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अजीत डोभाल: कश्मीर, दिल्ली दंगों से लेकर चीन तक मोदी सरकार की हर मर्ज़ की दवा क्यों हैं?
- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
अजीत डोभाल को पसंद नहीं करने वाले लोग पीठ पीछे उनको 'दारोगा' कहकर पुकारते हैं. विदेश मंत्रालय में उनके आलोचक भी उनकी एनएसए (पाकिस्तान) कहकर तफ़रीह लेते हैं.
ऐसा करने की शायद वजह ये है कि इन लोगों की नज़र में डोभाल को कूटनीति और विदेश नीति की उतनी समझ नहीं है जितनी कि इस पद की दरकार है. इसलिए पिछले दिनों जब डोभाल की चीन के रक्षा मंत्री वाँग यी से दो घंटे वीडियो कॉन्फ़्रेंस के बाद जब चीनी सेनाओं ने उस इलाके से पीछे हटना शुरू कर दिया जिस पर वो कुछ दिन पहले अपना दावा करते आए थे तो कई लोगों की भौहें ऊपर उठी थीं.
ये पहला मौका नहीं था जब डोभाल ने चीन को अपने रुख़ में परिवर्तन करने के लिए मनाया था. वर्ष 2017 में भी जब डोकलाम में भारत और चीन के सैनिक आमने सामने खड़े थे, डोभाल ने ब्रिक्स बैठक के दौरान उस समय के अपने समकक्ष याँग जी ची से बात कर मामले को तूल पकड़ने से बचवाया था.
उनकी ये बातचीत न सिर्फ़ फ़ोन पर जारी रही बल्कि जर्मनी के शहर हैम्बर्ग में मिलकर उन्होंने दोनों तरफ़ के सैनिकों के पीछे हटने का ख़ाका तैयार किया था. इस कूटनीतिक बातचीत के बीच डोभाल चीनियों तक ये संदेश भी पहुंचाने में कामयाब रहे थे कि अगर इसका समाधान नहीं किया गया तो नरेंद्र मोदी की ब्रिक्स सम्मेलन में शिरकत ख़तरे में पड़ सकती है.
एनएसए के पद पर पहुंचने वाले दूसरे ख़ुफ़िया अधिकारी
भारत के इतिहास में डोभाल पाँचवें राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हैं. वर्ष 1998 में अमरीका की तर्ज़ पर वाजपेयी के शासनकाल में ये पद बनाया गया था. इस पर पहली नियुक्ति पूर्व राजनयिक ब्रजेश मिश्रा की हुई थी जो इस पद पर वर्ष 2004 तक रहे थे.
हालांकि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की भूमिका में रक्षा, ख़ुफ़िया तंत्र और कूटनीति तीनों का समावेष होता है लेकिन अब तक बने पाँच राष्ट्रीय सुरक्षा सलाकारों में से तीन ब्रजेश मिश्रा, जे.एन दीक्षित और शिवशंकर मेनन कूटनीति के क्षेत्र से आए हैं.
डोभाल से पहले एम.के नारायणन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के पद पर पहुंचने वाले अकेले ख़ुफ़िया अधिकारी थे.
दिल्ली के दंगों को काबू करने में डोभाल की भूमिका
आमतौर से राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार नेपथ्य में रह कर सलाह देने का काम किया करते थे. उनका काम दिल्ली में बैठ कर हर जगह से सूचनाएं एकत्रित कर सरकार को सलाह देना हुआ करता था. लेकिन नरेंद्र मोदी ने अजीत डोभाल का इस्तेमाल ग़ैर-परंपरागत मामलों के लिए किया है.
जब दिल्ली में दंगे हुए तो मोदी ने डोभाल को इलाके में कानून और व्यवस्था पर नियंत्रण करने के लिए भेजा. ये शायद पहला मौका था कि किसी एनएसए ने न सिर्फ़ इलाके में जाकर हालात का जाएज़ा लिया बल्कि पीड़ित लोगों से बात भी की.
आमतौर से एनएसए ने इस तरह चीज़ों को 'माइक्रो मैनेज' करने और सरकार का चेहरा बनने की अपेक्षा नहीं की जाती. इस कदम को इसलिए भी असामान्य माना गया क्योंकि अमित शाह भारत के गृह मंत्री थे और दिल्ली की पुलिस उनको रिपोर्ट कर रही थी.
प्रधानमंत्री ने डोभाल को भेजने का अभूतपूर्व फ़ैसला इसलिए लिया क्योंकि अहमदाबाद में अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप का हज़ारों लोगों द्वारा स्वागत किए जाने के तुरंत बाद देश की राजधानी में इस तरह की हिंसा फैली कि ट्रंप की यात्रा कवर करने आए पूरी दुनिया के मीडिया की निगाह उस तरफ़ उठ गई.
एक पूर्व पुलिस अधिकारी का मानना है कि डोभाल को हिंदू मुस्लिम दंगे पर नियंत्रण करने के लिए इसलिए भेजा गया, क्योंकि अमित शाह खुद दंगा ग्रस्त इलाकों में घूम कर मुसलमानों से संवाद स्थापित नहीं कर सकते थे.
डोभाल दंगाग्रस्त इलाकों में एक नहीं दो बार गए और उन्होंने न सिर्फ़ पुलिस अधिकारियों को निर्देश दिए बल्कि दोनों समुदाय के नेताओं से बात कर तनाव को कम करने की कोशिश भी की.
धारा 370 हटने के बाद डोभाल एक पखवाड़े तक कश्मीर में रहे
हिंदु-मुस्लिम दंगों को रोकने में डोभाल के पुराने ट्रैक रिकॉर्ड की भी इसके पीछे भूमिका थी. 1968 बैच के केरल काडर के अजीत डोभाल ने 1972 में भी थलासरी दंगों को काबू करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी और एक हफ़्ते के अंदर स्थिति को सामान्य कर दिया था.
यह पहली बार नहीं था जब डोभाल को अपनी परंपरागत भूमिका से आगे कर कुछ अतिरिक्त करने की ज़िम्मेदारी दी गई थी. जब कश्मीर में अगस्त में धारा 370 हटाई गई तो डोभाल ने कश्मीर में लॉकडाउन की शुरुआत के दिनों में पूरे एक पखवाड़े तक कैंप किया. उसी दौरान उनका एक वीडियो भी वायरल हुआ जहाँ वो कश्मीर के सबसे तनावग्रस्त इलाकों में से एक शोपियाँ में स्थानीय लोगों के साथ बिरयानी खाते देखे गए.
एक और वीडियो में उन्हें जम्मू-कश्मीर पुलिस और अर्ध सैनिक बलों के जवानों के साथ बात करते हुए भी देखा गया. इन दोनों वीडियो से कश्मीर के बाहर रहने वाले लोगों को संदेश गया कि कश्मीर में शांति है और वहाँ हालात नियंत्रण में हैं.
अभी हाल में कोरोना फैलने के बाद जब दिल्ली में निज़ामुद्दीन में तबलीगी जमात का मरकज़ कोरोना का हॉटस्पॉट बन गया तो अजीत डोभाल ने रात दो बजे वहाँ जाकर जमात के नेतृत्व को वो स्थान खाली करने के लिए मनाया. ये डोभाल के कार्यक्षेत्र में नहीं आता था लेकिन तब भी मोदी ने इस संवेदनशील काम को लिए डोभाल को चुना.
लालडेंगा को समझौते के लिए तैयार करने में डोभाल की भूमिका
इससे पहले भी डोभाल ने अपने इंटेलिजेंस ब्यूरो के कार्यकाल में कई ऑपरेशन सफलतापूर्वक अंजाम दिए हैं. सुरक्षा मामलों पर लिखने वाले निखिल गोखले बताते हैं कि 1986 में हुआ मिज़ोरम समझौते का श्रेय डोभाल को दिया जाना चाहिए.
बीच के स्तर के आईबी अधिकारी के तौर पर डोभाल ने भूमिगत मिज़ो नेशनल फ़्रंट के नेतृत्व में घुसपैठ की और उनके चोटी के एक दर्जन कमांडरों को अपनी तरफ़ मोड़ लिया.
नतीजा ये हुआ कि एमएनएफ़ के नेता लालडेंगा को भारत से शांति वार्ता करने के लिए बाध्य होना पड़ा. डोभाल लालडेंगा के ड्रिंकिंग पार्टनर बन गए और उनका विश्वास जीतने में पूरी तरह से सफल रहे.
प्रवीण दोथीं ने कारवाँ पत्रिका के अगस्त, 2017 में छपे अपने लेख 'अंडरकवर - अजीत डोभाल इन थियोरी एंड प्रैक्टिस' में लिखा, "पाकिस्तान में अपने कार्यकाल के दौरान डोभाल कहूटा में पाकिस्तान के परमाणु संयंत्र के पास एक नाई की दुकान से पाकिस्तानी वैज्ञानिकों के बाल का सैंपल ले आए जिससे ये तय करने में आसानी हुई कि कहूटा में किस ग्रेड के यूरेनियम के साथ काम किया जा रहा है."
मोदी और बीजेपी से नज़दीकियां
कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस समय नरेंद्र मोदी और अमित शाह के बाद अजीत डोभाल भारत के तीसरे सबसे ताकतवर शख़्स हैं.
भारतीय ख़ुफ़िया विभाग के एक अधिकारी ने नाम न लिए जाने की शर्त पर बताया कि डोभाल "भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसियों के कमांड स्ट्रक्चर को बाईपास करते हुए फ़ील्ड एजेंटों से सीधे संपर्क में रहते हैं."
मोदी से उनकी नज़दीकी उनके प्रधानमंत्री बनने से पहले शुरू हो चुकी थी, जब डोभाल विवेकानंद फ़ाउंडेशन के प्रमुख हुआ करते थे.
वर्ष 2014 में जब बीजेपी सत्ता में आई तो राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के पद के लिए पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल, वर्तमान विदेश मंत्री सुब्रमण्यम जयशंकर, पूर्व राजनयिक हरदीप पुरी और अजीत डोभाल के नाम पर विचार हुआ लेकिन नरेंद्र मोदी ने डोभाल के नाम पर ही मोहर लगाई.
उनकी नियुक्ति पर शिशिर गुप्ता ने हिंदुस्तान टाइम्स में लिखा था, "संघ परिवार को डोभाल पर विश्वास है. इंटेलिजेंस ब्यूरो से रिटायर होने के बाद उन्होंने पर्दे के पीछे रह कर बीजेपी और नरेंद्र मोदी की काफ़ी मदद की है."
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उस समय बीजेपी के करीबी रहे स्वामीनाथन गुरुमूर्ति ने भी ट्वीट कर कहा था, "डोभाल छत्रपति शिवाजी और भगत सिंह के समकालीन संस्करण हैं." लेकिन वर्ष 2014 में जब डोभाल से बीजेपी से उनकी नज़दीकियों के बारे में पूछा गया तो उनका जवाब था, "मैं किसी राजनीतिक दल का सदस्य न तो हूँ और न कभी रहा हूँ. मैं नहीं समझता कि अब मैं किसी सरकार में कोई पद ग्रहण करूँगा."
दिलचस्प बात ये है कि बीजेपी की विरोधी कांग्रेस के कार्यकाल में अजीत डोभाल को इंटेलिजेंस ब्यूरो का प्रमुख बनाया गया था. आडवाणी के साथ नज़दीकी के बावजूद नए राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जेएन दीक्षित से भी उनकी बहुत बनती थी.
जेएन दीक्षित के बाद राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बने एम.के नारायणन तो खुलेआम कहा करते थे कि "जब कभी मुझे किसी मामले में नर्म रुख़ अपनाना होता है तो मैं अमरजीत सिंह दुलत का इस्तेमाल करता हूँ और जब कभी मुझे डंडे से काम लेना होता है तो मैं डोभाल को बुलवाता हूँ."
व्हाइट हाउस में मोदी की मदद
नरेंद्र मोदी और अजीत डोभाल के बीच घनिष्टता बढ़ने के कई किस्से मशहूर हैं. मसलन डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद जब नरेंद्र मोदी पहली बार अमरीका गए तो जब मोदी व्हाइट हाउस के लॉन में संवादादाताओं के सामने अपना वक्तव्य पढ़ने ही वाले थे कि तेज़ हवा ने डायस पर रखे मोदी के भाषण के कुछ काग़ज़ उड़ा दिए.
पहली पंक्ति में भारतीय विदेश सचिव और अमरीका में भारतीय राजदूत के साथ बैठे 72 वर्षीय डोभाल ने दौड़कर उड़ गए काग़ज़ों को जमा किया, उन्हें करीने से लगाया और अपने बॉस के हवाले किया. वहाँ से हटने से पहले उन्होंने हवा से उड़ गए मोदी के ग्लास के कवर को भी उसके नियत स्थान पर रखा.
मोदी ने वो भाषण बिना किसी व्यवधान के दिया. प्रधानमंत्री के साथ गए अधिक्तर पत्रकारों का ध्यान उस तरफ़ नहीं गया लेकिन एक अख़बार ने ज़रूर सुर्ख़ी लगाई, 'हाऊ डोभाल रेस्क्यूड पीएम मोदी इन व्हाइट हाउस इवेंट.'
डोभाल चीन पर मोदी के प्वाइंट पर्सन
आम धारणा ये है कि मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद उनके शपथ ग्रहण समारोह में दक्षिण एशियाई नेताओं को आमंत्रित करने की सलाह उन्हें विदेश मंत्रालय के किसी अधिकारी ने दी होगी. लेकिन तथ्य ये है कि मोदी ने ऐसा अजीत डोभाल की सलाह पर किया था.
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ ने भी इस न्योते को स्वीकार कर मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में शिरकत की थी और इसको पड़ोसी देशों से संबंध सुधारने की दिशा में एक बड़ा कदम माना गया था. चूँकि जयशंकर चीन में भारत के राजदूत रह चुके हैं और डोभाल ने अपने करियर का बहुत अधिक समय पाकिस्तान की गतिविधियों पर नज़र रखने में लगाया था, इसलिए उम्मीद की जाती थी कि मोदी चीन पर जयशंकर और पाकिस्तान पर डोभाल की सलाह को तरजीह देंगे. लेकिन हुआ इसका उल्टा ही.
मोदी ने चीन के साथ सीमा विवाद पर डोभाल को अपना मुख्य वार्ताकार नियुक्त किया और कूटनीतिक हल्कों में इसकी चर्चा थी कि डोभाल ने मोदी से माँग कर ये भूमिका अपने लिए ली थी और अगर विदेश नीति पर नज़र रखने वाले जानकारों की बात मानी जाए तो डोभाल ने इस संदर्भ में प्रधानमंत्री को निराश नहीं किया है.
डोभाल को हमेशा से एक 'ऑपरेशन मैन' माना जाता रहा है. वो चीज़ों को दीर्घकालीन नज़रिये से देखने के आदी नहीं रहे हैं.
उनकी वर्तमान ज़िम्मेदारियों के लिए जिस तरह की कूटनीतिक और राजनीतिक समझ की ज़रूरत होती है, डोभाल उसके लिए ट्रेन्ड नहीं हैं और न ही इस क्षेत्र में उनका कोई पूर्व अनुभव रहा है लेकिन इसके बावजूद उन्होंने इसे अपनी कमज़ोरी नहीं बनने दिया है. चीन के साथ उनकी बातचीत के परिणाम इसके गवाह हैं.
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