भारत में चीन और ऑस्ट्रेलिया के राजदूत आपस में भिड़े

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भारत में चीन और ऑस्ट्रेलिया के राजदूत शुक्रवार दोपहर बाद ट्विटर पर भिड़ गए. एक बजे भारत में चीन के राजदूत सुन वेईदोंग ने एक ट्वीट किया.
इस ट्वीट में उन्होंने लिखा है, ''भारत में ऑस्ट्रेलिया के उच्चायोग ने दक्षिण चीन सागर पर तथ्यों की उपेक्षा करते हुए टिप्पणी की है. चीन की क्षेत्रीय संप्रभुता और समुद्री अधिकार नियम के मुताबिक़ हैं. यह बिल्कुल स्पष्ट है कि कौन इलाक़े में शांति और सुरक्षा के लिए काम कर रहा है और कौन अस्थिर करने और उकसाने के काम में लगा है.''
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इसके जवाब में भारत में ऑस्ट्रेलिया के उच्चायुक्त बरी ओ'फ़ारेल ने ट्वीट कर कहा, ''भारत में चीन के राजदूत आपको बहुत शु्क्रिया. मैं उम्मीद करता हूं कि तब आप 2016 में आए दक्षिण चीन सागर पर अंतरराष्ट्रीय कोर्ट के फ़ैसले का पालन करेंगे. इसके साथ ही उन कार्रवाइयों से भी बचेंगे जिनसे एकतरफ़ा यथास्थिति बदल दी जाती है.''
कोरोना वायरस की महामारी ने अंतरराष्ट्रीय संबंधों को उलट-पुलट कर रख दिया है. कल तक जिनके रिश्ते बेहतर थे उनमें पर्याप्त अविश्वास आ गए हैं.
चीन के मामले में ख़ास करके ऐसा हुआ है. चीन को लेकर दुनिया भर में कोरोना वायरस के कारण संदेह बढ़ा है और इसी कारण जुबानी जंग भी चल रही है.
एशिया-पैसिफिक में चीन से सबसे ज़्यादा अगर किसी का रिश्ता ख़राब हुआ है तो वो ऑस्ट्रेलिया है. ऑस्ट्रेलिया ने चीन के वुहान में पिछले साल नंवबर महीने में कोरोना की उत्पति को लेकर एक जांच की मांग की थी. इसके बाद से चीन चिढ़ा हुआ है और उसने ऑस्ट्रेलिया से कई आयात तक बंद कर दिया है.
चीन ने हाल ही में हॉन्ग कॉन्ग में सख़्त राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून लागू किया था तो ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन ने जवाबी कार्रवाई में कहा था कि हॉन्ग कॉन्ग के लोगों के वीज़ा की अवधि बढ़ाने की योजना बनाई है और वहाँ से व्यवसाय को यहाँ लाने के लिए भी लोगों को प्रोत्साहित किया जाएगा. नाराज़ चीन ने ऑस्ट्रेलिया के इस क़दम को अपने आंतरिक मामलों में दख़ल कहा था.

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ऑस्ट्रेलिया स्थित चीन के दूतावास ने एक बयान जारी करके कहा था- हम ऑस्ट्रेलिया से अपील करते हैं कि वो तुरंत हमारे मामले में दख़ल देना बंद कर दे अन्यथा ये एक चट्टान उठाकर अपने पैर पर मारने जैसा होगा.
चीन के राजनयिकों पर उठ रहे सवाल
रोमानियन इंस्टिट्यूट फोर द स्टडी ऑ द एशिया-पैसिफिक के प्रमुख एंड्रेई लुंगु ने साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट में 15 मई को लिखा था कि चीन ने पिछले 40 सालों में अपनी मेहनत और लगन के दम पर दुनिया में जो जगह बनाई थी, उसे उसकी आक्रामकता ने संदिग्ध बना दिया है.
एंड्रेई ने लिखा है, ''चीन ने पिछले 40 सालों में अपने लाखों नागरिकों के काम, त्याग और रचनात्मकता के दम पर जो आर्थिक तरक़्क़ी हासिल की, उसकी जितनी तारीफ़ की जाए कम है. इसमें चीन के डिप्लोमेट की भी अहम भूमिका रही. डिप्लोमेसी के दम पर चीन ने जिनके साथ असहज रिश्ते थे उनके साथ भी सहज किए. वो चाहे जापान हो या अमरीका. चीन ने यूएन और डबल्यूटीओ में भी अहम जगह बनाई. ऐसा इसलिए भी संभव हो रहा था कि चीनी डिप्लोमैट पूरी तरह से ट्रेंड और सॉफ्ट स्पोकेन थे. इन डिप्लोमेट्स ने चीन की पहुँच वहाँ तक बनाई जहाँ असंभव सा लगता था. इन्होंने निजी तौर पर रिश्ते विकसित किए और लोगों का भरोसा जीता."

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उन्होंने लिखा है- चीन की डिप्लोमैसी का वो स्वर्ण काल था. तब वो बहुत ही अनुशासित थे. लेकिन आज की तारीख़ में चीन के डिप्लोमेट पर हर जगह सवाल खड़े हो रहे हैं. अब ये डिप्लोमैट्स चीन की प्रॉपेगैंडा मशीनरी के अपेंडिक्स बन गए हैं. इनका फ़ोकस अब घरेलू जनता के इमोशन पर है न कि विदेशियों पर. एक अच्छा डिप्लोमेट वो होता है जो कलह कम करे न कि बढ़ाए. लेकिन चीन के डिप्लोमेट विदेश सरकारों से खुलेआम बयानबाज़ी कर रहे हैं. विदेशी मीडिया को टारगेट कर रहे हैं और यहाँ तक कि विदेशी नेताओं पर भी टिप्पणी कर रहे हैं. ऐसा फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया, स्वीडन और ब्राज़ील में देखने को मिला. चीन को जब चाहिए था कि कोविड 19 की महामारी में अपनी संदिग्ध हुई छवि को उदारता से ठीक करे तो वो आक्रामकता दिखाकर डरा रहा है.''
नेपाल के भीतर भी चीन की इस सक्रियता को लेकर सवाल उठे. भारत के भीतर भी चिंताएँ बढ़ीं कि क्या नेपाल में भी भारत का प्रभाव अब अतीत का हिस्सा बन गया.
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