवन से जारी होती है.
क्या है पूरा मामला
राज्य सरकारों का ये तर्क रहा है कि अनुसूचित जातियों में से बहुत सी ऐसी जातियां या वर्ग हैं जिन्हें आरक्षण का लाभ नहीं मिल पाया है, जिसकी वजह से ये लोग सामाजिक और आर्थिक तौर पर पिछड़े रह गए हैं इसलिए इस सुविधा को इनतक पहुंचाने के लिए विशेष प्रावधान किए जाने चाहिए.
इस असंगति को दूर करने के लिए कई राज्यों जैसे पंजाब, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडू वग़ैरह ने एससी कैटगरी में से एक/दो या उससे अधिक जातियों के लिए आरक्षण कोटे के कुछ फ़ीसद रिज़र्व कर दिए.
जैसे तमिलनाडू ने अनुसुचित जाति के कोटे में से तीन प्रतिशत अरुनधतियार नाम की एक जाति के लिए आरक्षित कर रखा है. राज्य सरकार द्वारा तैयार एक रिपोर्ट में ये सामने आया था कि हालांकि अरुनधियार जाति की जनसंख्या (एससी के भीतर) 16 प्रतिशत है लेकिन राज्य सरकार की नौकरियों में उनकी हिस्सेदारी महज़ 0-5 प्रतिशत तक सीमित है.
इसी तरह दशक भर पहले दक्षिणी राज्य आंध्र प्रदेश ने एससी लिस्ट में 57 नए उप-वर्गें की सूची तैयार की और इनको शैक्षणिक संस्थाओं और सरकारी नौकरियों में 15 प्रतिशत रिज़र्वेशन देने का फ़ैसला किया. ये 15 फ़ीसद एससी के लिए आरक्षित 27 फ़ीसद से आने थे.
लेकिन किसी ने आंध्र प्रदेश शासन के इस निर्णय को अदालत में चैलेंज कर दिया और कोर्ट ने कहा कि किसी राज्य को एससी/एसटी पर राष्ट्रपति की सूची में बदलाव का हक़ नहीं है इसलिए हुकूमत का ये फ़ैसला असंवैधानिक है.
पंजाब ने भी सब-कैटेगरी जिसे आम बोलचाल की भाषा में 'कोटा में कोटा' भी कहा जाता है, में बाल्मीकि और मज़हबी सिख समूह के लोगों को रखा था.
इसी मामले की सुनवाई गुरुवार को अदालत में हुई जिसमें अदालत ने कहा कि रिज़र्वेशन लिस्ट में उप-सूची बनाने का अधिकार राज्यों को है.
अब सवाल उठता है कि राष्ट्रपति की सूची क्या है जो वो एससी/एसटी पर जारी होती है?
हालांकि संविधान में अनुसुचित जाति/जनजाति को आरक्षण का अधिकार दिया गया है लेकिन इसकी सूची राष्ट्रपति के यहां तैयार होती है. उसकी कई वजहों में से एक ये भी है कि कई बार एक सूबे में एससी/एसटी वर्ग में गिनी जाने वाली जाति दूसरे में इसका हिस्सा नहीं हो सकती है.
इसी को लेकर अदालत ने पहले फ़ैसला दिया था कि राष्ट्रपति की सूची में बदलाव करने का हक़ राज्यों के पास नहीं है.
लेकिन अब अदालत ने कहा है कि इस मामले पर फिर से सुनवाई होनी चाहिए.
क्या रहा है राज्यों का तर्क?
राज्यों का तर्क है कि रिज़र्वेशन का प्रावधान करने की ज़रूरत इसलिए पड़ी क्योंकि कुछ वर्ग समाज में प्रचलित व्यवस्था की वजह से पिछड़े रह गए थे. ये पिछड़ापन शैक्षणिक और आर्थिक क्षेत्रों में भी सामने आता था.
लेकिन हुआ ये कि आरक्षण की व्यवस्था लागू होने पर कुछ लोग जो एससी/एसटी में दूसरों से बेहतर थे, इस प्रावधान का फ़ायदा उठाकर आगे निकल गए लेकिन दूसरे पीछे रह गए.
साधारण शब्दों में आरक्षित कैटेगरी में भी कुछ को इसका अधिक लाभ मिला जबकि उस वर्ग में से ही एक समूह पीछे रह गया.
इनको भी आगे ले जाने की ज़रूरत है इसलिए जितना प्रतिशत आरक्षण एससी को मिल रहा है उसमें से कमज़ोर तबक़ों के लिए कुछ कोटा मुक़र्रर कर दिया जाए ताकि पिछड़ गए वर्ग को भी प्रगति का अवसर हासिल हो सके.
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