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भारत की ये तस्वीरें उसकी बेबसी और लोगों की उपेक्षा की त्रासद कहानी है
- Author, नवीन सिंह खड़का
- पदनाम, पर्यावरण संवाददाता, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस
बिहार के मधुबनी में बाढ़ के कारण विस्थापित हज़ारों लोगों को आंचल कुमारी असहाय होकर देखती हैं.
सामाजिक संस्था ऑक्सफ़ैम के साथ वो राहत कार्य करती हैं. आपदा के दौरान प्रभावित लोगों को वो राहत सामग्री बाँटा करती हैं.
20 वर्षीय आंचल बीबीसी से कहती हैं, "इस बार हमारे पास लोगों को देने के लिए राहत सामग्री नहीं है क्योंकि वो वहां नहीं पहुंच पा रही हैं जहां पर इसकी ज़रूरत है. इसके कारण राहतकर्मी ख़ुद को असहाय महसूस कर रहे हैं."
"यहां पर लोग बेहद बुरी स्थिति में हैं और वे मुझसे पूछते हैं कि उन्हें मदद क्यों नहीं मिल रही है. मेरे पास कोई जवाब नहीं होता है."
हालिया मॉनसून में बिहार बाढ़ के कारण भारत का सबसे अधिक प्रभावित राज्य रहा है.
इसकी वजह से देश में 850 से अधिक लोगों की मौत हुई है जबकि लाखों लोग विस्थापित हुए हैं.
दक्षिण एशिया में 1300 लोगों की मौत
आंचल कुमारी कहती हैं, "चार हफ़्तों से भी अधिक समय से मेरे ज़िले में लोग बाढ़ के पानी से बचने के लिए हाइवे और ऊंची जगहों पर सो रहे हैं."
"और सिर्फ़ हमारा संगठन ही नहीं बल्कि इस स्थिति में कई और संगठन सक्रिय रहते रहे हैं लेकिन इस बार वे भी कुछ नहीं कर पा रहे हैं."
मानवीय सहायता समूहों का कहना है कि कोविड-19 के कारण लगी पाबंदियों की वजह से पूरे दक्षिण एशिया में मॉनसून के कारण आई बाढ़ और भूस्खलन में राहत कार्यों पर प्रभाव पड़ा है.
इस पूरे क्षेत्र में 1,300 से अधिक लोगों की मौत हुई है जबकि 2.5 करोड़ से अधिक लोग प्रभावित हुए हैं.
दक्षिण एशिया में मॉनसून की बारिश जून से सितंबर के बीच होती है जो हर साल कई लोगों के लिए भारी दुख लेकर आती है.
भारतीय मौसम विभाग के अनुसार, भारत के अधिकतर हिस्सों में अधिक बारिश हुई है, कई जगहों पर यह 60 फ़ीसदी तक है.
सहायता संगठन इंटरनेशनल फ़ेडरेशन ऑफ़ रेड क्रॉस (आईसीआरसी), इंडिया के प्रमुख उदय रेगमी कहते हैं, "सरकारी एजेंसियां, अंतरराष्ट्रीय-राष्ट्रीय ग़ैर सरकारी समूह कोशिश कर रहे हैं लेकिन राहत कार्य उस स्तर पर नहीं हो पा रहे हैं जैसे मॉनसून आपदाओं के बाद होते थे."
"लॉकडाउन और कोविड-19 के दूसरे प्रतिबंधों के कारण राहतकर्मी प्रभावित जगहों पर पहुंच नहीं पा रहे हैं. इसके अलावा कोविड-19 के कारण जो मूलभूत ढांचे जैसे कि शेल्टर हाउस जो प्रभावित लोगों के लिए इस्तेमाल किए जाते थे उन्हें क्वारंटीन सेंटर में बदला जा चुका है जिस कारण विस्थापित लोग इनसे महरूम हैं."
परिवहन की दिक़्क़तें
राहतकर्मियों का कहना है कि उनके लिए राहत सामग्री ले जाना एक दूसरी बड़ी चुनौती है.
ऑक्सफ़ैम इंडिया में प्रोग्राम्स हेड पंकज आनंद कहते हैं, "हमारी अधिकतर सामग्री गोदामों में रखी हुई है और अगर ऐसे गोदाम कंटेनमेंट ज़ोन्स में हैं तो वहां से यह सामग्री लाना और मुश्किल हो जाता है."
"अगर आप उसे लाने में सक्षम भी हो जाते हैं तो उसे एक जगह से दूसरी जगह ले जाना और बड़ी चुनौती है क्योंकि कई जगहों पर लॉकडाउन है तो कहीं कोविड-19 से जुड़ी दूसरी पाबंदियां हैं."
सभी राहत सामग्रियां बचाकर नहीं रखी जाती हैं बल्कि ज़रूरत पड़ने पर कुछ ख़रीदी भी जाती हैं लेकिन इस हालत में सप्लाई चेन भी टूटी हुई है. वेंडर्स सामान को हर वक़्त उपलब्ध भी नहीं करा पा रहे हैं.
आनंद कहते हैं, "इन सभी मुश्किलों के बाद अगर हम प्रभावित जगहों पर पहुंच भी जाएं तो हमें आइसोलेशन या क्वारंटीन सेंटर्स में रहने के लिए कहा जाएगा."
"हमें राहत कार्य के लिए 24 से 48 घंटों के अंदर ग्राउंड पर पहुंचना होता है लेकिन कोविड-19 की पाबंदियों के कारण यह रफ़्तार धीमी हो चुकी है और कई जगहों पर तो यह नामुमकिन है."
पुलिस और सरकारी एजेंसियों में कोई संवाद नहीं
नेपाल में कुछ सहायता एजेंसियां सरकारी अनुमति लेकर चलती हैं लेकिन कभी-कभी यह भी काम नहीं कर पाता है.
वॉलंटियर्स कॉर्प्स नेपाल ने हाल में देश के कई हिस्सों में हुए भूस्खलन में राहत कार्य किया था. इस संगठन के संयोजक दीपक चपागेन कहते हैं कि सरकारी अनुमति लेकर यात्रा करने पर भी ग्राउंड पर मौजूद सुरक्षाकर्मियों को इसको लेकर कोई आइडिया नहीं होता है कि वे क्या काम कर रहे हैं.
वो कहते हैं कि सरकारी एजेंसियों और लॉकडाउन लागू करने वाले सुरक्षाकर्मियों के बीच कोई बातचीत ही नहीं है.
दीपक कहते हैं कि काठमांडू के उत्तर पूर्व में भूस्खलन के बाद विस्थापित लोगों के लिए जब वो और उनकी टीम राहत सामग्री लेकर जा रही थी तब पुलिस ने उनको तक़रीबन 6 घंटों तक हिरासत में रखा था.
वो कहते हैं, "जब आप इन सब चीज़ों की चिंता करने लगते हैं तो फिर आप ज़रूरतमंद लोगों की मदद करने को लेकर हतोत्साहित हो जाते हैं."
नेपाल के गृह मंत्रालय के अनुसार, देश में मानसून के कारण हुए भूस्खलन में तक़रीबन 260 लोगों की मौत हुई जबकि 60 लोग ग़ायब हैं.
राहतकर्मियों के बीच डर
जिन जगहों पर राहत सामग्री कम पहुंच रही हैं वहां पर लोग इसके लिए बेसब्री से इंतज़ार करते हैं और इसके आने पर इसे अधिक से अधिक बटोरना चाहते हैं.
कुछ राहतकर्मियों ने ऐसी स्थिति असम में महसूस की है जो बाढ़ से बुरी तरह प्रभावित राज्य है.
असम के दरांग ज़िले में बाढ़ से विस्थापित लोगों को राहत सामग्री बाँटने वाली ग़ैर-सरकारी संस्था सतरा की ननिदा सेकिया कहती हैं, "कई जगहों पर हम जैसे ही पहुंचते हैं वहां पर लोग बड़ी संख्या में बिना मास्क और सोशल डिस्टेंसिंग के इकट्ठा होते हैं."
"हमारे कुछ सहयोगी कोरोना वायरस के संक्रमण को लेकर बेहद चिंतित हैं और उनमें से कई इन दिनों छुट्टी पर रहना चाहते हैं."
असम के कई बाढ़ प्रभावित समुदायों का कहना है कि इस सीज़न की सबसे भयानक बाढ़ देखने के तीन सप्ताह बाद भी उन्हें राहत सामग्री का इंतज़ार है.
'इस बार कोई राहत नहीं आई'
दरांग के एक ओपोरिया गाँव की लाल बनु कहती हैं कि वो इस बार बाढ़ के सीज़न के लिए कुछ सामान ख़रीदकर नहीं रख पाईं क्योंकि कोई भी उनकी सब्ज़ी कोविड-19 के डर से नहीं ख़रीदता था.
इसकी वजह से उनके पास पैसे नहीं थे और जब बाढ़ आई तो उनका घर और सबकुछ बह गया.
बेहद भावुक होते हुए वो कहती हैं, "इस वजह से मुझे राहत सामग्री की बहुत ज़रूरत है लेकिन मुझे अब तक न ही सरकार से और न ही राहत एजेंसियों से कोई मदद मिली है."
"पिछले मॉनसूनों में वे हमारी मदद करने के लिए रहते थे लेकिन इस बार कोई नहीं आया."
तीन बच्चों की मां लाल बनु कहती हैं, "मैं बहुत ग़रीब हूं और अब दिन में दो बार खाना बनाना मुश्किल हो गया है. हम इन दिनों सिर्फ़ एक बार खाना बना रहे हैं."
असम में सीमा की दूसरी ओर बांग्लादेश है. रेड क्रॉस का कहना है कि यहां पर बाढ़ के कारण 50 लाख लोग विस्थापित हुए हैं.
मानवीय सहायता कर्मियां का कहना है कि अस्थायी शेल्टर हाउस कई जगहों पर बनाए गए हैं और कई तटबंधों पर भीड़ आम बात है.
बांग्लादेश में इंटरनेशनल फ़ेडरेशन ऑफ़ रेड क्रॉस के प्रमुख अज़मत उल्ला कहते हैं, "बीते मानसून में जो अनुभव रहता था यह उससे बिलकुल अलग है."
"लेकिन हमारे वॉलंटियर्स स्थानीय समुदायों से हैं तो हमें राहत कार्य करने में मदद मिल जाती है. जो राहत कर्मी संगठन के सेंटर्स से भेजे जाते हैं, उनके लिए यह चुनौतीपूर्ण होता है."
इस क्षेत्र के प्रशासन का कहना है कि वे स्थानीय प्रशासन के साथ चुनौतियों को कम करने के लिए बात कर रहे हैं.
भारी बारिश और बाढ़ का अनुमान
भारत के राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के सदस्य सचिव जी.वी.वी. शर्मा का बीबीसी से कहना है, "हम अपने राज्यों के आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के साथ लगातार संपर्क में हैं और हम उनके राहत कर्मियों को प्रशिक्षण भी दे रहे हैं कि उन्हें कैसे व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण इस्तेमाल करने हैं."
"हम अपने साइक्लोन सेंटर्स का इस्तेमाल बाढ़ के कारण विस्थापित हुए लोगों को आश्रय देने के लिए कर रहे हैं और इस तरह के शेल्टर्स कोविड-19 की सोशल डिस्टेंसिंग गाइडलाइन के बाद दोगुने हो गए हैं."
आने वाले सप्ताह में और बारिश और बाढ़ का अनुमान है.
भारत के केंद्रीय जल आयोग ने ऐसी 33 जगहों को चिन्हित किया है जहां पर भयंकर बाढ़ आने की आशंका है. इनमें बिहार, उत्तर प्रदेश और असम प्रमुख राज्य हैं.
आईसीआरसी की रेगमी कहते हैं कि बाढ़ के बाद लोगों पर पानी से होने वाली हैज़ा जैसी बीमारियों का ख़तरा भी रहता है.
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