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चीनी ऐप तक ठीक, लेकिन उससे आगे किसी बैन की कितनी गुंजाइश
चीनी माल के बहिष्कार को लेकर लार्सन एंड टुब्रो के बयान पर अभी बहस जारी ही थी कि ऑटोमोबाइल कंपनी मारूति सुज़ूकी ने कहा है कि लोगों को याद रखना चाहिए कि पड़ोसी मुल्क के माल पर पाबंदी की वजह से चीज़ों की क़ीमतें बढ़ेंगीं.
मारूति सुज़ूकी के चेयरमैन आरसी भार्गव ने कहा है कि बाहर से माल मंगवाना कंपनियों की मजबूरी है क्योंकि उस क्वालिटी की चीज़ें, उतनी ही क़ीमतों पर भारत में उपलब्ध नहीं हैं.
समाचार एजेंसी पीटीआई से बातचीत में आरसी भार्गव ने कहा है कि लंबे समय तक आयात पर निर्भरता बिज़नेस के लिए फ़ायदे का सौदा नहीं है क्योंकि रूपयों की क़ीमत अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में लगातार कम होती जा रही है जिसकी वजह से कंपनियों की लागत पहले से बढ़ गई है लेकिन फिर भी उद्योग और व्यवसाय के पास आयात के सिवा कोई चारा नहीं है.
एल एंड टी के बाद मारूति सुज़ूकी भारत की दूसरी बड़ी कंपनी है जिसने चीनी माल के बॉयकाट को लेकर देश में दिन-ब-दिन तेज़ होती मांग की अव्यावहारिकता को लेकर बयान दिया है.
इंजीनियरिंग और निर्माण क्षेत्र की बड़ी कंपनी एल एंड टी के सीईओ एसएन सुब्रमणयन ने कहा है कि चीनी सामानों का बहिष्कार व्यावहारिक नहीं है.
उन्होंने कहा है कि अगर देश को ये लगता है कि इस तरह के आयात को पूरी तरह से बंद करना है तो उसके लिए पहले तो पॉलिसी तैयार करनी होगी और फिर माल को भारत में बनाने के लिए मूलभूत ढांचे की ज़रूरत होगी.
एसएन सुब्रमणयन ने कहा कि इस पूरे काम में कम-से-कम चार से पांच साल लगेंगे.
सालाना 90 अरब डॉलर का कारोबार
भारत सरकार ने चीन में तैयार 59 ऐप पर बैन लगा दिया है. ये फ़ैसला सोमवार शाम को लिया गया उसके बाद से ऐसी चर्चा चल रही है कि क्या दूसरे चीनी उत्पादों पर भी बैन लगाया जा सकता है. व्यवसाय और उद्योग जगत में इस बात को लेकर बहस जारी है कि ऐप पर प्रतिबंध से आगे बात कहां तक जाएगी?
कहा जा रहा है कि जब बड़ी मशीनों के पार्ट से लेकर, होली के गुलाल और दवाइयों तक को तैयार करने के लिए कच्चा माल चीन से आयात हो रहा है तो इसे अचानक से ख़त्म करना कैसे संभव होगा.
भारत और चीन के बीच कुल सालाना व्यापार करीब 90 अरब डॉलर का है जिसमें भुगतान संतुलन चीन के पक्ष में है, इस व्यापार में भारत करीब 70 अरब डॉलर का माल चीन से मंगाता है.
इस बीच ख़बरें आ रही हैं कि सरकार एयर कंडीशनर और टीवी में इस्तेमाल होने वाले पुर्ज़ों समेत कम-से-कम 10-12 तरह के प्रोडक्ट्स पर लाइसेंसिंग सिस्टम लागू करने जा रही है ताकि उनके आयात पर रोक लगाई जा सके.
कहा जा रहा है कि ये क़दम भी चीन को ध्यान में रखकर किया जा रहा है.
चीन और भारत के बीच जून महीने के शुरु में गलवान घाटी में हुई भिडंत के बाद तनाव बढ़ता जा रहा है और देश में चीन विरोधी माहौल दिख रहा है.
इस घटना के बाद नरेंद्र मोदी सरकार ने चीन से होने वाले निवेश के नियमों में बदलाव कर दिया है, साथ ही ऑनलाइन कंपनियों से कहा गया है कि वो किसी भी प्रोडक्ट के बारे में ग्राहकों को साफ़ बताएँ कि वह कहाँ का बना है.
ख़बर थी कि सरकारी टेलीकॉम कंपनी बीएसएनएल से कहा गया है कि वो भविष्य में चीनी माल का इस्तेमाल न करे. मगर टेलीकॉम कंपनियों के संगठन सेल्युलर ऑपरेटर्स एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया (सीओएआइ) ने बयान जारी किया है कि सामरिक मामलों और कॉर्पोरेट जगत से जुड़े फ़ैसलों का घालमेल न किया जाना चाहिए.
एयरटेल और वोडाफ़ोन जैसी कंपनियां सीओएआइ की सदस्य हैं.
हालांकि ऐसा नहीं है कि सरकार उद्योग और व्यवसाय जगत के नज़रिए को जानने की कोशिश नहीं कर रही है और वाणिज्य मंत्रालय ने इस बाबत इंडस्ट्री एसोसिएशनों से संपर्क भी किया है जहां इन बातों पर गर्मागर्म बहस जारी है.
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