कोरोना मरीजों के लिए प्लाज़्मा की कालाबाज़ारी कैसे पैदा कर रही है मुश्किलें

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- Author, फ़ैसल मोहम्मद अली
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
लगातार कई शहरों के अस्पतालों, ब्लड बैंक्स और रिश्तेदारों को फ़ोन लगा लगाकर वैभव और उनकी पत्नी सुकन्या की उंगलियां दुख रही हैं, नींद की कमी से आंखें सुर्ख़ हैं, तबीयत बोझिल है, फिर भी पिता विकास चंद्र अग्रवाल के लिए एबी+ ग्रुप के प्लाज़्मा का इंतज़ाम तीन दिनों की कोशिश के बावजूद नहीं हो पाया है.
इस बीच एक तरफ आगरा के एक प्राइवेट अस्पताल में भर्ती 62 साल के विकास चंद्र अग्रवाल की तबीयत बिगड़ती जा रही है, तो दूसरी तरफ वैभव की घबराहट और चिंता भी 'शूट-अप' कर रही है, और वो कुछ भी करने को तैयार हैं.
प्लाज़्मा के लिए परेशान होने वालों में वैभव अकेले नहीं हैं. गुरुवार को हमें प्लाज़्मा के लिए जद्दोजहद में जुटे दो लोगों ने फ़ोन किया था. प्लाज़्मा 'मैच-मेकिंग' यानी डोनर-रिसीवर को आमने-सामने लाने वाली संस्था 'ढूंढ' की वेबसाइट पर हर दिन दर्जनों लोग रजिस्टर कर रहे हैं.
जिस व्यक्ति को कोरोना संक्रमण होकर ठीक हो चुका है उसके खून से प्लाज़्मा निकालकर कोराना के मरीज़ को दिए जाने पर कई बार हालत में सुधार देखा गया है.
लंदन-स्थित सॉफ़्टवेयर इंजीनियर और 'ढूंढ' में पार्टनर मुकल पाहवा के मुताबिक़ उनकी बेवसाइट पर पंजीकरण करवाने वालों में 'रिसीवर्स' यानी जिन्हें प्लाज़्मा चाहिए की तादाद 'डोनर्स' से बहुत अधिक है.
हमेशा की तरह क़िल्लत की क़ीमत ज़रूरतमंदों से वसूली जा रही है, एक यूनिट (525 एमएल) प्लाज़्मा के लिए पच्चीस से तीस हज़ार रूपयों तक की मांग हो रही है. कई जगहों पर इस लेन-देन के लिए डार्क-वेब का सहारा लिए जाने की भी चर्चा है.
कुछ अख़बारों ने डोनर को पैसों के अलावा, दूसरे शहर से आने-जाने का इंतज़ाम किए जाने तक की बात भी लिखी है. इन सबके बावजूद सब कुछ काफी मुश्किल है.
महाराष्ट्र के गृह मंत्री अनिल देशमुख ने पिछले दिनों जनता को आगाह किया कि कुछ लोग प्लाज़्मा के नाम पर धोखाधड़ी कर रहे हैं और कई लोगों से इसके लिए ऊंची कीमत वसूली गई है.
उन्होंने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि प्लाज़्मा थेरेपी कोविड-19 का इलाज नहीं है लेकिन मरीजों की हालत में इसकी वजह से सुधार देखा गया है इसलिए इसकी मांग बहुत है.
यही वजह है कि पिछले दिनों कर्नाटक सरकार के स्वास्थ्य शिक्षा मंत्री ने अपनी दैनिक प्रेस ब्रीफिंग में घोषणा की कि प्लाज़्मा डोनर्स को पाँच हज़ार रुपए की प्रोत्साहन राशि दी जाएगी.

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प्लाज़्मा की कमी क्यों है?
नेशनल ब्लड ट्रांसफ़्यूज़न कांउसिल ब्लड (ख़ून), प्लैटलेट्स, प्लाज़्मा वगैरह से जुड़े मामलों की देख-रेख करने वाली संस्था है, उसके मुताबिक़ प्लाज़्मा के लिए 400 रुपए प्रति यूनिट लिए जा सकते हैं.
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी मेडिकल कालेज में कम्यूनिटी मेडिसिन्स के असिस्सटेंट प्रोफ़ेसर नफ़ीस फ़ैज़ी कहते हैं, "प्लाज़्मा की कमी की एक बड़ी वजह ज़रूरी मूलभूत सुविधांए जैसे पैथोलॉजी लैब्स, कलेक्शन-प्रिज़र्वेशन की सुविधाओं जैसी भारी कमी है, दूसरे लोगों में ब्लड, शरीर के अंग वग़ैरह दान करने को लेकर जानकारी की कमी और भ्रांतियां भी हैं."
स्वास्थ्यकर्मियों की स्वंयसेवी संसथा जन स्वास्थ्य अभियान के डाक्टर गार्गेया तेलकापल्ली पूरे हालात के लिए सिर्फ़ सरकार को दोषी नहीं मानते और कहते हैं जो प्लाज़्मा दान कर सकते हैं "उनमें शायद ये डर भी है कि क्या होगा अगर मुझे फिर से कोविड-19 का संक्रमण हो गया?"
हालांकि प्लाज़्मा थेरापी पर अभी रिसर्च जारी है और फ़िलहाल छप रहे नतीजों को फ़ाइनल नहीं मान सकते हैं लेकिन कुछ प्रतिष्ठित विदेशी अख़बारों में इस तरह की ख़बरें आई हैं कि कोविड-19 से संक्रमित होने के बाद शरीर में बीमारी से लड़ने की जो प्रतिरोधरक क्षमता पैदा होती है - जिसे ऐंटीबॉडीज़ कहते हैं, ये तीन माह के बाद ख़त्म हो जाती है.
कई जगहों पर कोविड-19 पीड़ित के ठीक हो जाने के बाद फिर से बीमार पड़ने की भी ख़बरें हैं.
प्लाज़्मा थेरेपी में किसी वैसे ही व्यक्ति के ख़ून के इस हिस्से को बीमार के शरीर में चढ़ाने के लिया जा सकता है जो कोविड-19 से पीड़ित होने के बाद ठीक हो गया हो. इलाज के इस तरीक़े को 'कन्वैलेसेंट प्लाज़्मा थेरापी' कहते हैं.
ये थेरेपी इस धारणा पर आधारित है कि संक्रमण से ठीक हुए मरीज़ के ख़ून से लिए गए प्लाज़्मा से किसी दूसरे बीमार के रक्त में मौजूद वायरस को ख़त्म किया जा सकता है.
कोविड-19 के पहले इसका इस्तेमाल सार्स, मर्स और एच1एन1 जैसी महामारियों में भी किया गया था.
स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम कर रहे कई विशेषज्ञों का मानना है कि अगर लैब, ब्लड बैंक, ज़रूरी दवाओं की उपलब्धता वग़ैरह और सभी बड़े अस्पतालों में कोविड-19 के इलाज पर ध्यान दिया जाता तो इस तरह के हालात तैयार नहीं होते.
बीते दिनों तेज़ी से बढ़ी प्लाज़्मा की मांग
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी मेडिकल कालेज में ही प्लाज़्मा थेरेपी से संबंधित सारी सुविधाएँ मौजूद नहीं हैं और ये आने वाले दिनों में शुरु होंगी.
रिपोर्ट के मुताबिक़ बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी मेडिकल कालेज में ये पिछले हफ़्ते ही शुरु हुई है. लखनऊ के केजीएमयू में ये सुविधा सुचारु रूप से चल रही लेकिन एसजीपीजीआई को स्वस्थ्य डोनर नहीं मिल रहे.
देश की राजधानी दिल्ली में दूसरा प्लाज़्मा बैंक पिछले हफ़्ते ही लोकनायक जयप्रकाश अस्पताल में शुरु किया गया है. पहला बैंक वसंत कुंज स्थित आईएलबीएस में पिछले महीने भर से काम कर रहा है.
डाक्टर गार्गेया तेलकापल्ली कहते हैं, "ज़रूरत है लोगों को इस बात को समझाने की कि वो जो ख़ून, प्लाज़्मा दान करने जा रहे हैं वो किसी बहुत बीमार या मर रहे व्यक्ति को फिर से जीवनदान दे सकता है, यानी 'उनके काम का एंड-रिज़ल्ट क्या होगा इस जागरुकता की ज़रूरत है लेकिन जब हम अपने अस्पतालों में ब्लड बैंक नहीं चला पा रहे और सरकारें स्वास्थ्य सेवाओं पर ख़र्च को कम से कम करती जा रहीं तो यह मुश्किल है."
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने पिछले हफ़्ते अस्पतालों से कहा है कि वो कोविड-19 से ठीक हो रहे मरीज़ों को प्लाज़्मा दान करने के लिए प्रोत्साहित करें. केजरीवाल ने ये भी कहा कि प्लाज़्मा की मांग पिछले दिनों तेज़ी से बढ़ रही है.
अभी तक कोविड-19 के इलाज में जो चार-पांच चीज़ें बेहतर रिज़ल्ट्स दे रही हैं उनमें प्लाज़्मा थेरापी एक है. तो इसको लेकर मांग बढ़ना भी स्वभाविक है.
ऐसी स्थिति में - अद्वीतिय मल्ल ने पाया कि जब उन्हें प्लाज़्मा की ज़रूरत तो उनसे कुछ लोगों ने प्लाज़्मा देने के बदले पैसों की मांग की.
अब मल्ल ने दोस्त मुकुल पाहवा के साथ मिलकर ढूंढ़ नाम की वेबसाइट शुरू की है जो लोगों को प्लाज़्मा हासिल कराने में मदद करती है.
कमी के चलते कालाबाज़ीरी को मिल रहा है बढ़ावा
मुकुल पाहवा कहते हैं "काफ़ी संख्या में लोग मुल्क के कोने-कोने से उनसे जुड़ रहे हैं जबकि उन्होंने इस प्रयास को महीने भर पहले ही शुरु किया था और लोगों को सबसे पहले व्हाट्सऐप के ज़रिये मैसेजेज़ भेजे गए थे."
इस तरह के मामले में जहां हासिल करने वाले की ज़रूरत इंतिहा पर हो और दानकर्ता ये जानता हो तो किसी तरह का लेन-देन संभव है, मुकुल पाहवा स्पष्ट करते हैं कि वो सिर्फ़ डोनर-रिसीवर को आमने-सामने लाने का काम कर रहे हैं उसके बाद का मामला उन दोनों के बीच का होता है और उनकी संस्था इससे अलग रहती है.
'प्राण' नाम से ऐसा ही प्रयास दो दिनों पहले महाराष्ट्र कोविड-19 टास्क फोर्स के सदस्य डाक्टर ओम श्रीवास्तव की ओर से भी शुरु किया गया है और उनकी सहायक डाक्टर मारिया निगम के मुताबिक़ फ़िलहाल पायलट प्रोजेक्ट के प्रोटोकोल और दूसरे पहलूओं पर काम जारी है.
डाक्टर नफ़ीस फ़ैज़ी कहते हैं जब भी इस तरह की नई थेरेपी सामने आती है तो उसकी क़ीमतों और इस तरह (लेन-देन) की बातें सुनने में आती हैं और इस पर लगाम तब और मुश्किल नज़र आती है जब इन पर लगाम कस सकने वाली संस्थाएं कमज़ोर हों.
स्वयंसेवी स्वास्थ्य कार्यकर्ता आशा मिश्रा सवाल करती हैं कि स्वास्थ्य के क्षेत्र में कौन सी चीज़ कालाबाज़ारी के बिना मिल रही और कोविड जिन्हें हो जाए वो तो इतनी हताशा में पहुंच जाते हैं कि जो पास होता है वो देने को तैयार हो जाते हैं?
हाल के दिनों में प्लाज़्मा के इलाज से संबंधित रेमडेसीवर जैसी दवाइयों के तीन-चार गुने दामों में बेचने की ख़बरें आती रही हैं.
प्राइवेट अस्पतालों में कोविड-19 के इलाज के लिए भारी दामों की वसूली की ख़बरों के बाद केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने इसको लेकर रेट-लिस्ट जारी की लेकिन कहा जा रहै है कि वो पूरी तरह से रुक नहीं पाया है.
राष्ट्रीय ब्लड पॉलिसी के मुताबिक़ ड्रग एंड कास्मेटिक्स एक्ट, 1940, के भीतर ख़ून को दवा की श्रेणी में रखा गया है और इसकी अवैध खरीद बिक्री की सज़ा में दो साल तक की जेल हो सकती है.
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