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'आरक्षण मौलिक अधिकार नहीं', सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी का मतलब क्या है?
- Author, फ़ैसल मोहम्मद अली
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि आरक्षण मौलिक अधिकार नहीं है.
अदालत ने ये टिप्पणी तमिलनाडु के मेडिकल कालेजों में कुछ वर्गों (ओबीसी) को आरक्षण न दिए जाने के फ़ैसले के विरोध में एक केस के संदर्भ में गुरुवार को की. अदालत ने याचिकाकर्ताओं से कहा कि केंद्र सरकार के ख़िलाफ़ पहले मद्रास हाई कोर्ट जाएं.
संविधानविद सूरत सिंह मानते हैं कि देश की सबसे ऊंची अदालत की इस टिप्पणी में कहीं भी रिज़र्वेशन पर सवाल नहीं उठाया गया है या उसे ख़त्म करने की बात नहीं कही गई है, बल्कि ये कहा गया है कि चूंकि ये मामला किसी ख़ास सूबे में आरक्षण की बात को लेकर है, तो इसे पहले हाई कोर्ट ले जाया जाना चाहिए.
सूरत सिंह का कहना है कि आरक्षण संविधान की धारा 16 (4) के तहत विशेष समुदायों की बेहतरी के लिए हुकूमत को कई तरह के क़दम उठाने का अधिकार देता है. इसके तहत वो तबक़े आते हैं जो ऐतिहासिक, सामाजिक और शैक्षणिक वजहों से पिछड़े रह गए हैं.
वहीं सामाजिक सरोकारों से जुड़े स्कॉलर और लेखक दिलीप मंडल कहते हैं कि बात सिर्फ़ एक फ़ैसले की नहीं है, अदालत को अगर इस मामले की सुनवाई नहीं करनी थी, तो वो याचिकाकर्ताओं से सीधे-सीधे मामले को उच्च न्यायालय ले जाने को कह सकता था, लेकिन उसने इस मामले पर टिप्पणी भी कर दी, जिसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं.
तमिलनाडु के तक़रीबन सभी राजनीतिक दलों ने केंद्र सरकार के उस फ़ैसले के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया था जिसमें मेडिकल कालेजों की सीटों में अन्य पिछड़े वर्गों को 50 फ़ीसद आरक्षण देने से मना कर दिया गया था.
ये सीटें पहले तमिलनाडु सरकार के पास थीं और बाद में केंद्र को चली गईं.
फ़ैसले के ख़िलाफ़ याचिका की तैयारी
दिलीप मंडल का कहना है कि हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना के आदिवासी इलाक़ों में शिक्षकों की बहाली में आदिवासियों के लिए 100 फ़ीसद रिज़र्वेशन के फ़ैसले पर रोक लगा दी थी.
ये फ़ैसला ऐसे समय लिया गया जब अदालत बहुत ही अहम मामलों की ही सुनवाई कर रहा है.
कई स्थानीय समाचार पत्रों में कहा गया है कि चंद्रशेखर राव की सरकार अदालत के इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ याचिका दायर करने की तैयारी कर रही है.
सूरत सिंह कहते हैं कि इंदिरा साहनी जैसे मामलों में फ़ैसले के बाद तय हो गया है कि 50 फ़ीसद से अधिक आरक्षण राज्य सरकार अगर चाहे तो दे सकती है, लेकिन इसके लिए उसे ठोस आधार मुहैया कराने होंगे.
उनका कहना था कि इसी के तहत कई सूबे की सरकारों ने ख़ास समुदायों को समय-समय पर आरक्षण का प्रावधान किया है. तमिलनाडु का मामला भी सूबे को लेकर है.
मामले की सुनवाई करते हुए तीन जजों की खंडपीठ ने कहा कि धारा 32 के तहत कोई भी केस तभी दाख़िल किया जा सकता है, जब मौलिक अधिकारों का हनन हुआ हो और इस मामले में राजनीतिक दलों के अधिकारों पर किसी तरह का हमला नहीं हुआ हो.
राजनीतिक दलों के वकीलों का कहना था कि वो किसी आरक्षण में किसी इज़ाफ़े की बात नहीं कर रहे हैं, बल्कि उनका आरोप है कि जो रिज़र्वेशन पहले से तय है, उसे लागू नहीं किया जा रहा.
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