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शिवराज के जी का जंजाल कैसे बन गया मंत्रिमंडल विस्तार?
- Author, शुरैह नियाज़ी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिये, भोपाल से
मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के लिये नए मंत्रियों का विभाग वितरण जी का जंजाल बन गया है. पहले मंत्रिमंडल विस्तार में देरी हुई और उसके बाद अब विभागों के वितरण में भी मंत्रियों को लंबा इंतज़ार करना पड़ रहा है.
इसकी वजह ज्योतिरादित्य सिंधिया बताए जा रहे हैं जिनके बारे में कहा जा रहा है कि वो अपने करीबियों को मलाईदार विभाग दिलवाना चाहते हैं.
मध्यप्रदेश में इस वक़्त 33 मंत्री हैं जिनमें से 28 मंत्रियों ने 2 जुलाई को मंत्री पद की शपथ ली है. ये मंत्री लगभग 1 हफ्ते के बाद भी बिना विभाग के हैं. पांच मंत्री ऐसे ही जिन्हें अप्रैल माह में शपथ दिलाई गई थी और उनके पास विभाग हैं.
विभाग को लेकर खींचतान ऐसी है कि 28 मंत्रियों को शपथ दिलाने के बाद शिवराज सिंह चौहान इस मसले का हल निकालने दिल्ली भी हो आए हैं. वहाँ दो दिन तक रहने के बाद भी नतीजा कुछ नहीं निकला तो वापस भोपाल आ गए हैं और लगातार यही कहा जा रहा है कि विभागों का वितरण जल्द हो जाएगा.
गुरुवार को कैबिनेट की बैठक सुबह रखी गई थी लेकिन विभाग वितरण नहीं होने की वजह से इसे शाम को कर दिया गया, लेकिन जब शाम तक भी फैसला नही हो पाया तो इसे स्थगित कर दिया गया.
समझा जाता है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया अपने करीबी मंत्रियों को परिवहन, राजस्व, वाणिज्यिक कर, जल संसाधन, महिला एवं बाल विकास और आबकारी जैसे विभाग दिलाने चाहते हैं वहीं भाजपा उन्हें वो विभाग देने को तैयार है जो इनके पास कांग्रेस की कमलनाथ सरकार के वक़्त थे.
लेकिन कहा जा रहा है कि कांग्रेस को सत्ता से बेदखल करके भाजपा की सरकार बनवाने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया पूरी कीमत वसूलना चाहते है. इस वजह से भाजपा नेतृत्व ने भी विभागों की सूची को हरी झंडी नहीं दी.
भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व अभी किसी भी तरह से सिंधिया को नाराज़ नहीं करना चाहता है.
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वजह सिंधिया या पार्टी?
वहीं राजनीतिक विश्लेषक गिरिजा शंकर का कहना है कि यह पूरा मामला ज्योतिरादित्य सिंधिया और भाजपा अलाकमान का है इसमें शिवराज सिंह चौहान या राज्य के नेतृत्व का कोई लेना देना नही है.
उन्होंने कहा, "कांग्रेस की सरकार को गिराने के लिए भाजपा नेतृत्व ने क्या वादे किए सिंधिया से, यह उसी का नतीजा है. पार्टी को वो वादे पूरे करने होंगे इसलिए ये सब इतना लंबा चल रहा है."
वो आगे कहते है कि राज्य के नेतृत्व और नेताओं का सरकार गिराने में कोई ज्यादा योगदान नहीं था इसलिए हर बात केंद्रीय नेतृत्व के ज़रिये ही हो रही है.
वहीं एक अन्य राजनीतिक विश्लेषक दिनेश गुप्ता इससे सहमत नहीं हैं. उनका कहना है कि इस पूरे मामले से ज्योतिरादित्य सिंधिया का कुछ भी लेना देना नहीं है.
उन्होंने कहा, "यह मामला पूरी तरह से भाजपा के अंदर का है. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और भाजपा के वरिष्ठ मंत्री जो बने हैं वो बड़े विभाग चाहते हैं और उन्हीं की वजह से यह देरी हो रही है."
दिनेश गुप्ता बताते है कि भाजपा नेतृत्व चाहता है कि किसी भी तरह से पार्टी के अंदर असंतोष पैदा न हो इसलिए वो हर तरह से विभाग वितरण से पहले संतुष्ट होना चाहते है.
दांव पर शिवराज की छवि
लेकिन इस सब ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की छवि को भी कमज़ोर बनाया है. चौथी बार प्रदेश के मुख्यमंत्री बने शिवराज सिंह चौहान ने शपथ लेते वक़्त यह नहीं सोचा होगा कि उन्हें ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ेगा.
गिरिजा शंकर मानते हैं कि इस स्थिति में पार्टी कमज़ोर भी होती है और जनता के बीच अच्छा संदेश भी नहीं जाता है जिसका असर ज़रुर होगा.
शिवराज सिंह चौहान को अगले कुछ महीनों में 24 सीटों पर उपचुनाव का सामना करना है और यह चुनाव उनकी सरकार के बने रहने के लिए महत्वपूर्ण है.
वहीं दिनेश गुप्ता मानते हैं कि ज्योतिरादित्य सिंधिया के सामने शिवराज सिंह चौहान ज़रुर कमज़ोर नज़र आ रहे है.
उनका कहना है, "ज्योतिरादित्य सिंधिया को जो प्रभाव है उसके सामने शिवराज सिंह चौहान कमज़ोर नज़र आते हैं. वहीं सिंधिया ने अपनी दमदारी दिखा दी है कि वो क्या हैं."
लेकिन जो मामला चल रहा है उसकी वजह से पार्टी के अन्य नेताओं में भी असंतोष उभर कर सामने आ रहा है.
मंत्री पद के प्रमुख दावेदार अजय बिश्नोई पार्टी से नाराज़ नज़र आ रहे है. उन्होंने कहा, "पहले मंत्रियों की संख्या और अब विभागों का बंटवारा. मुझे डर है कि भाजपा का आम कार्यकर्ता अपने नेता की इतनी बेइज़्जती से नाराज़ न हो जाए."
वहीं भाजपा के एक अन्य वरिष्ठ नेता गोपाल भार्गव ने विभाग बंटवारे में हो रही देरी की वजह से कहा है कि यह साधु-महात्मा की ज़मात तो नहीं है.
उन्होंने कहा, "सबकी महत्वकांक्षाएँ होती है. इसी में देरी हो रही है." हालांकि उन्होंने इस बात से इंकार किया कि पार्टी से कोई नाराज़ है.
वही इस पूरे मामले ने कांग्रेस को भी बोलने का मौका दे दिया है.
पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने कहा है कि पहले सरकार बनाने में सौदेबाज़ी हुई, सौदे से मंत्रिमडल बना और अब विभागों के वितरण में सौदेबाज़ी चल रही है.
शिवराज सिंह चौहान जिन्हें 'मामा' भी कहा जाता है, उन्होंने पिछली तीन पारियां जनता के बीच के नेता के तौर पर पूरी की. उन्होंने जनता से भरपूर सहयोग भी मिला. लेकिन इस बार उनकी स्थिति अलग नज़र आ रही है.
शिवराज सिंह चौहान अपनी पार्टी के अंदर ही संघर्ष करते नज़र आ रहे है. एक तरफ उन्हें प्रदेश में फैल रही कोरोना महामारी से निपटना है तो दूसरी तरफ उन्हें पार्टी के अंदर भी अपने आप को साबित करना है.
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