You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
असम में बाढ़ और कोरोना की दोहरी मार, राशन की क़िल्लत ने बदतर किए हालात
- Author, दिलीप कुमार शर्मा
- पदनाम, जोरहाट से, बीबीसी हिंदी के लिए
"करीब 15 दिनों से बाढ़ के पानी में फंसे हुए है. घर पर दो छोटे बच्चे हैं और बूढ़ी मां है. इस बीच प्रशासन ने एक बार प्रति व्यक्ति एक किलो चावल और 200 ग्राम दाल दी थी. उसके बाद हमारी सुध लेने कोई नहीं आया. आगे घर का राशन कैसे चलेगा, क्योंकि खेत तो पानी में डूबे हुए है."
47 साल के मोहम्मद नयन अली बाढ़ से उत्पन्न अपनी परेशानी बताते हुए अचानक कुछ देर के लिए बिलकुल खामोश हो जाते है.
दरअसल इस समय असम के कुल 33 में से 27 जिले बाढ़ के पानी में डूबे हुए है. असम राज्य आपदा प्रबंधन विभाग की तरफ़ से गुरूवार शाम 7 बजे जारी की गई एक रिपोर्ट के अनुसार 3218 गांवों में बाढ़ का पानी घुस आने से 39 लाख 79 हजार 563 लोग प्रभावित हुए है. बरपेटा ज़िले में सबसे अधिक गांव बाढ़ की चपेट में आए है. इनमें मोहम्मद नयन अली का गांव सिधोनी भी एक है.
असम में हर साल बाढ़ के कारण जान-माल की भारी तबाही होती है. लेकिन जटिल सरकारी प्रक्रियाओं के तहत जबतक बाढ़ के नुकसान का आंकलन होता है तबतक प्रदेश में अगली बाढ़ आ जाती है. लिहाजा लोग तटबंध निर्माण तथा अन्य मरम्मत के काम को लेकर हमेशा सरकार पर सवाल उठाते है.
मोहम्मद नयन अली भी बाढ़ की रोकथाम के लिए मौजूद सरकारी योजनाओं को समय पर लागू नहीं करने का मुद्दा उठाते हुए कहते है, "इस गांव में बसे हमारे परिवार को सौ साल से ज्यादा हो गया है. हमारे पास 1919 का अस्थाई ज़मीनी पट्टा है. मैं बचपन से बाढ़ का क़हर देखते आ रहा हूं. लेकिन पहले चार-पांच सालों में एक बार भयंकर बाढ़ आती थी. लेकिन अब प्रत्येक साल बाढ़ की भारी तबाही झेलनी पड़ रही है."
तक़रीबन तीन हज़ार आबादी वाले सिधोनी गांव में ज्यादातर लोग खेती करके अपनी जीविका चलाते हैं. लेकिन हर साल बाढ़ के कारण इनकी फ़सल बर्बाद हो जाती है. यहां अधिकतर किसानों का आरोप है कि बाढ़ का पानी सूखने के बाद ज़िला प्रशासन के लोग नुक़सान का आंकलन करने ज़रूर आते हैं लेकिन नुक़सान के एवज में मिलता कुछ नहीं है.
अली कहते हैं, "हमारा परिवार गरीबी रेखा के नीचे आता है. हर साल इस उम्मीद से खेती करते है कि कुछ पैसा बचाएंगें तो घर के हालात सुधरेंगे. लेकिन बाढ़ सबकुछ बर्बाद कर देती है. सरकारी अधिकारी बाढ़ से हुए नुक़सान की जानकारी के लिए फार्म भरवाते है. लेकिन बीते चार साल में हमारे नुक़सान के एवज में एक रुपया भी नहीं मिला."
असम में इस साल यह दूसरी बार बाढ़ आई है जिसमें अबतक 71 लोगों की मौत हो गई है. राज्य में बाढ़ के कारण बरपेटा के बाद सबसे ज्यादा नुक़सान धुबड़ी, मोरीगांव, धेमाजी, दरंग और डिब्रूगढ़ ज़िले में हुआ है.
असम राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के स्टेट प्रोजेक्ट को-ऑर्डिनेटर पकंज चक्रवर्ती ने बीबीसी से कहा, "अबतक बाढ़ में 71 लोगों की मौत हुई है और 26 लोगों की मौत भूस्खलन से हुई है. पिछले साल के मुकाबले इस साल बाढ़ की स्थिति ज्यादा भयानक है. ऊपरी असम के कई इलाक़ों में बाढ़ का पानी कम हुआ है लेकिन निचले असम में पानी का स्तर ख़तरे के निशान से ऊपर है. कोविड के कारण राहत शिविरों में लाए गए बाढ़ पीड़ित लोगों का विशेष ध्यान रखा जा रहा है. राहत शिविरों में लोगों को एक निश्चित शारीरिक दूरी के तहत रखा जा रहा है. सबको मास्क, सेनिटाज़र दिए गए है और पहले के मुकाबले ज्यादा शौचालयों की व्यवस्था की गई है."
आपदा प्रबंधन विभाग की एक जानकारी के अनुसार 23 ज़िलों में 748 राहत शिविर और 300 राहत केंद्र खोले गए है. इन राहत शिविरों में 49 हज़ार 313 लोग ठहरे हुए है. कई ज़िलों में जहां पक्की सड़के बाढ़ के पानी में डूब गई हैं वहीं दो दर्जन से अधिक पक्के-कच्चे पुल टूट गए है. बरपेटा और ग्वालपाड़ा ज़िले में कई लोगों के लापता होने की रिपोर्ट लिखाई गई है.
केंद्रीय जल आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार जोरहाट, तेजपुर, गुवाहाटी, ग्वालपाड़ा, धुबड़ी, ब्रह्मपुत्र और इसकी सहायक नदियां अपने ख़तरे के निशान से ऊपर बह रहीं है. बरपेटा ज़िले में बाढ़ से ज्यादा तबाही का एक कारण भूटान के कुरिचू हाइड्रोपावर प्लांट से छोड़े गए पानी को भी बताया जा रहा है.
इस संदर्भ में बरपेटा ज़िला उपायुक्त मुनींद्र शर्मा कहते है, "हमारे ज़िले में करीब 739 गांव बाढ़ के कारण प्रभावित हुए है. अबतक 11 लाख 65 हजार 363 लोग बाढ़ की चपेट में आए है. बाढ़ के पानी में डूबने से कुल 15 लोगों की जान गई है. हमारे ज़िले में भारी बारिश हो रही है और भूटान बीते करीब 10 दिनों से लगातार पानी छोड़ रहा है. इसलिए यहां बाढ़ से हालात और बिगड़ गए है."
क्या भूटान अपने हाइड्रोपावर प्लांट का पानी छोड़ने से पहले आपको सीधे अलर्ट करता है? इस सवाल का जवाब देते हुए ज़िला उपायुक्त शर्मा कहते हैं, "हमे अपनी सरकार की तरफ़ से अलर्ट किया जाता है. लेकिन अगर भूटान रोज़ाना हज़ार से 1500 क्यूमेक्स पानी छोडेगा तो ज़ाहिर है कि यहां बाढ़ की स्थिति और ख़राब होगी."
बाढ़ प्रभावित लोगों को राहत के नाम पर 15 दिनों में एक बार केवल एक किलो चावल देने के सवाल पर ज़िला उपायुक्त ने कहा कि कई इलाक़ों में बाढ़ का पानी घुसता है लेकिन वहां ज्यादा दिनों तक यह पानी नहीं ठहरता. ऐसे में ज़िला प्रशासन के लोग समूची स्थिति का मूल्यांकन करने के बाद ज्यादा प्रभावित लोगों को तीन-चार बार राहत देते हैं और जो लोग बाढ़ का पानी सूखने के बाद फिर सामान्य तरह से अपने घर रहने चले जाते है उन्हें बाद में राहत नहीं दी जाती.
पूर्वी असम वन्यजीव प्रभाग की एक जानकारी के अनुसार बाढ़ के कारण काजीरंगा नेशनल पार्क में 76 जानवरों की मौत हो गई है. जबकि 121 अन्य जानवरों को राष्ट्रीय उद्यान में बचाया गया है. इसके अलावा पार्क में मौजूद कुल 223 शिविरों में से 99 शिविर बाढ़ के पानी में डूब गए है और छह शिविर खाली करवाए गए है.
असम में साल-दर-साल भयानक बाढ़ आने के पीछे कई कारण बताए जाते हैं. ब्रह्मपुत्र नदी पर अध्ययन करने वाले जानकार बताते है कि बढ़ते प्रदूषण और तापमान से तिब्बत के पठार पर जमी बर्फ़ और हिमालय के ग्लेशियर तेज़ी से पिघल रहे हैं. इससे ब्रह्मपुत्र नदी पर बने बांधों और नदी दोनों का जलस्तर बढ़ेगा.
दरअसल तिब्बत में नदी के उद्गम स्थल पर तलछट इकट्ठा होना शुरू हो जाता है, क्योंकि ग्लेशियर पिघलकर मिट्टी को नष्ट कर देते हैं.
जैसे-जैसे पानी असम की ओर बढ़ता है, यह अधिक तलछट इकट्ठा करके अपने साथ लेकर आता है. जबकि ब्रह्मपुत्र की अन्य सहायक नदियाँ इस तलछट को नष्ट करने में अप्रभावी बताई जाती हैं, जिससे बड़े पैमाने पर बाढ़ आती है और मिट्टी का कटाव होता है. अपने साथ तलछट लाने वाली दुनिया की शीर्ष पांच नदियों में ब्रह्मपुत्र एक है.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)