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कोरोना का असर: एंटीबायोटिक की बिक्री हुई कम, क्या कम बीमार पड़ रहे लोग?
- Author, कमलेश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
लॉकडाउन का असर दवाइयों की आपूर्ति पर भले ही ना पड़ा हो लेकिन दवाइयों की बिक्री इससे ज़रूर प्रभावित हुई है.
कोरोना वायरस के चलते हुए लॉकडाउन में एंटीबायोटिक समेत कई और दवाओं की बिक्री में कमी आई है. लोग अब पहले की तरह एंटीबायोटिक दवाएं नहीं ख़रीद रहे हैं.
इंडियन फार्मासिस्ट असोसिएशन के जनरल सेक्रेटरी भूपेंद्र कुमार बताते हैं कि पहले के मुक़ाबले दवाओं की बिक्री में कमी देखी गई है. ये कमी अप्रैल और मई महीने में आई है. ख़ासतौर पर एंटीबायोटिक दवाओं की बिक्री कम हुई है.
भूप्रेंद कुमार ने बताया, “हमें बाज़ार से फीडबैक मिला है कि लोग अब छोटी-मोटी बीमारियों के लिए दवाएं कम ख़रीद रहे हैं. ऑगमेंटीन, सेफोरॉक्सिम और सेफिक्ज़िम जैसे एंटीबायोटिक दवाओं कि बिक्री कम हुई है. इसके अलावा माइग्रेन, डायबिटीज़ और दौरे जैसी बीमारियों के लिए ली जाने वाली दवाएं भी कम बिक रही हैं. पेन किलर की ख़रीद भी कम हुई है.”
क्या हैं कारण
बैक्टीरिया को मारने वाली दवाइयों को एंटीबायोटिक कहते हैं. एंटीबायोटिक अलग-अलग इंफेक्शन के इलाज में काम आती है.
एंटीबायोटिक की बिक्री कम होने के पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं. लेकिन इसके दो बड़े कारण हैं एक तो ये कि लॉकडाउन में अस्पताल में ओपीडी और निजी क्लिनिक का कम खुलना और दूसरा छोटी-मोटी बीमारियों के लिए दवाएं ना लेना.
भूपेंद्र कुमार बताते हैं कि पहले लोग सर्दी, जुकाम, खांसी जैसी बीमारियों के लिए क्लिनिक पर चले जाया करते थे लेकिन लॉकडाउन में क्लिनिक ही बंद हैं. ऐसे में डॉक्टर एंटीबायोटिक दवाएं नहीं लिख रहे हैं. फिर लोग कोरोना वायरस के डर से खुद भी डॉक्टर के पास जाने से बच रहे हैं. वो केमिस्ट से भी दवाएं नहीं ले रहे बल्कि छोटी-मोटी बीमारियां घरेलू उपायों से या अपने आप ठीक होने का इंतज़ार कर रहे हैं.
कम बीमार पड़ रहे लोग
फोर्टिस अस्पताल में न्यूरोलॉजी के डायरेक्टर एवं हेड डॉक्टर प्रवीण गुप्ता बताते हैं कि इस दौरान ये भी देखने को मिल रहा है कि लोग कम बीमार पड़ रहे हैं. इसकी वजह है साफ़-सफ़ाई का ज़्यादा ध्यान रखना.
वह कहते हैं, “पश्चिमी देशों में संक्रामक रोग बहुत कम होते हैं. उसकी सबसे बड़ी वजह है साफ़-सफ़ाई. अब भारत में भी लोग कोरोना वायरस के कारण स्वच्छता का ज़्यादा ध्यान रख रहे हैं. जिसके कारण उन्हें इंफेक्शन कम हो रहा है. गंदे हाथों से खाना खाने से ये इंफेक्शन शरीर में पहुंच जाता है लेकिन कोविड19 के चलते लोग बार-बार हाथ धो रहे हैं या सेनिटाइजर का इस्तेमाल कर रहे हैं. ऐसे में हम ना सिर्फ़ कोरोना वायरस को रोक रहे हैं बल्कि दूसरी बीमारियों को भी रोक रहे हैं.”
डॉक्टर प्रवीण लोगों के कम बीमारी होने के पीछे कुछ और कारण भी बताते हैं-
- लोग अभी बाहर नहीं जा रहे हैं. इसके चलते वो दूसरों के संपर्क में कम आ रहे हैं. ऐसे में ड्रॉपलेट्स के ज़रिए होने वाले इंफेक्शन जैसे ज़ुकाम, वायरल फीवर और फ्लू आदि से लोग बच हुए हैं.
- पिछले करीब दो महीनों से हम घर का खाना खा रहे हैं. बाहर का या सड़क किनारे मिलने वाला खाना भी हममें इंफेक्शन का कारण बनता है. ज़्यादा तला-भुना, मसालेदार खाने से दूसरी स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतें भी हो सकती हैं.
- आजकल लोग अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यूनिटी) बढ़ाने की कोशिश भी कर रहे हैं. कोविड19 से सुरक्षा के लिए इम्यूनिटी बढ़ाने पर ज़ोर दिया जा रहा है इसलिए लोग अपने खान-पान में सुधार करके इसका प्रयास कर रहे हैं. इससे भी बीमारियां कम पकड़ रही हैं.
- लॉकडाउन के कारण देश में वायु प्रदूषण कम हुआ है. प्रदूषण के कारण ज़ुकाम, खांसी, गले में खराबी जैसी बीमारियां सामान्य थीं. इससे सांस लेने में भी दिक्कत होती है. प्रदूषण कम होने से ये इंफेक्शन कम हो गए हैं.
- आजकल लोग काम पर नहीं जा रहे और इसलिए खांसी, जुकाम जैसी छोटी बीमारियों को ठीक होने का समय दे पा रहे हैं. काम पर जाना हो तो तुरंत दवाई खाकर खुद को ठीक करना होता है लेकिन अब वो ऐसा नहीं कर रहे हैं.
डॉक्टर कहते हैं कि लोगों के लाइफ़स्टाइल में आया ये बदलाव एक सकारात्मक संकेत भी है. अगर वो साफ-सफाई, स्वच्छ खाने को अपनी आदत बना लेते हैं तो कई बीमारियों से निजात मिल जाएगी.
दवाओं की ऑनलाइन ख़रीद
एंटीबायोटिक के अलावा दूसरी दवाइयों की कम बिक्री की बात करें तो भूपेंद्र कुमार इसके पीछे ऑनलाइन खरीद को वजह मानते हैं. उनका कहना है कि लॉकडाउन में लोग केमिस्ट की बजाएं ऑनलाइन दवाइयां ज़्यादा मंगा रहे हैं.
वहीं, डॉ. प्रवीण के मुताबिक लॉकडाउन के कारण मरीज़ डॉक्टर के पास आ ही नहीं पा रहे थे. फिर कुछ दवाइयां स्थानीय केमिस्ट के पास मिलती भी नहीं हैं. मेरे कुछ मरीजों ने एक-दो महीनों की दवाइयां ही छोड़ दीं. इसलिए भी दूसरी दवाइयों की मांग कम हुई है.
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