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विकास दुबे 'मुठभेड़' या हैदराबाद 'एनकाउंटर': सड़क पर इंसाफ़, जश्न और वही सवाल
- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बेंगलुरु से, बीबीसी हिंदी के लिए
उत्तर प्रदेश पुलिस के साथ कथित मुठभेड़ में विकास दुबे की मौत ने हैदराबाद पुलिस के उस एनकाउंटर की याद दिला दी है जिसमें एक वेटरिनरी डॉक्टर के साथ गैंगरेप मामले में सभी चार अभियुक्तों को मार दिया गया था.
हालांकि ये दोनों अलग-अलग घटनाएं हैं लेकिन क़ानून के जानकारों का कहना है कि दोनों ही मामलों में क़ानून के शासन को ताक पर रख दिया गया था.
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस (रिटायर्ड) गोपाल गौड़ा का कहना है, "पुलिस लॉकअप में कोई भी मौत (जैसा कि तमिलनाडु के तूतीकोरिन में हुआ था) हो या मुठभेड़ में, ये क़ानून के शासन का खुल्लम-खुल्ला उल्लंघन है. किसी को भी चाहे वो पुलिस ही क्यों न हो, क़ानून अपने हाथ में नहीं लेना चाहिए."
तकरीबन आठ महीने पहले, शमशाबाद के पास एक नौजवान वेटरिनरी डॉक्टर की गैंगरेप के अगले दिन ही साइबराबाद पुलिस ने दो ट्रक ड्राइवरों और उनके दो हेल्परों को गिरफ़्तार किया था.
गिरफ़्तार किए गए चारों लोगों पर उस महिला की गैंग रेप का आरोप लगाया गया था.
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छह दिसंबर को पुलिस इन चारों लोगों को मौका-ए-वारदात पर 'तफ़्तीश के इरादे' से ले गई. इसी जगह पर उस लड़की को जला दिया गया था.
पुलिस ने दावा किया कि दो अभियुक्तों ने उनका रिवॉल्वर छीनने की कोशिश की, जिसके बाद उन्होंने सभी अभियुक्तों पर गोलियां चलाईं.
हैदराबाद की उस गैंग रेप की घटना और उसके बाद हुए एनकाउंटर, दोनों ही मामलों को लेकर देश भर में बहस और हंगामा हुआ.
लेकिन चौंकाने वाली सबसे बड़ी बात ये थी कि लोगों ने अभियुक्तों के मारे जाने पर जश्न मनाया.
फिल्मों में जिस तरह से सड़क पर इंसाफ़ होते हुए दिखाया जाता है, उसके लिए बढ़ते समर्थन ने व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं.
एसआईटी कर रही है हैदराबाद एनकाउंटर की जाँच
तेलंगाना की सरकार ने हैदराबाद एनकाउंटर की जांच के लिए एक स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (एसआईटी) का गठन किया और सुप्रीम कोर्ट ने भी जनवरी में ही तीन सदस्यों की एक ज्युडिशियल कमीशन का गठन किया था.
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस (रिटायर्ड) वीएस सिरपुरकर की अगुवाई में गठित इस ज्युडिशियल कमीशन में बॉम्बे हाई कोर्ट की जस्टिस रेखा बालडोटा और सीबीआई के पूर्व निदेशक डीआर कार्तिकेयन भी सदस्य हैं.
डीआर कार्तिकेयन ने बीबीसी हिंदी को बताया, "कमीशन को सारे दस्तावेज़ मुहैया करा दिए गए लेकिन कोरोना महामारी और लॉकडाउन की वजह से हैदराबाद स्थित तेलंगाना हाई कोर्ट परिसर में अपना कामकाज नहीं शुरू किया जा सके."
कमीशन को दफ्तर के लिए तेलंगाना हाई कोर्ट परिसर में ही जगह दी गई थी.
एक जैसे लेकिन अलग मामले
अभियुक्तों की गिरफ़्तारी और उनका मारा जाना, चाहे वो पुलिस लॉकअप में हो या फिर कथित मुठभेड़ों में, नई बात नहीं है.
सत्तर के दशक के आख़िर में और यहां तक कि अस्सी के दशक में भी पुलिस की नक्सलियों और आपराधिक गिरोहों के साथ एनकाउंटर्स हुआ करते थे.
लेकिन विकास दुबे का ताज़ा मामला और हैदराबाद गैंग रेप के बाद एनकाउंटर किलिंग जैसे मामले कई वजहों से अलग दिखाई देते हैं.
विकास दुबे अपराध की दुनिया का वो नाम था जिसके तार राजनेताओं से भी जुड़े हुए थे.
हैदराबाद में रहने वाले समाजशास्त्री और पेशे से वकील कल्पना कन्नाबिरन बीबीसी हिंदी से कहती हैं, "बेहद ताक़तवर माने जाने वाले विकास दुबे के राजनीतिक आकाओं को बचाने के लिए उसे खामोश कर दिया गया. जबकि हैदराबाद एनकाउंटर के अभियुक्त पूरी तरह से कमज़ोर थे. वे समाज के ग़रीब और बेरोज़गार तबके से आते थे. उन्हें ख़त्म कर देने से समाज की तरफ़ से कोई आवाज़ नहीं उठने वाली थी."
सिस्टम पर टूटता भरोसा
लेकिन जब वे मारे गए तो लोग जश्न मना रहे थे?
कल्पना कन्नाबिरन कहती हैं कि लोग क्या कर रहे हैं, उस पर ध्यान देने के बजाय पुलिस के बर्ताव पर ध्यान दिया जाना चाहिए.
वो कहती हैं, "क़ानून का शासन लागू करने के लिए संविधान में प्रावधान है लेकिन इसके बावजूद सरकार इस तरह से बर्ताव कर रही है. अगड़ी जाति के लोग हो सकता है कि छुआछूत की परंपरा पर जश्न मनाते हों लेकिन क्या हम संविधानिक प्रावधानों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं जिन पर हमने ये देश बनाया है?"
"(गैंग रेप के चार अभियुक्तों के मारे जाने के मामले में) कोई भी इस सवाल का जवाब नहीं चाहता है कि मारे गए लोग आख़िर कौन थे. उनकी कोई पहचान नहीं थी. वे पूरी तरह से अनजान लोग थे. पूरी तरह से छोड़ देने लायक. क्या आपको उनमें से किसी का भी नाम याद है? लेकिन विकास दुबे को दस साल बाद भी लोग याद रखेंगे. आप जानते हैं कि मारा गया शख़्स कौन था, वो किन लोगों के लिए काम करता था. यहीं पर बहुत बड़ा फर्क आ जाता है. ये लोगों के सिस्टम पर भरोसा खो रहे लोगों का सवाल नहीं है. ये कुछ और संकेत देता है."
मोहम्मद आरिफ, चिंताकुंता चेन्नाकेशावुलु, जोल्लु शिवा और जोल्लु नवीन हैदराबाद गैंग रेप के चारों अभियुक्त थे.
कल्पना कन्नाबिरन कहती हैं, "ये एक हिंसा के राज का संकेत देता है. योगी की सरकार एनकाउंटर की सरकार के नाम से मशहूर है क्योंकि उन्होंने पुलिस को हद से ज़्यादा ताकत दे दी है और पिछले कुछ सालों से उन पर किसी तरह का नियंत्रण नहीं रह गया है."
जस्टिस गौड़ा कहते हैं, "ये कहना ठीक नहीं है कि इंसाफ़ में देरी होने की वजह से लोग जल्द कार्रवाई की सराहना करते हैं. अभियुक्त चाहे कोई भी हो, एक समुचित सुनवाई की जानी चाहिए."
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