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कोरोना वायरस: 9 अस्पतालों के धक्के खाए, आख़िर में हुई मौत
- Author, दीप्ति बथिनी
- पदनाम, बीबीसी तेलुगू
"वो सांस लेने की कोशिशें कर रही थी. वो रो रही थी. वो जानती थी कि सब ख़त्म हो चुका है. वो मर गई और हमारी कोई मदद करने नहीं आया. हम 9 अस्पतालों में गए और कोई भी हमारी मदद करने नहीं आया."
पी. श्रीकांत 17 जून की उस मनहूस सुबह को याद करते हैं जब उन्होंने अपनी 41 वर्षीया पी. रोहिता को खो दिया था.
रोहिता और श्रीकांत हैदराबाद में अपनी 17 वर्षीया बेटी और 14 साल की बेटी के साथ रहते थे. श्रीकांत ने बताया कि उनकी पत्नी को तीन दिनों से बुख़ार था.
वो कहते हैं,"हम एक नज़दीकी अस्पताल गए, उन्होंने दवाई दी और कहा कि यह एक वायरल बुख़ार है. उनका बुख़ार कम हुआ लेकिन उन्हें खांसी थी. उन्हें एक कफ़ सिरप दी गई लेकिन 16 तारीख़ की आधी रात को उन्हें बेचैनी होने लगी. उन्हें सांस लेने में समस्या हो रही थी. उन्होंने मुझे अस्पताल ले जाने के लिए कहा."
श्रीकांत ने कहा कि यह एक दुख भरी रात की शुरुआत थी जिसके बारे में पता नहीं था कि क्या होने जा रहा है.
वो अपनी पत्नी रोहिता को कार से सनशाइन अस्पताल लेकर गए.
कुर्सी पर बैठाकर दी गई ऑक्सीजन
श्रीकांत ने बताया, "जैसे ही हम अस्पताल के दरवाज़े पर पहुंचे तो वहां खड़े चपरासी ने हमें चले जाने के लिए कहा. मैंने उनसे कहा कि यह इमर्जेंसी है. हम अंदर गए, इसके बाद मेरी पत्नी को सांस लेने में दिक़्क़त होनी शुरू हो गई. मेरी पत्नी को डॉक्टर ने देखने के बाद कहा कि उनके पास बेड नहीं हैं. मैंने उनसे प्रार्थना की कि वो उनकी सांस की समस्या के लिए कम से कम शुरुआती इलाज दें. उन्होंने कुछ मिनट ऑक्सीजन देने की बात कही लेकिन यह भी शर्त रखी कि हम जल्द ही चले जाएं."
उन्होंने बताया कि उनकी पत्नी को एक गंदे कमरे में ऑक्सीजन दी गई जहां उन्हें कुर्सी पर बैठाया गया.
कोई और विकल्प न होने पर श्रीकांत अपनी पत्नी को अपोलो अस्पताल लेकर गए. इस अस्पताल में भी श्रीकांत को ड्यूटी पर मौजूद डॉक्टर ने कहा कि उनकी पत्नी में कोविड-19 के लक्षण हैं और उनके पास कोई बेड नहीं है.
उन्होंने कहा, "वे लगातार कहते रहे कि मेरी पत्नी की हालत ख़राब हो रही है और वो उन्हें ले जाएँ. मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था. मैं एक बड़े निजी अस्पताल के इमर्जेंसी वॉर्ड के पास खड़ा था और बिना किसी कोविड टेस्ट के वे कैसे कह सकते हैं कि मेरी पत्नी को कोरोना है? बहुत प्रार्थना के बाद उन्होंने कुछ देर के लिए ऑक्सीजन देने के लिए कहा और कहा कि इसके बाद हमें जाना होगा."
इसके बाद वो अपनी पत्नी को एक अन्य निजी अस्पताल विरिंची लेकर गए. वहां पर भी सुरक्षा गार्ड ने उन्हें अंदर आने की अनुमति नहीं दी थी और कहा कि उनके पास स्टाफ़ या बेड नहीं है.
इसके बाद उन्हें केयर अस्पताल ले जाया गया जहां पर उन्हें प्राथमिक उपचार देने के बाद अगले अस्पताल जाने के लिए कहा गया.
इसके बाद श्रीकांत की कार का पेट्रोल ख़त्म हो गया और उन्होंने 108 एंबुलेंस को फ़ोन किया.
उन्होंने बताया, "कॉल सेंटर में मौजूद व्यक्ति ने कहा कि वो निजी अस्पताल में हमें लेने नहीं आ सकते. इसके बाद मैंने एक निजी एंबुलेंस बुलाई जो मेरी पत्नी को सरकारी अस्पताल लेकर गई."
सरकारी अस्पताल का किया रुख़
जिस तरह से निजी अस्पताल कोविड के डर के कारण श्रीकांत की पत्नी को भर्ती करने से मना कर रहे थे तो उन्हें लगा कि उनकी पत्नी को सरकारी अस्पताल में इलाज मिल पाएगा. वो उन्हें किंग कोटी अस्पताल लेकर गए जो कोविड सैंपल कलेक्शन के लिए बनाया गया अस्पताल है.
उन्होंने कहा कि उन्हें वहां पर भी सुरक्षा गार्ड ने रोक लिया था.
श्रीकांत ने कहा, "तब तक मैं अपना सब्र खो चुका था और मेरी पत्नी की तबीयत बिगड़ती जा रही थी. मैंने ग़ुस्से में गार्ड को फ़टकार लगाई और अस्पताल के अंदर घुस गया. ड्यूटी पर मौजूद डॉक्टर ने कहा कि उनके पास बेड नहीं हैं और मुझे इन्हें एक बड़े अस्पताल में ले जाना चाहिए. मैं उनसे बहस में अपना समय ख़राब नहीं करना चाहता था. मैं अपनी पत्नी को उस्मानिया अस्पताल लेकर गया."
उन्होंने बताया, "अस्पताल में कोई हमसे यह तक नहीं पूछ रहा था कि हम यहाँ क्यों आए हैं. मैं अपनी पत्नी को अंदर ले जाने के लिए स्ट्रेचर या व्हीलचेयर ढूंढ रहा था. मुझे एक व्हीलचेयर मिली जिसमें पहिया नहीं था. मैं जब वो लेने लगा तो एक महिला कर्मचारी ने मुझे उसके लिए पैसे जमा करने को कहा. कार में तेल भरवाने के लिए मैंने अपना पर्स अपने रिश्तेदार को दे दिया था जो अस्पताल पहुंचने ही वाला था यह बात मैं उस कर्मचारी को बताता रहा लेकिन वो सिर्फ़ पैसा जमा करने के लिए कहती रहीं."
"उनको मैंने अपना फ़ोन दे दिया और व्हीलचेयर लेकर मैं अपनी पत्नी को वार्ड में ले गया. उनको मैंने ख़ुद ऑक्सीजन दिया. बहुत देर के बाद एक डॉक्टर आया और उसने टेस्ट की लिस्ट दे दी. इसके बाद भी मैंने टेस्ट के लिए अपना फ़ोन जमा किया. इसके बाद मैं टेस्टिंग रूम में गया जहां ख़ून के कतरे चादरों पर पड़े थे और खाना ज़मीन पर बिखरा था लेकिन मेरा ध्यान इस पर था कि कैसे इसे जल्द से जल्द निपटाऊं."
"टेस्ट के बाद मैं ड्यूटी डॉक्टर के पास गया लेकिन तब तक मेरी पत्नी का पल्स रेट गिरने लगा था. डॉक्टर अपने सीनियर से बात करने गए और वापस आने के बाद उन्होंने कहा कि मेरी पत्नी के लिए बेड नहीं है और मुझे अपनी पत्नी को दूसरे अस्पताल ले जाना चाहिए."
स्ट्रेचर पर छोड़ दिया गया अकेले
श्रीकांत कहते हैं कि जब उन्होंने यह सुना तो उनका दिल बैठा जा रहा था. उनके पास अपनी पत्नी का इलाज कराने के लिए पैसा था लेकिन कोई उनकी पत्नी को इलाज नहीं देना चाह रहा था.
इसके बाद उन्होंने अपने परिचितों को अस्पताल में जगह के लिए फ़ोन कॉल करना शुरू किया. उन्होंने एक परिचित को फ़ोन कॉल किया जो एक स्वास्थ्य कर्मी भी हैं उन्होंने एक निजी अस्पताल में जाने को कहा जहां पर बेड और वेंटिलेटर भी थे.
उन्होंने कहा, "मैंने अपनी पत्नी को लेकर अस्पताल पहुंचा. वहां मेरी पत्नी को दवाइयां देनी शुरू की गईं लेकिन कुछ देरे के बाद उन्होंने कहा कि वो उनका इलाज नहीं कर सकते क्योंकि उनमें कोविड के लक्षण हैं. काफ़ी बहस के बाद उन्होंने सीटी स्कैन करने के लिए कहा. फिर मेरी पत्नी को स्कैन के लिए टेस्टिंग रूम में ले जाया गया. लेकिन वो आधे घंटे के बाद भी कमरे से बाहर नहीं आईं."
"इसके बाद मैं कमरे में यह देखने गया कि देर क्यों हो रही है. वो बहुत डरावना लम्हा था. मैंने देखा कि मेरी पत्नी अकेले स्ट्रेचर पर लेटी हुई है और वहां कोई कर्मचारी नहीं है. उसे उनकी क़िस्मत पर वहां छोड़ दिया गया था और कोई डर के कारण उनके पास नहीं जा रहा था. मेरी पत्नी रो रही थी. वो तब तक जान चुकी थीं कि कुछ ग़लत हो गया है. तब तक हम अस्पतालों के चक्कर में 6 घंटे बर्बाद कर चुके थे."
श्रीकांत कहते हैं कि तब तक वो निराश हो चुके थे और ग़ुस्से में थे.
उनका कहना है, "मैं अभी भी मदद की उम्मीद में था. मैंने फिर एक निजी एंबुलेंस को कॉल किया और कोविड के लिए बनाए गए सरकारी गांधी अस्पताल लेकर गया. मुझे फिर दरवाज़े पर रोका गया और कोविड-19 टेस्ट रिपोर्ट मांगी गई. मुझे गार्ड को धक्का मारना पड़ा लेकिन अस्पताल में घुसने के बाद मुझे थोड़ी उम्मीद की किरण दिखाई दी."
हालांकि, वहां पर श्रीकांत को किंग कोटी अस्पताल जाने के लिए कहा गया और पहले कोविड टेस्ट कराने को कहा गया. उस समय तक रोहिता के लिए बहुत देर हो चुकी थी और उनकी पत्नी ज़िंदगी की जंग लगभग हार चुकी थीं.
श्रीकांत अकेले नहीं हैं जो इस कठिन परीक्षा से गुज़रे हैं और अपने जीवनसाथी को मरते देखा है.
क्यों नहीं मिल पा रहे बेड
तेलंगाना के एक सार्वजनिक स्वास्थ्य अधिकारी कहते हैं कि लॉकडाउन में ढील दिए जाने के बाद संक्रमण के मामले बढ़ रहे हैं.
हैदराबाद के एक बड़े सुपर स्पेशलिटी अस्पताल में काम करने वाले एक वरिष्ठ कर्मचारी का कहना है कि बेड की कमी की वजह लॉकाडउन में ढील देने के बाद संक्रमण के मामले लगातार बढ़ना है.
वो कहते हैं, "90 फ़ीसदी पॉज़िटिव मरीज़ों को होम क्वारंटीन की ज़रूरत है इसके बाद 5 फ़ीसदी को अस्पताल में थोड़ी देखभाल और बाकी के 5 फ़ीसदी को आईसीयू की ज़रूरत पड़ती है लेकिन इसके इलाज के लिए आइसोलेशन की ज़रूरत है जिसके लिए एक ख़ास व्यवस्था की ज़रूरत है. हालांकि, अस्पताल इलाज के लिए तैयार हैं लेकिन इस परिस्थिति में काम करने के लिए विशेषज्ञों और लोगों की कमी है."
तेलंगाना सुपर स्पेशलिटी अस्पताल के अध्यक्ष डॉक्टर डी. भास्कर राव कहते हैं कि निजी अस्पतालों में क्षमता के हिसाब से बेड हैं लेकिन कोविड टेस्ट में पॉज़िटिव पाए जाने के बाद भी कई लोग एसिम्प्टोमैटिक होने के बावजूद निजी अस्पतालों में आ रहे हैं जबकि उनको होम आइसोलेशन में रहना चाहिए. इसके कारण कई लोगों को बेड नहीं मिल पाता है.
ऐसी भी रिपोर्ट हैं कि सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर और मेडिकल स्टाफ़ कोविड पॉज़िटिव हैं. हालांकि इसको लेकर कोई आंकड़ा नहीं है लेकिन गांधी अस्पताल के सुप्रीटेंडेंट ने हाईकोर्ट को 17 जून को बताया था कि 12 डॉक्टर और 6 स्वास्थ्यकर्मी कोरोना पॉज़िटिव हैं. इसके कारण स्वास्थ्य सेवाओं पर भी असर पड़ा है
सार्वजनिक स्वास्थ्य अधिकारियों ने हाईकोर्ट में जो रिपोर्ट जमा की है उसके अनुसार किंग कोटी अस्पताल में वेंटिलेटर के साथ 14 बेड, ऑक्सीजन सप्लाई के साथ 300 बेड हैं.
वहीं, गांधी अस्पताल में वेंटिलटर के साथ 80 बेड और ऑक्सीजन सप्लाई के साथ 1200 बेड हैं.
श्रीकांत ने जिन निजी अस्पतालों के बारे में बताया बीबीसी न्यूज़ तेलुगू ने उनसे उनकी प्रतिक्रिया चाही लेकिन यह लेख लिखे जाने तक किसी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी.
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