प्रोफ़ेसर आनंद तुलतुंबडे: जेल में कटा 70वाँ जन्मदिन

    • Author, गीता पांडे
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

मानवाधिकारों के पक्षधर लेखक और शिक्षक प्रोफेसर आनंद तेलतुंबडे बीते कई महीनों से मुंबई की एक जेल में बंद हैं.

कई हस्तियां और संस्थाएं उनकी रिहाई के लिए कई बार माँग कर चुकी हैं. लेकिन इन सभी माँगों के बीच प्रोफेसर तेलतुंबडे जेल में रहते हुए सत्तर साल के हो गए हैं.

प्रोफेसर तेलतुंबडे अपने लेखों और किताबों में अन्याय देखकर चुप्पी साधने की आलोचना करते रहे हैं. और अपनी आलोचना में वो अक्सर जर्मन पादरी मार्टिन नीमोलर के इन ऐतिहासिक शब्दों को दुहराते हैं.

फिर वो मेरे लिए आए और तब तक कोई नहीं बचा था, जो मेरे लिए बोलता.

बीते बुधवार आनंद तेलतुंबड़े को मुंबई की जेल में बंद हुए नब्बे दिन बीत चुके हैं. उनका परिवार और मित्र ये कोशिश कर रहे हैं कि उनके सत्तरवें जन्मदिन पर उन्हें सन्नाटा न झेलना पड़े.

वह मुंबई की तलोजा जेल में बंद हैं. इस मौके पर कई पत्र और ग्रीटिंग कार्ड्स के जेल गेट पर पहुंचने की अपेक्षा है.

तेलतुंबडे को पत्र लिखने वाले तमाम लोगों में अमरीकी प्रांत न्यू जर्सी की विलियम पीटरसन यूनिवर्सिटी से जुड़े प्रोफेसर बालमुरी नटराजन भी शामिल हैं.

बीबीसी से बात करते हुए नटराजन कहते हैं, “आनंद एक सम्मानित शिक्षक हैं जिन्हें पूर्णतय: संदिग्ध कारणों से बंद कर दिया गया है. हम चाहते हैं कि उन्हें ये पता रहे कि हम लगातार उनके बारे में सोच रहे हैं, उनकी किताबें पढ़ रहे हैं.”

भारत के बेहतरीन विद्वानों में गिने जाने वाले प्रोफेसर तेलतुंबडे अब तक 30 किताबें लिख चुके हैं और वह भारत में जाति व्यवस्था पर अपने धारदार लेखन के लिए जाने जाते हैं.

दलित परिवार में जन्म लेने वाले प्रोफेसर तेलतुंबडे ने भारत की शीर्ष तेल कंपनियों में उच्च पदों पर काम करने के बाद अकादमिक क्षेत्र में कदम रखा है.

प्रोफेसर तेलतुंबडे वर्तमान में गोवा इंस्टीट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट में बिग डेटा प्रोग्राम के प्रमुख हैं.

‘हिटलर और मुसोलिनी से भी ख़तरनाक`

सरकार के मुखर विरोधी प्रोफेसर तेलतुंबडे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को “हिटलर और मुसोलिनी से भी ज़्यादा ख़तरनाक” और ‘बेहद आत्ममुग्ध’ शख़्स बताया है.

कोर्ट के आदेश पर प्रोफेसर तेलतुंबडे 14 अप्रैल को केंद्र सरकार की जांच एजेंसी के सामने दस अन्य कार्यकर्ताओं, कवियों और वकीलों के साथ पेश हुए. ये सभी लोग भीमा कोरेगाँव केस में गिरफ़्तार किए गए हैं.

इन लोगों को आतंकवाद विरोधी कानून यूएपीए के तहत गिरफ़्तार किया गया है जिसकी वजह से इन लोगों को जमानत मिलना लगभग असंभव सा है.

पुलिस का आरोप है कि इन लोगों ने 1 जनवरी 2018 को महाराष्ट्र के एक गाँव भीमा कोरेगाँव में दलित रैली के दौरान जातिगत हिंसा भड़काई.

हालांकि, जिन लोगों को हिरासत (या गिरफ़्तार) किया गया है, वे हिंसा के वक़्त गाँव में मौजूद नहीं थे.

लेकिन पुलिस का आरोप है कि बीती रात इन लोगों के दिए भाषणों की वजह से हिंसा भड़क उठी.

इन लोगों पर ये आरोप भी है कि ये वामपंथी, माओवादी विद्रोहियों, नक्सलियों के साथ मिलकर “भारत सरकार को गिराने और अव्यवस्था फैलाने के लिए” काम करते हैं.

लेकिन भारत और विदेशों में उनकी रिहाई की माँग करने वाले मानते हैं कि इन लोगों को भारत सरकार की आलोचना करने की वजह से जेल में डाल दिया गया है.

अंतरराष्ट्रीय संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल अब तक इन लोगों की रिहाई के लिए कई बार बयान दे चुकी है.

ऐसे ही एक बयान में एमनेस्टी इंटरनेशनल ने कहा था, “सभी 11 सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भारत के सबसे ज़्यादा अल्पसंख्यक समुदायों के हितों की रक्षा के लिए लगातार काम किया है.”

ह्युमन राइट्स वॉच नामक संस्था ने इन गिरफ़्तारियों को ग़लत और राजनीतिक रूप से प्रेरित बताया है. इस संस्था ने भारत सरकार से सवाल किया है कि सरकार ने इस हिंसा के पीछे हिंदू राष्ट्रवादी नेताओं के होने की जांच क्यों नहीं की?

रिहा करने की अंतरराष्ट्रीय माँग

मई महीने में यूरोपीय संसद की मानवाधिकार से जुड़ी उप-समिति ने गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर ये सूचित किया था कि समिति प्रशासन द्वारा मानवाधिकारों की रक्षा करने वालों की प्रताड़ना और डराने-धमकाने से काफ़ी चिंतित है.

इस पत्र में कोरोना वायरस महामारी को देखते हुए ऐसे सभी लोगों को रिहा करने का आग्रह किया था. इनमें से ज़्यादातर लोग बीमार और वृद्ध हैं जिसकी वजह से उनको भीड़ भरे जेलों में कोरोना वायरस से संक्रमित होने का ख़तरा बहुत ज़्यादा है.

प्रोफेसर नटराजन कहते हैं कि भारत हमेशा से अलग-अलग “विचारों की जगह” रहा है. उन्होंने लेखक अमृत्य सेन के उस बयान के बारे में बताया जिसमें उन्होंने भारतीयों को बहस करने वाला बताया था. लेकिन बीते आठ सालों में बहस और वाद – विवाद का स्पेस ख़त्म होता जा रहा है.

वह कहते हैं कि प्रोफेसर तेलतुंबडे बीते तीस सालों से पूरी दुनिया में धर्म एवं जाति के आधार पर हो रही राजनीति के मुद्दे पर अहम बहसों को दिशा दे रहे थे.

वह कहते हैं, “वह जातिगत समस्याओं को न मानने वाले और हिंदू राष्ट्र बनाने के पक्ष में रहने वालों पर निशाना साधते रहे हैं. उन्होंने ताकतवर वर्गों पर उंगली उठाने की जुर्रत की. वह उनसे कह रहे थे – ‘देखिए, ये सब कुछ आपने किया है और इसकी वजह से भारत की बहुसंख्यक आबादी परेशानी में जी रही है. और यही बात उन्हें एक ख़तरनाक व्यक्ति बनाती है.”

परिवार का हाल बुरा

तेलतुंबडे की पत्नी रमा बताती हैं कि दो साल पहले जब तेलतुबंडे को ये पता चला कि भीमा कोरेगाँव मामले के अभियुक्तों की सूची में उनका नाम भी शामिल है तो वे चौंक गए.

रमा ने मुंबई से फोन पर मुझे बताया, “हमने अपने सपने में भी नहीं सोचा था कि हमारे साथ ऐसा कुछ हो सकता है.”

“मेरे पति एक अपराधी नहीं हैं…”, ये कहते हुए रमा भावुक हो जाती हैं.

वह कहती हैं, “वह पढ़ाने वाले, अपने काम में लगे रहने वाले, हर रोज़ 14 – 15 घंटे पढ़ने, लिखने और पढ़ाने वाले शख़्स हैं.”

जब उनके पास खाली समय होता तो वे ग़रीबों और अल्पसंख्यकों की मदद करने की कोशिश करते थे क्योंकि वे एक बेहतर भारत और समानता में यकीन रखने वाला भारत देखना चाहते थे.

वे कहती हैं, “इसके लिए जेल में डाला जाना एक बहुत बड़ी कीमत अदा करना है”

जब से रमा के पति आनंद तेलतुबंडे जेल गए हैं तब से रमा को हर हफ़्ते दो मिनट तक अपने पति से बात करने की इजाज़त है.

रमा कहती हैं, “मैं हमेशा उनसे पूछती हूँ कि उनकी सेहत कैसी है. जेल का खाना कैसा है क्योंकि मैं जानती हूँ कि जेल का खाना बेहद ख़राब होता है. लेकिन वो ये नहीं चाहते कि हम चिंता करें. इसके लिए वो हमेशा कहते हैं कि वे ठीक हैं. इसके बाद वह अपनी माँ और बेटियों के बारे में पूछते हैं.”

ख़तरे में अधिकार

रमा भारतीय संविधान के लेखक और लाखों दलितों के आदर्श भीम राव अंबेडकर की नातिन हैं.

वह कहती हैं कि उनके बाबा इस भारत को पहचान ही नहीं पाते.

रमा कहती हैं, "मुझे नहीं लगता है कि उन्होंने इस तरह के भारत की कल्पना की होगी जहां लोग अपने मन की बात कहने के लिए गिरफ़्तार किए जाएंगे. हम एक लोकतंत्र में रहते हैं और अपनी बात कहने का अधिकार हमें संविधान से मिला है.”

लेकिन आलोचकों की मानें तो वर्तमान भारत में ये अधिकार काफ़ी ख़तरे में है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना करने वालों पर राष्ट्रवादी ट्रोल्स सोशल मीडिया पर हमला करते हैं. सरकार की आलोचना करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं और छात्रों को जेल भेजा जा रहा है.

इसी साल दिल्ली में पुलिस ने विवादित नागरिकता क़ानून का विरोध करने पर कई छात्रों को गिरफ़्तार कर लिया था. आलोचक कहते हैं कि ये क़ानून मुस्लिमों के साथ भेदभाव करता था.

इन छात्रों को सरकार समर्थित न्यूज़ चैनलों ने देश तोड़ने में लगे एंटी-नेशनल्स की संज्ञा दी. महिला कार्यकर्ताओं का सोशल मीडिया पर चरित्र हनन किया गया.

ज़्यादातर छात्र भीड़ भरे जेलों में अपने दिन काट रहे हैं. लेकिन हाल ही में एक गर्भवती छात्रा सफूरा जरगर को अंतरराष्ट्रीय निंदा के बाद रिहा किया गया है.

क्या हैं आरोप?

तेलतुंबडे के वक़ील मिहिर देसाई कहते हैं, “सरकार लोगों को काफ़ी हल्के चार्ज के तहत गिरफ़्तार करके उनकी आज़ादी के साथ खिलवाड़ कर रही है. प्रोफेसर तेलतुंबडे के ख़िलाफ़ मुख्य आरोप ये है कि वह नक्सलियों से पैसे ले रहे थे और उनकी विचारधारा को फैलाकर उनके लिए नए सिपाही तैयार कर रहे थे.”

वह कहते हैं कि पुलिस ने जब तेलतुंबडे के घर पर छापा मारा तो उन्हें कोई हथियार या नकदी नहीं मिला.

देसाई कहते हैं कि पुलिस ने अब तक उनके ख़िलाफ़ जो सुबूत पेश किए हैं वो सिर्फ ‘चार पत्र’ हैं जो कि एक प्रेस कॉनफ्रेंस के दौरान लहराए गए थे.

वह कहते हैं कि ये पत्र टाइप किए हुए हैं. इन पर कोई हस्ताक्षर, पता या ईमेल एड्रेस नहीं है.

वह कहते हैं कि ये पत्र आनंद तेलतुंबडे द्वारा नहीं लिखे गए हैं. और न ही ये पत्र उनको लिखे गए हैं. इन सभी पत्रों में सिर्फ एक कॉमन शब्द है जो कि ‘आनंद’ है.

ये एक बेहद आम भारतीय नाम है.

देसाई कहते हैं, “ऐसा लगता है कि ये पत्र बनाए गए हैं. अगर ये पत्र असली भी हैं तो भी इनमें ये कैसे साबित होता है कि पत्र में जिस आनंद का ज़िक्र है वो प्रोफेसर आनंद तेलतुंबडे ही हैं. और कोई भी किसी को भी कुछ भी लिख सकता है, लेकिन क्या वो सबूत हो जाएगा. इसे सबूत नहीं माना जा सकता है.”

देसाई कहते हैं कि ये सबूत कोर्ट में सवालों का सामना नहीं कर पाएंगे लेकिन ये पूरी कार्रवाई ही अपने आप में एक सज़ा है.

वह कहते हैं, “अगर एक व्यक्ति केस चलते हुए दस साल जेल में रह लेता है तो उसकी ज़िंदगी बर्बाद हो जाती है.”

प्रोफेसर आनंद तेलतुंबडे को जेल गए तीन महीने हो चुके हैं. उनकी पत्नी रमा कहती हैं कि उनकी बस एक मांग है कि उनके पति को जमानत पर रिहा किया जाए और सरकार उनके मामले की कोर्ट में सुनवाई शुरू करे ताकि उनका नाम बाहर किया जा सके.

खुला ख़त

हिरासत में लिए जाने से एक दिन पहले प्रोफेसर आनंद तेलतुंबडे ने एक ओपन लैटर लिखा था. पत्र में उन्होंने लिखा था कि बीते दो सालों में उनके परिवार ने किस तरह प्रताड़ना झेली है और किस तरह उनके घर पर छापा मारा गया, उनके विकिपीडिया पेज़ के साथ छेड़छाड़ की गई, सरकार ने उनके फोन में एक इसरायली स्पाईवेयर डाल दिया है.

उन्होंने लिखा, “जैसा कि मैं देख रहा हूँ कि मेरे भारत को तबाह किया जा रहा है. मैं बहुत कम उम्मीद के साथ लिख रहा हूँ कि मुझे नहीं पता कि मैं अब आपसे कब बात कर पाऊंगा. हालांकि, मैं आशा करता हूँ कि आप अपनी बारी आने से पहले बोलेंगे.”

प्रोफेसर नटराजन कहते हैं, “सरकार उन लोगों को दबाने की कोशिश कर रही है जो कि सरकार से तर्क और बहस करने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन मेरी बात याद रखिए कि आनंद को दबाया नहीं जा सकेगा. आप लोगों को जेल में डाल सकते हैं, प्रताड़ित कर सकते हैं, मार सकते हैं. लेकिन आप उनके विचारों को नहीं मार सकते.”

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)