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बिहार बाढ़ का बदलता स्वरूप: कोसी से ज़्यादा अन्य नदियों का क़हर- ग्राउंड रिपोर्ट
- Author, प्रियंका दुबे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, मुज़फ़्फ़रपुर से
नाव से आगे बढ़ते ही सबसे पहले पानी में डूबे हुए बकरे के एक शव और फिर पानी की तलहटी से झाँकती टूटी हुई ज़मीन नज़र आती है.
साथ बैठे बुज़ुर्ग ग्रामीण बताते हैं कि यह टूटी ज़मीन पहले मुज़फ़्फ़रपुर के औराई ब्लॉक में पड़ने वाले नया गाँव के मल्लाह टोला (मलटोला) को मुख्य गाँव से जोड़ती थी. अब यह ज़मीन और आस-पास फैले विशाल खेत लखनदेई नदी से आई बाढ़ के उस पानी में डूब गए हैं जिसके ऊपर मवेशियों की लाशें तैर रही हैं.
मलटोला पर उतरते ही स्थानीय लोग हमें प्रशासनिक व्यक्ति समझकर घेर लेते हैं. पत्रकार का परिचय देने पर स्थानीय निवासी लालू सैनी बताते हैं कि उनके टोले में महीना भर पहले पानी आया था और अभी तक भरा हुआ है.
वो कहते हैं, "रात को 11 के आसपास पानी गाँव में पानी भरा, तो हम सब लोग योजना (नदी पर बना तटबंध) पर जाकर रहने लगे. इतने दिन हो गए लेकिन अभी तक सरकार का कोई आदमी यहां झाँकने भी नहीं आया है. अब हालात यह कि हमारे घरों से तो पानी थोड़ा सा उतर गया है, लेकिन गाँव-टोला चारों ओर से बाढ़ में डूबा हुआ है. एक तरह से दुनिया से कट गए हैं हम."
खाने का दुख
लालू की बातों पर सहमति में सिर हिलाते हुए पास खड़ी राधिका देवी जोड़ती हैं, "बीच रात में बच्चों को लेकर भागना पड़ा. ज़रा देर में गर्दन तक पानी भर गया था- हम कैसे कैसे बच्चों को लेकर योजना (तटबंध) तक पहुँचे हैं, यह सिर्फ़ हम ही जानते हैं. बाढ़ के इन दिनों में खाने का इतना दुख रहा है. दो रात तो पानी पीकर सोए हैं हम. फिर जो चना दाना मिला, उसे फाँक के ज़िंदा रहे कितने दिन."
लखनदेई नदी में आई बाढ़ से प्रभावित नया गाँव के मलटोला में राधिका और लालू जैसे कई निवासियों की दारुण कथाएँ बिखरी पड़ी हैं.
एक ओर सीता देवी मुझे खींचते हुए कहती हैं कि 'बाढ़ के पानी में उनकी चार बकरियाँ बह गईं', तो दूसरी ओर चनका देवी पासवान बताती हैं कि बाढ़ आने के बाद उन्हें तटबंध पर 3 दिनों तक भूखा सोना पड़ा. "न तिरपाल मिला है, न छह हज़ार रुपए और न ही कोई और मदद."
कोढ़ की तरह जम गया है लखनदेई का पानी
लखनदेई और बागमती नदियों के बीच घिरा नया गाँव भौगोलिक दृष्टि से एक जटिल परिस्थिति में मौजूद है. लेकिन स्थानीय निवासी बताते हैं कि इलाक़े में लंबी बाढ़ का कोई इतिहास नहीं रहा है.
नाव पर बैठे जयकिशोर जोड़ते हैं, "पहले बरसात में बागमती का पानी आता था लेकिन जल्दी उतर जाता था. लेकिन पिछले तीन साल से लखनदेई का पानी कोढ़ की तरह आकर महीनों बैठा रहता है गाँव में. सारा खेत-खलिहान सब पानी के नीचे आ गया है. और सरकार के लोग तो सिर्फ़ वोट मांगने के लिए ही चेहरा दिखाते हैं. बाढ़ के दिनों में कोई नहीं आता."
गंडक का क़हर
मुज़फ़्फ़रपुर के औराई ब्लॉक से बद्तर हाल ज़िले के पारू ब्लॉक का है. ब्लॉक में प्रवेश कर उस्ती ग्राम पंचायत में पड़ने वाले सिंगाही गाँव की तरफ़ मुड़ते ही सड़क के दोनों ओर फैला गंडक का पानी एकदम चौंका देता है.
गाँव के मुहाने पर बने तिरहुत तटबंध पर तक़रीबन दो किलोमीटर तक पैदल चलते हुए मैंने तटबंध के दोनों ओर हज़ारों बीघा तक फ़ैले दो-फ़सली खेतों, पेड़ों और मंदिर-मस्जिदों को नाक तक पानी में डूबे हुए देखा. इसी के साथ अपने बर्तन, चूल्हा और मवेशी इकट्ठा कर तटबंद पर तिरपाल के टेंटों में रह रहे गाँव के लोगों की लंबी क़तार को देखना बाढ़ के इस दृश्य की मार्मिकता को बढ़ा देता है.
सिंगाही के साथ-साथ चकदेवरिया, माधोपुर बुज़रुक, सनौत जैसे आस-पास के कई गाँव पानी में डूबे हुए हैं. धान की अच्छी उपज के लिए पहचाने जाने वाले पारू ब्लॉक के इन गाँवों में रहने वाले बड़े किसानों के पक्के मकान और रोपे हुए खेत बीते तक़रीबन एक महीने गंडक से पानी में डूबे हुए हैं.
सिंगाही गाँव के बुज़ुर्ग जगन्नाथ प्रसाद सिंह बताते हैं कि उन्होंने और उनके पहले की पीढ़ी ने भी कभी इस इलाक़े में इस तरह की बाढ़ नहीं देखी थी.
"आप इसी से अंदाज़ा लगाइए कि इस इलाक़े को धान की अच्छी फ़सल के लिए जाना जाता है, यहाँ इस बार एक दाना भी अनाज नहीं उगेगा."
उनके साथ बैठे एक अन्य किसान संजीव कुमार सिंह कहते हैं, "नुक़सान तो सभी का बहुत हुआ है. हमारी अपनी 13-14 बीघा रोपी हुई खेती थी. अब बाढ़ की वजह से कम से कम एक लाख बीस हज़ार तो केवल लागत का नुक़सान हुआ है. सरकार की छह हज़ार की क्षतिपूर्ति से क्या होगा? लेकिन वह भी अभी तक नहीं मिली है."
इस साल क्यों बदला हुआ है बिहार बाढ़ का स्वरूप
सिंगाही गाँव से गुज़रते हुए तिरहुत तटबंध पर खड़े होकर गंडक के बाढ़ के पानी को छपरा ज़िले की ओर बढ़ कर फैलते हुए देखा जा सकता है. पारू में आई बाढ़ को मुज़फ़्फ़रपुर के साथ-साथ गोपालगंज और छपरा के ऐसे नए इलाक़ों में आई बाढ़ के प्रतीक के रूप में देखा जा सकता है जो आमतौर पर हर साल बाढ़ से इतना ज़्यादा प्रभावित नहीं होते थे.
इसका एक कारण 21 जुलाई को भारत और नेपाल दोनों ही तरफ़ हुई भारी बारिश के बाद गंडक के बढ़े हुए पानी को माना जा रहा है.
21 जुलाई को 4.36 क्यूसेक मीटर का डिस्चार्ज स्तर पार करने के बाद बिहार में गंडक के तीन प्रमुख तटबंध टूट गए. इनमें पूर्वी चम्पारण का भवानीपुर तटबंध और साथ ही गोपलगंज के देवापुर और बैकुंठपुर के तटबंध शामिल थे.
तटबंध टूटते ही इन ज़िलों में सैकड़ों किलोमीटर तक गंडक का पानी निर्बाध फैलता गया. घर, खेत, मवेशी - जो भी नदी के रास्ते में आए, सभी बाढ़ के पानी में जलमग्न हो गए. रिहायशी इलाक़ों के साथ-साथ इस साल की बाढ़ में सबसे अधिक नुक़सान बिहार में धान की फसल को हुआ है.
पारू ब्लॉक के माधोपुर बुज़ुर्ग गाँव में रहने वाले शिवेंद्र महतो एक पुरानी टूटी साइकिल पर 13 जनों के अपने परिवार के लिए 20 रुपये की बारीक छोटी मछलियाँ बांध कर अपने टेंट की ओर जा रहे थे.
फिर तटबंध के रास्ते पर मेरे साथ-साथ चलते हुए वो कहते हैं, "हम लोग एक चौकी के ऊपर टेबल रखकर, उसके ऊपर फिर कुर्सी रखकर बैठते थे. इसी तरह बैठे-बैठे हमने बाढ़ की कितनी रातें गुज़ारी हैं. आम ग़रीब आदमी की कौन सुनने वाला है? इतने दिन से बांध पर अपना जो भी थोड़ा सा सामान बचा सके, वह लेकर बैठे हैं लेकिन अभी तक सरकार की ओर से कोई मदद नहीं मिली है. अभी बीमारी की वजह से कोई काम भी नहीं दे रहा. हमारे पास अपनी कोई ज़मीन नहीं है. मछली भी नहीं पकड़ सकते क्योंकि उसका भी लूर (तरीक़ा) नहीं जानते हैं. इसलिए सिर्फ़ मज़दूरी करके ज़िंदा रहते हैं."
प्रशासन का कहना, बाढ़ की स्थिति ख़त्म हो चुकी है
मुज़फ़्फ़रपुर के कलेक्टर चंद्रशेखर सिंह अपने ज़िले के इन नागरिकों के सवालों के प्रति कमोबेश एक उदासीन रुख़ अपनाते हुए सिर्फ़ सरकारी प्रयासों की एक सूची सुना पाते हैं.
वो कहते हैं, "हमने सबसे पहले ज़िले में बाढ़ पीड़ितों के लिए 350 सामुदायिक रसोई शुरू की, खाने के पैकेट वितरित किए और प्रभावित परिवारों को 6000 रुपए की सरकारी क्षतिपूर्ति राशि वितरित कर रहे हैं."
पारू और औराई ब्लॉक के जिन इलाक़ों का दौरा मैंने किया था, उनके बारे में पूछने पर वह जोड़ते हैं, "हमारे हिसाब से औराई में बाढ़ की स्थिति अब ख़त्म हो गई है. फिर भी आप जिन इलाक़ों का ज़िक्र कर रही हैं, वहाँ हम एक बार विज़िट करवा लेंगे और अगर लोगों को ज़रूरत होगी तो मदद की जाएगी. पारू में हम लोगों ने सामुदायिक किचन चलवाया था. वहाँ कुछ इलाक़ों में पानी भरा हुआ है. अभी हम फिर समीक्षा कर लेंगे और जो भी ज़रूरत वो किया जाएगा."
आश्वासनों का बाढ़ जितना विस्तार
पारू छोड़ने से पहले मैं शिवेंद्र महतो से उनकी एक तस्वीर खींचने की गुज़ारिश करती हूँ. वह अपनी टूटी साइकिल पर मुट्ठी भर मछलियों की पन्नी टाँगे तटबंध पर खड़े हो जाते हैं.
कैमरे के फ़्रेम में मुझे उनके पीछे फैले गंडक के पानी का असीम विस्तार नज़र आता है. और उनके बुझे उदास चेहरे पर बाढ़ पीड़ितों के प्रति जारी प्रशासन की उदासीनता की परछाई.
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