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लॉकडाउन के दौरान मारे गए ढेर सारे जंगली जानवर
- Author, भूमिका राय
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
कोरोना वायरस के कारण देश में लागू लॉकडाउन के दौरान जंगली जानवरों के अवैध शिकार के मामले दोगुने हुए हैं. बताया जाता है कि इनमें ज़्यादातर जानवरों का शिकार उनके माँस के लिए किया गया.
वाइल्ड लाइफ़ ट्रेड मॉनिटरिंग नेटवर्क 'ट्रैफ़िक' के अनुसार दुनिया के अलग-अलग देशों में हुए लॉकडाउन का वन्यजीव संरक्षण पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है. लॉकडाउन के कारण वन्य जीव संरक्षण के काम से जुड़े स्टाफ़ की गतिविधियां भी बाधित हुईं और यह उन लोगों के लिए सुनहरा मौक़ा साबित हुआ जो जंगली जानवरों का अवैध शिकार करते हैं.
इसके साथ ही शहरों और कस्बों में काम-धंधा बंद होने के कारण एक बड़ी संख्या में लोग गांवों और अंदरुनी हिस्सों में लौटे जिससे ईंधन और खानपान की ज़रूरतों के लिहाज़ से भी जंगल के संसाधनों पर दबाव बढ़ा है.
रिपोर्ट के मुताबिक़, प्रतिबंधित वन्य क्षेत्रों में लोगों की आवाजाही बढ़ी है और मांस के लिए जंगली जानवरों का अवैध शिकार बढ़ा है. इसमें कुछ मामले व्यापार से भी जुड़े हुए हैं.
आंकड़ों का स्रोत
'ट्रैफ़िक' ने जो आंकड़े जारी किए हैं उनका मुख्य स्रोत न्यूज़ रिपोर्ट्स, सोशल मीडिया, दर्ज कराए गए मामले और स्थानीय लोगों की सूचना है.
यह स्टडी 12 हफ़्तों में दर्ज हुए मामलों के आधार पर तैयार की गई है.
वो छह हफ़्ते जब देश में लॉकडाउन नहीं था और बाकी के छह हफ़्ते जब देश लॉकडाउन में था. इन दोनों समयावधि की तुलना के आधार पर यह रिपोर्ट तैयार की गई है.
प्री-लॉकडाउन पीरियड के लिए 10 फरवरी से 22 मार्च तक का समय लिया गया है और लॉकडाउन के पीरियड में शिकार के मामले देखने के लिए 23 मार्च से 3 मई तक का समय लिया गया है.
अगर आंकड़ों की बात करें तो लॉकडाउन में सबसे अधिक बड़े स्तनधारी जीवों का शिकार हुआ है. जहां लॉकडाउन के पहले यह आंकड़ा 22 प्रतिशत था, वहीं लॉकडाउन में बढ़कर 44 प्रतिशत हो गया. आम तौर पर इन जीवों को मीट के लिए मारा जाता है.
लॉकडाउन में छोटे स्तनधारी जीवों के शिकार का प्रतिशत भी बढ़ा है. इसमें सीवेट (जंगली बिल्ली), पैंगोलिन, बंदर और बड़ी गिलहरी के शिकार के मामले बढ़े हैं. इन छोटे स्तनधारियों की विदेशी बाज़ार में मांग है. लॉकडाउन से पहले और लॉकडाउन के दौरान इनके शिकार के मामले बढ़कर 17 से 25 फ़ीसदी हो गए.
पक्षियों के शिकार के मामलों में कमी
लॉकडाउन के दौरान जहां बड़े और छोटे स्तनधारी जीवों के शिकार के मामले बढ़े हैं, वहीं पक्षियों के शिकार के मामलों में कमी आई है.
इसमें उन पक्षियों का शिकार शामिल है जिन्हें विदेशी बाज़ारों में बेचा जाता है हालांकि रिपोर्ट के मुताबिक, बड़े पक्षियों का शिकार अब भी हो रहा है और उनका मांस इसकी एक बड़ी वजह है.
शेर, बाघ और इस प्रजाति के दूसरे जीवों के शिकार का प्रतिशत लॉकडाउन में भी वही रहा है जो लॉकडाउन से पहले था.
आंकड़े क्या कहते हैं
इस रिपोर्ट के मुताबिक़, लॉकडाउन में जंगली जानवरों के अवैध शिकार के 88 मामले सामने आए जबकि लॉकडाउन शुरू होने से पहले ये आंकड़ा 35 था.
लॉकडाउन के दौरान 35 अलग-अलग किस्म के जंगली जानवरों की प्रजाति का शिकार हुआ.
जिनमें से 15 प्रजातियां वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972 के शेड्यूल 1 के तहत आती हैं, यानी संरक्षित हैं. इन प्रजातियों के खिलाफ़ किसी भी तरह के अपराध के लिए अधिकतम सात साल की सज़ा का प्रावधान है और जुर्माने का भी.
लॉकडाउन में मामले बढ़ेंगे इसकी आशंका क्या नहीं थी?
रिपोर्ट यह दावा करती है कि संबंधित अधिकारियों को इस तरह की आशंका थी कि ऐसी स्थिति सामने आएगी.
दरअसल, इसका अंदाज़ा था और इसी आधार पर केंद्र सरकार ने वन और वन्य-जीवों को के संरक्षण को ज़रूरी गतिविधि के तहत रखा था ताकि नियमित तौर पर किये जा रहे संरक्षण के काम प्रभावित ना हों.
इसके अलावा वन विभाग ने भी अपनी तरफ़ से पूरी तैयारी की थी ताकि वन्य जीवों के अवैध शिकार को बढ़ने ना दिया जाए.
रिपोर्ट में इस दावे की प्रमाणिकता के लिए इस दौरान हुई 222 गिरफ़्तारियों का हवाला दिया है.
भारतीय वन सेवा के अधिकारी और 'ट्रैफ़िक' की अगुवाई करने वाले साकेत बडोला के मुताबिक़, "इस स्टडी के लिए बेसलाइन लॉकडाउन से पहले के छह हफ़्तों को रखा गया. इसी से लॉकडाउन के छह हफ़्तों के दौरान हुए अवैध शिकार के मामलों की तुलना की गई".
वो कहते हैं "इस रिपोर्ट से पता चलता है कि आम तौर पर जिन जानवरों का शिकार बाहर के बाज़ारों में बेचने के लिए किया जाता है उनके शिकार में या तो कमी आई है या फिर वो अब भी उतने ही फ़ीसदी है लेकिन जो मामले बढ़े हैं वो मांस के लिए मारे जाने वाले जानवरों से जुड़े हुए हैं."
लेकिन मांस के लिए जानवरों का शिकार बढ़ने के पीछे वजह क्या है?
इस सवाल के जवाब में साकेत कहते हैं, 'निश्चित तौर पर कोई एक वजह बता पाना मुश्किल है लेकिन जहां तक मुझे लगता है तो लॉकडाउन की वजह से खाने की उपलब्धता पर असर पड़ा है. मांस की उपलब्धता पर भी असर पड़ा है तो शिकार करने की एक वजह यह भी हो सकती है.'
भारत में अवैध शिकार को नियंत्रित कर पाना इतना मुश्किल क्यों?
जंगली जानवरों का अवैध शिकार मुख्य तौर पर व्यापार के लिए किया जाता है.
एशिया समेत दुनिया के दूसरे महाद्वीपों में जानवर और उनके शरीर के अलग-अलग हिस्से ब्लैक मार्केट में बिकते हैं. महंगे दामों पर. इनका इस्तेमाल गहने, औज़ार, दवा, जैकेट, पर्स और दूसरी कई चीज़ों को बनाने के लिए किया जाता है.
अब तो ये व्यापार ई-कॉमर्स और सोशल मीडिया वेबसाइट्स के ज़रिए भी किया जा रहा है यानी जो व्यापार अब तक छिप-छिपाकर होता था अब वो डिजिटल रूप ले चुका है. इंटरनेट ने अवैध शिकार को एक नया और ज़्यादा खतरनाक रूप दिया है.
इसके अलावा कई जगहों पर जंगली जानवरों को पालतू बनाकर रखने का चलन है, इसके लिए भी जंगली जानवरों को पकड़ा जाता है.
नागरहोल नेशनल पार्क के डायरेक्टर महेश कुमार के मुताबिक़, "एक बड़ी समस्या यह है कि भारत में जो वन क्षेत्र हैं वो बहुत बड़े हैं. ऐसे में कई बार स्टाफ़ की कमी से जूझना पड़ता है. इसके अलावा बाकी यूनिफ़ॉर्म ड्यूटी से अलग फॉरेस्ट में एक ही गार्ड या वॉचर पर यह ज़िम्मेदारी होती है. फॉरेस्ट गार्ड्स के पास एक बड़े इलाक़े में बहुत सारे काम होते हैं. अगर जंगल में आग लगी है तो भी उसे ही देखना है. जंगल के अंदर जो भी कुछ हो रहा है वो सारा काम उसे देखना पड़ता है. ऐसे में अवैध शिकार के मामले चूक हो सकती है".
इसके अलावा महेश कुमार कहते हैं कि देश में इंफ्रास्ट्रक्चर को लेकर पहले की तुलना में काफी काम हुआ है लेकिन अभी बहुत कुछ करने की गुंजाइश है.
वो कहते हैं, 'अवैध शिकार करने वाले वक़्त के साथ आधुनिक उपकरणों और तकनीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं. ऐसे में यह चुनौती और बढ़ती ही जा रही है. हमें भी तकनीकी स्तर पर और लॉजिस्टिक लेवल पर और समृद्ध होने की ज़रूरत है.'
महेश बताते हैं कि कुछ जगहों पर अब ड्रोन की मदद ली जाने लगी है लेकिन इसे और विकसित करने की ज़रूरत है. वो कहते हैं कि ट्रेंड स्निफ़र डॉग्स की संख्या को भी बढ़ाया जाना चाहिए.
वाइल्ड लाइफ़ क्राइम ब्यूरो में कार्यरत एक कर्मचारी ने नाम नहीं बताने की शर्त पर बताया 'कई बार स्थानीय लोगों की मदद नहीं मिलती है. वो पैसे या दूसरे लालच की वजह से अवैध शिकार करने वालों की मदद करते हैं.'
फॉरेस्ट गार्ड्स की स्थिति को लेकर उन्होंने भी चिंता ज़ाहिर की.
भारत में अवैध शिकार के लिए क्या है क़ानून
वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम 1972 को देश के वन्यजीवों को सुरक्षा प्रदान करने एवं अवैध शिकार, तस्करी और अवैध व्यापार को नियंत्रित करने के उद्देश्य से लागू किया था. जनवरी 2003 में इस अधिनियम में संशोधन किया गया था और इसके तहत अपराधों के लिए जुर्माने और सज़ा को अधिक कठोर बना दिया गया है. इस क़ानून को मज़बूती देने के लिए और अधिक कठोर उपायों को इसमें शामिल कर इसमें संशोधन करने का प्रस्ताव है.
इसकी अनुसूची एक और दो के तहत आने वाले जानवरों के शिकार के लिए न्यूनतम तीन साल और अधिकतम सात साल की सज़ा का प्रावधान है. इसके अलावा जुर्माना भी लगाया जा सकता है.
इसके अलावा संविधान में मौलिक कर्तव्यों की सूची में भी प्राकृतिक पर्यावरण के संरक्षण की बात लिखी हुई है.
अनुच्छेद 51 (क) के तहत, 'प्राकृतिक पर्यावरण जिसके अंतर्गत वन, झील, नदी और वन्य जीव आते हैं, रक्षा करें और संवर्द्धन करें और प्राणी के लिये दया भाव रखें.'
जानवरों के अवैध शिकार के मामले लगातार सामने आ रहे हैं लेकिन इसका यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि इसे रोकने की दिशा में प्रयास नहीं किये जा रहे. रणथंबौर नेशनल पार्क की वेबसाइट पर मौजूद जानकारी के अनुसार, साल 2012 से 2018 के बीच क़रीब 9000 से अधिक लोगों को गिरफ़्तार किया गया.
अवैध शिकार का वन्य जन-जीवन पर सीधा असर होता है. कुछ मामलो में तो जानवरों की प्रजाति के विलुप्त होने की कग़ार पर पहुंचने का ये एक प्रमुख कारण भी है.
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