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कांग्रेसः क्या गांधी परिवार से बाहर किसी को मिल पाएगी कमान
- Author, गुरप्रीत सैनी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
कांग्रेस के 23 वरिष्ठ नेताओं की चिट्ठी बाहर आने से मचे हड़कंप और उसके बाद कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक के बाद कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं.
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या अब पार्टी का नेतृत्व नेहरू-गांधी परिवार से किसी और के पास जा सकता है?
कांग्रेस की राजनीति को क़रीब से समझने वाले वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई को नहीं लगता कि सोनिया गांधी या राहुल गांधी के नेतृत्व को लेकर सवाल उठ रहे हैं और उनसे नेतृत्व लेने की बात हो रही है.
वो कहते हैं, 'ज़्यादातर लोगों को कांग्रेस में सोनिया गांधी या राहुल गांधी के नेतृत्व से कोई परेशानी नहीं है.'
वहीं वरिष्ठ पत्रकार अपर्णा द्विवेदी कहती हैं कि राहुल गांधी ने ख़ुद जब अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दिया था तो उनकी कोशिश यही थी कि कांग्रेस को पूरी तरह से बदला जाए, यानी कांग्रेस में जितने भी पुराने लोग बड़े पदों पर बैठे हुए हैं वो सब इस्तीफ़ा दें.
वो कहती हैं, ''राहुल गांधी के उस वक़्त के इस्तीफ़े का प्रयास यही था. उनको लगा कि जब वो इस्तीफ़ा देंगे तो सभी लोग इस्तीफ़ा देंगे और फिर वो पूरी तरह से कांग्रेस को बदलेंगे. लेकिन ऐसा नहीं हुआ.''
रशीद किदवई कहते हैं कि पत्र लिखने वालों को पार्टी से ज़्यादा ख़ुद की चिंता है.
वो कहते हैं, ''जब नेतृत्व बदलता है तो राजनीतिक दल में महत्वपूर्ण पदों पर बैठे लोग चले जाते हैं और नए लोग आते हैं और ये ऊहापोह उसी वजह से है. राहुल गांधी जो अपनी नई टीम ला सकते हैं, उसको लेकर लोगों के मन में आशंकाएं हैं, लोगों को अपने भविष्य को लेकर चिंता ज़्यादा है.''
किसी और के पास जा सकता है नेतृत्व?
कई राजनीतिक विश्लेषक कह चुके हैं कि कांग्रेस के बुरे हालातों को सुधारने के लिए ज़रूरी है कि नेहरू-गांधी परिवार अब नेतृत्व की कमान किसी और के हाथों में दे दे.
राहुल गांधी ने भी जब कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दिया था, तब भी ये बात चर्चा में आई थी जिसके बाद कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने एक इंटरव्यू में इसका समर्थन किया था.
जब राहुल गांधी ने 2019 में कांग्रेस अध्यक्ष का पद छोड़ा था तो कई दिनों तक कांग्रेस में पार्टी के अंदर चर्चा हुई लेकिन कोई निष्कर्ष नहीं निकला.
रशीद किदवई कहते हैं, ''निष्कर्ष इसलिए नहीं निकला क्योंकि सब लोग ये चाह रहे थे कि राहुल गांधी और सोनिया गांधी किसी को मनोनीत करें और राहुल गांधी ने कहा कि आप अपना नेता चुन लीजिए. लेकिन चुनने की ना तो पार्टी में इच्छा शक्ति है और ना उनका मन है.''
वहीं अपर्णा द्विवेदी कहती हैं कि ख़बरों में दो चीज़ें एक साथ आई हैं, एक तरफ 23 कांग्रेस नेता कह रहे हैं कि कांग्रेस में नीचे से ऊपर तक परिवर्तन होना चाहिए, वहीं दूसरी तरफ़ राहुल गांधी को वापस कांग्रेस अध्यक्ष बनाने की बात भी की गई है.
वो कहती हैं,"दो गुट हैं जो ये बात कर रहे हैं और उन्होंने कहा है कि जब हम कांग्रेस को रिऑर्गेनाइज़ करने की बात करते हैं तो हम गांधी परिवार का विरोध नहीं कर रहे हैं. यानी कहीं ना कहीं वो बात वही कह रहे हैं, जो राहुल गांधी का इरादा था.''
अगर गांधी नहीं तो किसके पास जा सकता है नेतृत्व
रशीद किदवई और अपर्णा द्विवेदी, दोनों ही मानते हैं कि अगर नेतृत्व गांधी परिवार से हटकर किसी को सौंपने की बात होती भी है तो उस व्यक्ति को गांधी परिवार के समर्थन की ज़रूरत होगी.
अपर्णा कहती हैं कि गांधी परिवार से नेतृत्व किसी और के पास चला जाए, ये इसपर निर्भर करता है कि बिना गांधी परिवार के नेतृत्व के क्या पार्टी एक रहेगी. 'गांधी परिवार एक तरह का गोंद है जो पार्टी को एक साथ रखता है. जब गांधी परिवार की बात आती है तो बड़े बड़े नेता पीछे हट जाते हैं.'
अपर्णा कहती हैं कि कांग्रेस पार्टी में बड़े नामों की कमी नहीं है. 'पर समस्या ये है कि उन बड़े नामों में कितनों को पार्टी में बाकी सब लोग स्वीकार करेंगे.'
उनका कहना है कि पार्टी को पहले इस बात पर विचार करना होगा कि बड़े नाम कौन से हैं, जिन्हें ये काम सौंपा जा सकता है.
लेकिन सबसे ज़्यादा ज़रूरी ये होगा कि उस शख़्स को गांधी परिवार की मंज़ूरी मिले. उनका कहना है कि ऐसे में गांधी परिवार के वफादारों का नाम सबसे पहले आएगा.
कांग्रेस अब भी नहीं संभली तो
अपर्णा द्विवेदी कहती हैं कांग्रेस ने विपक्ष का रोल अच्छे से निभाया ही नहीं, नहीं तो उसके पास बहुत अवसर थे, लेकिन सभी अवसरों को उसने आपदा बना लिया.
वो कहती हैं कि 'कांग्रेस जहां-जहां सत्ता में भी आई, उसे वो संभाल नहीं पा रही है और अपने हाथ से हर जीती हुई बाज़ी भी हारती चली जा रही है. इससे बदतर स्थिति और क्या हो सकती है.'
वो कहती हैं कि कांग्रेस में सक्रिय नेतृत्व आने का मतलब ये नहीं होगा कि एक ऐसा व्यक्ति आए और वो आकर चमत्कार कर जाए, ये तो संभव नहीं है.
वहीं रशीद किदवई कहते हैं कि राजनीतिक दल जब बुरे दौर में होते हैं तो उनमें इस तरह की उठापटक चलती है, ये कोई नई बात नहीं है.
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