भारत नेपाल विवाद हल होने की जागी उम्मीद, जल्द हो सकती है बैठक

नरेंद्र मोदी, केपी शर्मा ओली

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इमेज कैप्शन, अप्रैल 2018 में बिम्स्टेक सम्मेलन के दौरान भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुलाक़ात नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली से हुई थी.
    • Author, फैसल मोहम्मद अली
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के बीच 15 अगस्त को हुई बातचीत के बाद, जिसने दोनों पड़ोसियों के बीच महीनों के तनाव को बहुद हद तक कम करने का काम किया. अब ख़बर है कि भारत और नेपाल जल्द ही अपने बॉर्डर वर्किंग ग्रुप की मीटिंग करने जा रहे हैं.

भारतीय और नेपाली मीडिया में आई ख़बरों के मुताबिक़ ग्रुप की मुलाक़ात अगस्त के आख़िरी हफ़्ते या सिंतबर में होगी.

नेपाल के अख़बार 'कठमांडू पोस्ट' ने विदेश मंत्रालय के हवाले से कहा है कि नेपाल इस सुझाव पर भारत के जवाब का इंतज़ार कर रहा है.

हालांकि इस बैठक में दोनों मुल्कों के बीच बॉर्डर के विवादित मुद्दे जैसे सुस्ता और कालापानी शामिल नहीं होंगे लेकिन इसमें होनेवाली चर्चा से विदेश सचिवों के स्तर पर होनेवाली आगे की बैठकों में मदद मिलेगी.

छह साल पहले, साल 2014 में तैयार बॉर्डर वर्किंग ग्रुप 'नो-मैन्स लैंड' के निर्धारण, सीमा पर लगे खंभों या दूसरे निशानों को तैयार, उनकी मरम्मत करने और उससे जुड़े कामों के लिए ज़िम्मेदार है.

सांकृतिक और एतिहासिक तौर पर बेहद क़रीबी रहे दोनों मुल्कों की बीच हालांकि तनाव पिछले चंद सालों से बढ़ता रहा था लेकिन आठ मई के बाद दोनों खुलकर एक दूसरे के सामने आ गए.

भारत ने मई 2020 में धारचुला-लिपुलेख लिंक रोड का उद्घाटन किया जो नेपाल के अनुसार उसका क्षेत्र रहा है. चंद दिनों में नेपाल ने अपना एक नया नक्शा जारी कर दिया जिसमें कालापानी, लिम्पियाधुरा और लिपुलेख शामिल थे जो भारत के मुताबिक़ उसके हिस्से हैं.

इसके बाद हालात कुछ यूं बिगड़े कि राम औरबुद्ध के जन्मस्थान को लेकर वाद-विवाद होने लगे.

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बॉर्डर वर्किंग ग्रुप की छठवीं मीटिंग पिछले साल अगस्त में ही देहरादून में हुई थी.

लेकिन इधर हफ़्ते भर के बीच ही पहले तो दोनों प्रधानमंत्रियों के बीच फ़ोन पर बातचीत हुई और उसके दो दिनों बाद ही नेपाल के विदेश सचिव शंकर दास बैरागी और नेपाल में भारत के राजदूत विनय मोहन क्वातरा के बीच वीडियो कांफ्रेस के ज़रिये कठमांडू में बैठक हुई.

नेपाल विदेश मंत्रालय की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि नेपाल-भारत ओवरसाइट मेकनिज़्म की 17 अगस्त को हुई आठवीं बैठक में दोनों मुल्कों के बीच जारी परियोजनाओं के कार्यान्वयन की समीक्षा की गई.

कहा गया है कि दोनों पक्षों ने ये तय किया कि जारी परियोजनाओं को जल्द से जल्द समाप्त करने और ऐसा करने के लिए जो ज़रूरी क़दम हैं वो उठाए जाएंगे.

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सितंबर 2016 में स्थापित ओवरसाइट मेकनिज़्म का उद्देश्य आपसी सहयोग से जारी परियोजनाओं पर नज़र रखना और उनके कार्यान्वयन में आनेवाली दिक्क़तों को दूर करना है.

दोनों मुल्कों के संबंधों पर नज़र रखनेवालों ने प्रधानमंत्री मोदी और उनके नेपाल के समकक्ष के बीच भारत की 74वीं स्वाधीनता दिवस के मौक़े पर हुई बातचीत को काफ़ी अहम बताया था और कहा था कि भारत-नेपाल के रिश्तों में पड़ी बर्फ़ को थोड़ा पिघलाने का काम करेगा.

मोदी और ओली की बातचीत के बाद भारतीय विदेश मंत्रालय ने प्रेस को जो बयान जारी किया था उसमें दोनों सभ्यताओं और संस्कृति के ऐतिहासिक संबंधों की बात कही गई थी.

कठमांडू स्थित वरिष्ठ पत्रकार कनकमणि दीक्षित मानते हैं कि दोनों नेताओं के बीच हुई बातचीत ने तनाव को कम करने का काम किया है जिसके बाद 17 अगस्त की बैठक हुई और एक और बैठक की तैयारी चल रही है. लेकिन वो कहते हैं कि ये सब बहुत दूर तक नहीं जाएगा क्योंकि जहां से तनाव का लावा फूटा - यानी धारचुला-लिपुलेख लिंक रोड, वहां काम आज भी जारी है.

भारतीय समाचरपत्र इंडियन एक्सप्रेस ने सीमा ग्रुप की प्रस्ताविक बैठक पर एक रिपोर्ट में कहा है कि ये एक तरह का संकेत है और आगे आने का मामला है कि सबसे ऊंचे स्तर पर हुई बातचीत को राजनयिक स्तर पर किस तरह व्यावहारिकता का जामा पहनाया जाए.

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नेपाल का एक बड़ा वर्ग भारत से तनावपुर्ण रिश्ते के पक्ष में नहीं है और इस संदर्भ में कनक मणि दीक्षित के चंद दिनों पहले प्रकाशित छपे लेख पर नज़र डाली जा सकती है जिसका शीर्षक ही है - 'टाइम फ़ॉर इंडिया एंड नेपाल टू मेकअप' यानी भारत और नेपाल को रंजिशों को भुलाने का समय है.

हालांकि कनक मणि दीक्षित ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि "ज़रूरत है कि भारतीय शासक वर्ग अपने दंभी विचार छोड़े और नेपाल के लोगों की संवेदनशीलता को समझे, भारतीय विदेश सचिव कोविड के दौरान ढाका जा सकते हैं लेकिन उससे आधी दूरी पर कठमांडू नहीं आ सकते, वो भी सीमा-विवाद और तनाव के इतने बढ़ना के बावजूद."

उनके मुताबिक़ नेपाल के अपने उत्तरी पड़ोसी से संबंध प्राचीन है जब नेपाल घाटी और तिब्बत में व्यापार होता था. चीन की दक्षिण एशिया में बढ़ती दिलचस्पी उसके अपने हितों के चलते हैं और हाल के सालों में नेपाल को चीन की तरफ़ भारत की नीतियों ने ही ठेला है, ख़ास कर तब जब 2016 में भारत ने नेपाल बॉर्डर को अघोषित तौर पर महीनों जाम रखा था.

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