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फे़सबुक जैसे सोशल मीडिया भारत के चुनावों को कितना प्रभावित करते हैं
- Author, जुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
फे़सबुक भारत में राजनीतिक विवाद में फंस गया है. अमरीका के अख़बार 'वॉल स्ट्रीट जर्नल' के मुताबिक फ़ेसबुक ने आरएसएस (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) और वैचारिक रूप से संघ के क़रीब मानी जाने वाली सत्तारूढ़ बीजेपी की मदद की है. अब विपक्ष इस मुद्दे को लेकर हमलावर है.
शुक्रवार को 'वॉल स्ट्रीट जर्नल' में छपी एक रिपोर्ट में फे़सबुक के कुछ मौजूदा और पूर्व कर्मचारियों के हवाले से दावा किया गया है कि इस सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ने बीजेपी नेताओं और कार्यकर्ताओं की हेट स्पीच और सांप्रदायिक कंटेंट को नज़रअंदाज किया है. फे़सबुक के पास ही वॉट्सऐप और इंस्टाग्राम का भी मालिकाना हक है.
निष्पक्षता को लेकर फे़सबुक के दावों पर सवालिया निशान?
विश्लेषकों का कहना है कि 'वॉल स्ट्रीट जर्नल' की ओर से फे़सबुक पर लगाए गए आरोपों ने इसकी निष्पक्षता के दावों पर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं. इस आरोप की वजह से फे़सबुक पर चले 2014 और 2019 के चुनावी अभियानों को भी शक़ की निगाहों से देखा जाने लगा है. इन दोनों चुनावों में बीजेपी को भारी बहुमत मिला था.
वरिष्ठ पत्रकार और लेखक परंजॉय गुहा ठाकुरता ने पिछले साल आई अपनी किताब में बीजेपी और फे़सबुक के रिश्तों की पड़ताल की थी. ठाकुरता कहते हैं कि उन्हें विश्वास है कि फे़सबुक और वॉट्सऐप ने पिछले दो लोकसभा चुनावों के नतीजों को काफी अधिक प्रभावित किया है. उन्होंने बीबीसी से कहा कि वॉल स्ट्रीट जर्नल की स्टोरी ने भारत में फेसबुक की भूमिका की उनकी जांच पर मुहर ही लगाई है.
वह कहते हैं, "भारत में 40 करोड़ फे़सबुक यूज़र्स हैं और 90 करोड़ वोटर. देश में चुनाव से पहले, बाद में और इसके दौरान इस प्लेटफ़ॉर्म का दुरुपयोग होने दिया गया. लोगों ने किसे वोट डाला और कैसे वोट डाला इस पर निश्चित तौर पर इनका बड़ा असर रहा है. संक्षेप में कहें तो आज की तारीख में फे़सबुक और वॉट्सऐप जिस तरीके से काम कर रहे हैं, इससे न सिर्फ़ भारत में बल्कि पूरी दुनिया में लोकतंत्र को ख़तरा पैदा हुआ है".
फे़सबुक का दोहरा रवैया?
आलोचकों का कहना है कि फे़सबुक अलग-अलग देशों के लिए अलग-अलग नियम और गाइडलाइंस बनाता है. फे़सबुक दूसरे देशों में सत्ताधारी दलों के आगे हथियार डाल देता है लेकिन अमेरिका में जहां इसका मुख्यालय हैं, वहां राजनीति से दूरी बनाता दिखता है. यह इसका दोहरा रवैया है.
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने मोदी सरकार पर आरोप लगाया है कि वह फे़सबुक और वॉट्सऐप को नियंत्रित कर रही है. उन्होंने संसद की संयुक्त कमेटी से इसकी जांच कराने की मांग की है.
लेकिन बीजेपी के वरिष्ठ नेता और केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने सरकार का बचाव किया है. उन्होंने कहा कि फे़सबुक, वॉट्सऐप को नियंत्रित करने में उनकी सरकार की कोई भूमिका नहीं है. प्रसाद ने ट्वीट कर कहा, "जो लूज़र ख़ुद अपनी पार्टी में भी लोगों को प्रभावित नहीं कर सकते वो इस बात का हवाला देते रहते हैं कि पूरी दुनिया को बीजेपी और आरएसएस नियंत्रित करते हैं."
अमरीका में अपने मुख्यालय से बयान जारी करते हुए फे़सबुक ने इन आरोपों का खंडन किया है. उसके बयान में कहा गया है, " हम हिंसा भड़काने वाले हेट स्पीच और कंटेंट को रोकते हैं. पूरी दुनिया में हमारी यही पॉलिसी है. हम किसी राजनीतिक पार्टी का पक्ष नहीं लेते हैं और न हमारा किसी से जुड़ाव है".
हालांकि फे़सबुक ने माना है कि इस तरह के मामलों से बचने के लिए और भी काफ़ी कुछ करना होगा. अपने बयान में उसने कहा, "हमें पता है कि इस दिशा में अभी कुछ और क़दम उठाने होंगे. लेकिन हम अपनी प्रक्रिया के लगातार ऑडिट और उन्हें लागू करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं ताकि हमारी निष्पक्षता और सटीकता पर आंच न आए."
फे़सबुक और बीजेपी की नज़दीकियों की पड़ताल
फे़सबुक और बीजेपी सरकार के बीच संबंधों की खबरों से ठाकुरता को अचरज नहीं हुआ. वह कहते हैं, "पिछले साल जब मैंने फे़सबुक पर किताब लिखी और इसके और वॉट्सऐप से मोदी सरकार के नजदीकी रिश्तों का ब्योरा दिया तो मीडिया ने इसे नजरअंदाज किया. अब जब एक विदेशी अख़बार ने यह मुद्दा उठाया है तो मीडिया में गज़ब की फुर्ती और दिलचस्पी दिख रही है".
ठाकुरता ने बीबीसी से कहा कि फे़सबुक और मोदी की पार्टी बीजेपी की दोस्ती काफी पुरानी है. मोदी को सत्ता में पहुंचाने वाले 2014 के लोकसभा चुनावों से पहले दोनों के बीच काफी अच्छे रिश्ते बन चुके थे.
उन्होंने कहा, " 2013 में मोदी के गुजरात के मुख्यमंत्री रहते ही फे़सबुक और बीजेपी के बीच काफी अच्छे संबंध बन गए थे. मैंने लिखा है कि कैसे फे़सबुक के कुछ आला अफसरों ने बीजेपी के आईटी सेल, इसके सोशल मीडिया विंग और फिर बाद में पीएमओ में मोदी के करीबियों के साथ मिल कर काम किया."
वॉल स्ट्रीट जर्नल ने फे़सबुक के एक शीर्ष अधिकारी के हवाले से कहा है कि अगर यह प्लेटफॉर्म हेट स्पीच या दूसरे नियमों के उल्लंघन पर बीजेपी कार्यकर्ताओं के ख़िलाफ़ कदम उठाता तो देश में कंपनी की कारोबारी संभवानाओं चोट पहुंचती. इस स्टोरी में कहा गया है कि फे़सबुक के पास बीजेपी का पक्ष लेने का एक 'विस्तृत पैटर्न' है. हालांकि बीजेपी अब इस आरोप से इनकार कर रही है कि फे़सबुक ने उसकी कोई मदद की है.
फे़सबुक से लोकतंत्र को खतरा ?
अमरीका और यूरोप के राजनीतिक नेताओं ने लोकतंत्र के सिद्धांतों को कथित तौर पर चोट पहुंचाने के लिए फे़सबुक और दूसरे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को कटघरे में खड़ा किया है.
ब्रिटेन में हयूमन राइट्स कमेटी के अध्यक्ष हैरियट हरमन का कहना है "आमतौर पर सांसद काफी शिद्दत से यह मान रहे हैं सोशल मीडिया जो कुछ कर रहा है उससे लोकतंत्र के लिए ख़तरा पैदा हो रहा है".
इस तरह के कई मामलों के बाद फे़सबुक और वॉट्सऐप पर चारों ओर से अपने कामकाज में सुधार लाने के दबाव बढ़ने लगे हैं. ट्विटर जैसे दूसरे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर यूज़र फे़सबुक के सीईओ मार्क जुकरबर्ग को सलाह दे रहे हैं वह भारत में अपनी कंपनी की गड़बड़ियों को ठीक करे. हालांकि ट्विटर पर भी गड़बड़ी के आरोप लगते रहे हैं.
ज़करबर्ग की पिछले दिनों अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पोस्ट के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई न करने पर आलोचना हुई थी. फे़सबुक के शुरुआती दौर में इसमें काम कर चुके 30 कर्मचारियों ने सार्वजनिक तौर पर एक चिट्ठी लिख कर कहा था कि ट्रंप को पोस्ट को मॉडरेट करने से फे़सबुक का इनकार करना ठीक नहीं है. इसने अमरीकी जनता को उन ख़तरों की ओर धकेल दिया, जिन्हें वह पहले ही देख चुका है. इस पत्र में फे़सबुक पर दोहरा रवैया अपनाने का आरोप लगाया गया था.
हेट स्पीच और हिंसा के ख़िलाफ़ सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के इन-हाउस गाइडलाइंस होते हैं और वे इन्हें बढ़ावा देने के ख़िलाफ़ कार्रवाई भी करते हैं. लेकिन इस मामले में वो ज्यादातर यूज़र पर ही निर्भर रहते हैं कि वे नियमों के उल्लंघन के प्रति उन्हें सतर्क करें.
ज़करबर्ग ने हाल ही में इसराइली इतिहासकार युआल नोह हरारी से कहा था कि फे़सबुक के लिए यूज़र की प्राइवेसी और उसकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सर्वोपरि है. लेकिन हरारी इससे सहमत नहीं थे. उनका कहना था कि ऐसे मामलों में फे़सबुक ने सब कुछ यूज़र पर छोड़ दिया है. उसे इन मामलों में एक कदम आगे बढ़ कर काम करना चाहिए क्योंकि आम आदमी को अक्सर यह पता नहीं होता कि उसका फायदा उठाया जा रहा है. उनका कहना था आम यूज़र के पास फेक न्यूज़ का पता करने का ज़रिया नहीं होता.
'सोशल मीडिया का मकसद सिर्फ पैसा कमाना'
ठाकुरता का कहना है कि सोशल मीडिया का राजनीतिक या कोई और दूसरा मकसद नहीं होता. उसका एक मात्र मकसद "मुनाफा और पैसा कमाना होता है."
फे़सबुक ने हाल में रिलायंस के जियो प्लेटफॉर्म्स में 43,574 करोड़ रुपये का निवेश किया है ताकि भारत में इसका धंधा और बढ़े.
यूज़र की तादाद के हिसाब से भारत फे़सबुक का सबसे बड़ा बाजार है. देश की 25 फीसदी आबादी तक इसकी पहुंच है. 2023 तक यह 31 फीसदी लोगों तक पहुंच सकता है, वॉट्सऐप की पहुंच तो और ज्यादा है.
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