कोरोना संक्रमण: 10वें नंबर पर भारत, जून-जुलाई में क्या होगी हालत

    • Author, सरोज सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

भारत कोविड-19 की महामारी से सबसे ज़्यादा प्रभावित होने वाले देशों की सूची में 10वें नंबर पर आ गया है.

भारत में कोविड 19 पर काम करने वाले शोधर्काताओं का कहना है कि जुलाई तक भारत में कुछ लाख मामले बढ़ सकते हैं.

जॉन्स हॉपकिंस यूनिवर्सिटी के आँकड़ों के अनुसार भारत में कोरोना वायरस से संक्रमण के 138,536 मामले अब तक दर्ज किए जा चुके हैं.

संक्रमण के मामलों की संख्या के लिहाज से इस लिस्ट में सबसे ऊपर अमरीका है, फिर ब्राज़ील, रूस, ब्रिटेन, स्पेन, इटली, फ्रांस, जर्मनी और तुर्की के नाम हैं. ताज़ा आँकड़ों के मुताबिक़ भारत में कोविड-19 की महामारी ने 4,024 लोगों की जानें भी ली हैं.

सरकारी आँकड़े बताते हैं कि दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाले देश में कोरोना वायरस से संक्रमण के मामले हर 13 दिन में दोगुने हो रहे हैं. अब सरकार ने भी लॉकडाउन से जुड़ी पाबंदियों में ढील देनी शुरू कर दी है.

इसके पहले एम्स के निदेशक रणदीप गुलेरिया ने भी कुछ दिन पहले कहा था, "अभी तो केस बढ़ रहे हैं. पीक तो आएगा ही. पीक कब आएगा, ये मॉडलिंग डेटा पर आधारित होता है. कई एक्सपर्ट ने इसकी डेटा मॉडलिंग की है. इंडियन एक्सपर्ट ने भी की है और विदेशी एक्सपर्ट ने भी की है. ज़्यादातर लोगों का मानना है कि जून-जुलाई में पीक आ सकता है."

क्या कहते हैं मॉडलिंग डेटा

समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने इस बारे में यूनिवर्सिटी ऑफ़ मिशिगन में बॉयोस्टैटिस्टिक्स और महामारी रोग विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर भ्रमर मुखर्जी से बात की. प्रोफ़ेसर भ्रमर मुखर्जी का कहना है कि भारत में संक्रमण के मामलों का बढ़ना अभी कम नहीं हुआ है.

मुखर्जी की टीम का अनुमान है कि भारत में जुलाई की शुरुआत तक 630,000 से 21 लाख लोग इस वायरस से संक्रमित हो सकते हैं. देश भर में संक्रमण के कुल मामलों का पाँचवाँ हिस्सा अकेले मुंबई शहर में है.

कोरोना मरीज़ों की संख्या में महाराष्ट्र टॉप पर

महाराष्ट्र में मरीज़ों की संख्या 50 हज़ार पार है. यानी देश के कुल आँकड़ों का एक तिहाई हिस्सा अकेले महाराष्ट्र में ही है. बड़ी बात ये है कि वहां के अस्पतालों में कोविड19 के मरीज़ों के लिए बेड की कमी है और इलाज के लिए डॉक्टर भी काफ़ी नहीं पड़ रहे हैं.

ये बात अब महाराष्ट्र सरकार भी खुल कर स्वीकार कर रही है. महाराष्ट्र सरकार ने केरल सरकार से डॉक्टरों की एक टीम भेजने की गुज़ारिश भी की है.

महाराष्ट्र के नोडल अफसर, मेडिकल एडुकेशन एंड रिसर्च टीपी लहाणे ने केरल के स्वास्थ्य मंत्री को चिट्ठी लिख कर 50 स्पेशलिस्ट डॉक्टर ऑर 100 नर्सों की व्यवस्था करने की गुजारिश की भी की है.

हालांकि इस बारे में अब तक जानकारी नहीं मिल पाई है कि केरल ने महाराष्ट्र सरकार की मदद के लिए हामी भरी है या नहीं.

अकेले मुंबई की बात करें तो वहां तकरीबन 30 हज़ार कोविड19 के मरीज़ हैं. सरकारी अनुमान के मुताबिक़ 15 फ़ीसदी लोगों को ही इस बीमारी में क्रिटिकल केयर यानी आईसीयू की ज़रूरत पड़ती है और पाँच फ़ीसदी को वेंटिलेटर की. इस लिहाज से तकरीबन 4500 लोगों को मुंबई में आईसीयू की ज़रूरत पड़ेगी और 1500 लोगों को वेंटिलेटर की ज़रूरत पड़ेगी.

लेकिन मुंबई नगरपालिका के आँकड़ों के मुताबिक़ उनके पास आईसीयू बेड की संख्या तकरीबन 2000 हजार के आस-पास ही है. वही हाल वेटिलेटर और ऑक्सीजन स्पोर्ट सिस्टम का है.

हालांकि ये बात सही है कि महाराष्ट्र सरकार अस्थायी तौर पर मरीज़ों के लिए अस्पताल बनाने और प्राइवेट अस्पतालों में मरीज़ों के लिए और आईसीयू केयर जुटाने में लगी है, लेकिन बढ़ते मामलों की रफ्तार और सरकार की रफ्तार में अब भी तालमेल नहीं हैं.

घरेलू उड़ानें और ट्रेन के चलने से महाराष्ट्र में मरीज़ों की संख्या आने वाले दिनों और ज़्यादा बढ़ सकती है.

दिल्ली का हाल

कुछ इसी तरह का हाल राजधानी दिल्ली का भी है. हालाँकि दिल्ली में कोविड19 के मरीज़ों की संख्या तकरीबन 13 हज़ार है. पूरे देश में कोरोना मरीज़ों की संख्या के मामले में दिल्ली चौथे स्थान पर है. लेकिन पिछले एक हफ्ते में मरीज़ों की संख्या तेज़ी से बढ़ी है.

रविवार शाम को दिल्ली सरकार ने 50 और उससे ज़्यादा बेड की क्षमता वाले निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम्स को 20 प्रतिशत बेड कोविड-19 के मरीज़ों के लिए आरक्षित रखने का निर्देश दिया है. दिल्ली में ऐसे निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम्स की संख्या 117 है.

दिल्ली में रविवार को कोरोना के 508 मामले सामने आए हैं और अब यहाँ मरीज़ों की संख्या 13,418 हो गई है.

दिल्ली डायलॉग कमिशन के वाइस चेयरमैन जैस्मीन शाह ने बीबीसी को बताया कि प्राइवेट अस्पतालों में तकरीबन 700 कोविड19 बेड थे, जिसमें से 530 में मरीज़ भर्ती हैं.

सरकारी अस्पतालों में कुल बेड में से केवल आधे में कोविड19 मरीज़ भर्ती हैं.

दिल्ली सरकार का नया फ़रमान रोज़ मरीज़ों की संख्या में होने वाली बढ़ोतरी के मद्देनज़र जारी किया गया है.

मार्च के आख़िरी हफ़्ते में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने पांच डॉक्टरों की एक टीम गठित की थी, उन्हें ये सुझाव देने के लिए कि जब तेज़ी से कोरोना मरीज़ों के मामले बढ़ेंगे तो कैसे निपटा जाएगा.

उस वक़्त राज्य सरकार ने 1000 मरीज़ प्रति दिन बढ़ने की रफ्तार पर अपनी तैयारी का ब्यौरा सामने रखा था. पिछले छह दिन से दिल्ली में रोज़ 500 से अधिक कोरोना पॉज़िटिव मामले सामने आ रहे हैं. बीच में एक दिन ये आँकड़ा 600 पार भी गया था.

ऐसे में ये कहना ग़लत नहीं होगा कि दिल्ली सरकार को दोबारा से अपनी रणनीति में बदलाव कर आगे की तैयारी और बेहतर करने की ज़रूरत है.

केंद्र सरकार का पक्ष

कोरोना संक्रमण के लिहाज़ से देखें तो देश के टॉप चार राज्यों में सरकारी अस्पतालों में बिस्तरों की कमी है. कई जगह से ऐसी ख़बरे आ रही है कि संक्रमित लोगों को अस्पताल में भर्ती कराने के लिए उनके परिवार वाले कई जगहों पर भटक रहे हैं.

समाचार एजेंसी रॉयटर्स का कहना है कि भारत के स्वास्थ्य मंत्रालय ने संक्रमण में वृद्धि से जुड़े इन अनुमानों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी कि वे बढ़ते मरीज़ों की देखभाल कैसे करेंगे.

प्रेस ब्रीफिंग में सरकार ने कहा है कि सभी मरीज़ों को अस्पताल में भर्ती कराए जाने की ज़रूरत नहीं है और वो अस्पतालों में बिस्तरों की संख्या बढ़ाने के लिए तेज़ी से क़दम उठा रही है. सरकार ने होम आइसोलेशन को लेकर नियम भी बनाए हैं.

सरकारी आँकड़ों के मुताबिक़ भारत में इस समय तकरीबन 714,000 हॉस्पिटल बेड्स हैं जबकि साल 2009 में ये संख्या लगभग 540,000 थी.

चार लॉकडाउन का असर

देश में पहले लॉकडाउन की घोषणा का सबने स्वागत किया था. उस समय जानकारों की राय थी कि लॉकडाउन में जो समय हमें मिलेगा वो काफ़ी होगा, मेडिकल लेवल पर इस महामारी से निपटने के लिए भारत को तैयार करने में.

लेकिन जिस तेज़ रफ्तार से आँकड़े बढ़ते जा रहे हैं, उसको देख कर लग रहा है कि तैयारी में अब भी कमी है.

प्रोफ़ेसर भ्रमर मुखर्जी ने भारत में कोविड19 के मरीज़ों के अनुमान, सरकार द्वारा उठाए गए क़दमों और लॉकडाउन के असर पर एक रिसर्च पेपर भी लिखा है.

ये पेपर ससेप्टबल इन्फेक्टड रिकवर्ड मॉडल (SIR) डेटा पर आधारित है, जो 14 अप्रैल तक के लॉकडाउन अवधि के दौरान लिया गया था.

उनके साथ इस पेपर में दिल्ली कॉलेज ऑफ इकोनॉमिक्स के एसोसिएट प्रोफेसर परीक्षित घोष भी शामिल है.

उन्होंने बीबीसी को बताया कि केवल लॉकडाउन से ही सब कुछ हासिल नहीं किया जा सकता. इसके साथ बड़ी मज़बूती से दूसरे नियमों का पालन भी सरकार को करना होगा. रिसर्च पेपर में इसे 'सप्रेशन मेजर्स' का नाम दिया गया है.

उनके मुताबिक, "सिनेमाघरों में फिल्मों की स्क्रीनिंग हो या फिर 20 से ज़्यादा लोगों के एक जगह जमा होने पर पाबंदी या फिर पब्लिक ट्रांसपोर्ट में सीमित संख्या में लोगों को आने-जाने की इज़ाजत या फिर दफ्तरों में एक तिहाई कर्मचारियों को काम करने का आदेश- लॉकडाउन हटा कर सरकार इन नियमों को सख्ती से लंबे समय तक लागू करे, तो भी मरीज़ों की संख्या पर इसका असर देखने को मिल सकता है."

प्रोफेसर घोष के मुताबिक, "इस बीमारी से निपटने के सबसे कठोर उपायों में से लॉकडाउन एक है, जो ज्यादा दिन तक चलने से अर्थव्यवस्था पर बहुत बुरा असर डाल सकती है."

प्रोफेसर घोष के मुताबिक भारत सरकार ने जो 20 लाख करोड़ के राहत पैकेज की घोषणा की है, वो फौरी तौर पर व्यापार और उद्योग जगत को राहत ज़रूर पहुंचाएगी. इससे कैश फ्लो की समस्या सुलझ सकती है.

लेकिन कोरोना के इस दौर में लोगों के पास हाथ में पैसे नहीं है. उसके लिए प्रोफेसर घोष सीधे लोगों तक पैसा ट्रांफसर करने के विकल्प की भी बात करते हैं.

उनके मुताबिक सिंगापोर मॉडल में इसका कुछ हद तक हल छुपा है.

बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "सिंगापुर में अगर कोई कोरोना टेस्ट में पॉज़िटिव पाया जाता है तो सरकार उसे 100 सिंगापुर डॉलर (लगभग 5000 रुपए) प्रति दिन के हिसाब से क्वारंटीन अलाउंस यानी क्वारंटीन में रहने का भत्ता देती है. जिसकी वजह से लोग टेस्ट कराने से डर भी नहीं रहे हैं, और कॉन्टेक्ट ट्रेसिंग भी आसानी से हो जाती है और आइसोलेशन में रहने में लोगों को दिक्कत भी नहीं हो रही है."

भारत में अगर पॉज़िटिव केस सामने आता है तो 21 दिन क्वारंटीन में रहने पर ग़रीब लोगों के पास भूखों मरने की नौबत आ सकती है. इसलिए लोग टेस्ट से बच भी रहे हैं. अगर भारत सरकार भी ऐसी की व्यवस्था करती है तो लोग टेस्ट कराने से बचेंगे नहीं. ऐसा करने से लॉकडाउन जैसी सख़्त व्यवस्था की ज़रूरत नहीं पड़ेगी.

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