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प्रियंका गांधी के मामले में आक्रामक क्यों हो जाती है योगी सरकार
- Author, समीरात्मज मिश्र
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
उत्तर प्रदेश में सीमा पर फँसे मज़दूरों को उनके घर पहुंचाने के लिए कांग्रेस पार्टी और यूपी सरकार के बीच पिछले चार दिन से चल रही 'बस राजनीति' गर्म तो ख़ूब हुई लेकिन उन मज़दूरों को कोई फ़ायदा पहुंचाने में क़ामयाब नहीं हुई जो अभी भी सड़कों पर पैदल चलने को विवश हैं.
कांग्रेस पार्टी की ओर से भेजी गई बसें आगरा और नोएडा से लौट गईं और यात्री अभी भी दर-दर भटक रहे हैं.
राज्य सरकार ने 18 मई को प्रियंका गांधी की यह पेशकश स्वीकार कर ली थी कि वो 1,000 बसें मज़दूरों को उनके घरों तक पहुंचाने के लिए भेजना चाहती हैं.
कांग्रेस पार्टी की ओर से तय समयसीमा के भीतर बसों की सूची उन सभी जानकारियों के साथ उपलब्ध करा दी गई जो राज्य सरकार ने मांगी थीं लेकिन सरकार के मुताबिक, क़रीब 400 बसें मानक पर खरी नहीं उतरीं.
हालांकि, प्रियंका गांधी और कांग्रेस पार्टी की ओर से यह भी कहा गया कि कम से कम उन बसों को तो इस्तेमाल कर लिया जाए जो उनके मानकों पर खरी उतर रही हैं लेकिन यूपी सरकार शायद सभी बसों को एक साथ भेजना चाहती थी.
इस मुद्दे पर ख़ूब राजनीति हुई
इस मामले में दो दिन तक जमकर राजनीति हुई, आगरा में राजस्थान से लगी सीमा पर कांग्रेस पार्टी के नेताओं ने ख़ूब हंगामा किया और आख़िरकार पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू समेत कई कार्यकर्ताओं के ख़िलाफ़ एफ़आईआर हुई और उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया.
इन सबके बीच, सवाल ये उठ रहे हैं कि राज्य सरकार ने बसें भेजने संबंधी प्रियंका गांधी के प्रस्ताव को स्वीकार क्यों किया और स्वीकार किया भी तो फिर बसों को चलाया क्यों नहीं?
राज्य के उप मुख्यमंत्री डॉक्टर दिनेश शर्मा ने बुधवार दोपहर मीडिया को इसकी वजह बताई, "कांग्रेस ने जो सूची दी थी उसमें 460 बसें फ़र्ज़ी हैं और उसमें भी 297 कबाड़ की हालत में हैं जिनकी कोई फ़िटनेस नहीं है. इनमें भी कई ऑटो, एंबुलेंस और अन्य गाड़ियों के डीटेल दिए गए हैं, बसों के नहीं."
सरकार को राजनीतिक दांव का जवाब देना चाहिए था?
वहीं वरिष्ठ पत्रकार योगेश मिश्र कहते हैं कि सरकार को बसों का प्रस्ताव स्वीकार ही नहीं करना चाहिए था.
वो कहते हैं, "चिट्ठी का जवाब देना ही नहीं था और यदि देना भी था तो राजनीतिक पार्टी की ओर से देना चाहिए था और राजनीतिक तरीक़े से देना चाहिए था. सरकार की ओर से औपचारिक तरीक़े से मना कर देना चाहिए था. बीजेपी महाराष्ट्र में फँसे लोगों को लाने की बात कर सकती थी और इस मुद्दे पर कांग्रेस पार्टी को घेर सकती थी लेकिन बस चलाने की अनुमति देकर और फिर अनावश्यक वजहों से इसमें अड़ंगा डालकर सरकार ख़ुद घिर गई. इसकी वजह ये है कि सरकार और संगठन के बीच कोई समन्यव नहीं है."
दरअसल, ये पहला मामला नहीं है जब प्रियंका गांधी की सक्रियता की वजह से सरकार की किरकिरी हुई हो. इससे पहले भी कई मौक़े आए हैं जब प्रियंका गांधी ने सरकार को घेरा, सरकार की ओर से प्रियंका गांधी के ख़िलाफ़ कार्रवाई की गई लेकिन बाद में सरकार उन्हीं मांगों को मानने पर विवश हुई जिन्हें प्रियंका गांधी ने उठाए थे.
चाहे सोनभद्र में आदिवासियों की सामूहिक हत्या के बाद उन्हें मुआवज़ा दिलाने का मामला हो, उन्नाव में एक लड़की को कथित तौर पर ज़िंदा जलाने का मामला हो या फिर सीएए प्रदर्शन के दौरान जेल में बंद रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी एसआर दारापुरी से मिलने जाने का मामला हो, हर जगह सरकार ने प्रियंका गांधी को रोकने की कोशिश की जिससे इन घटनाओं को मीडिया में सुर्ख़ियां मिलीं.
पिछले साल जुलाई महीने में सोनभद्र के उभ्भा गांव में ज़मीन विवाद में दस लोगों की हत्या कर दी गई थी. दो दिन बाद प्रियंका गांधी को उस वक़्त पहले वाराणसी और फिर मिर्ज़ापुर में रोक लिया गया जब वो उभ्भा गांव में पीड़ित परिवारों से मिलने जा रही थीं.
मिर्ज़ापुर के चुनार क़िले में प्रियंका गांधी दो दिन तक धरने पर बैठी रहीं. आख़िरकार उनकी पीड़ित परिवारों से मुलाक़ात कराई गई और बाद में सरकार ने मुआवज़े की भी घोषणा की. राज्य सरकार ने बाद में पीड़ित परिवारों को ज़मीन के पट्टे भी दिए.
सबसे दिलचस्प मामला उस वक़्त देखने को मिला जब पिछले साल फ़रवरी में पार्टी महासचिव बनने के बाद प्रियंका गांधी पहली बार लखनऊ गईं और वहां उन्होंने रोड शो किया.
इस दिन राज्य सरकार ने अपने 22 महीने पूरे होने के उपलक्ष्य में राज्य के सभी प्रमुख अख़बारों को पहले पन्ने पर पूरे पेज का विज्ञापन दिया. सरकार का 22 महीने पूरे होने के उपलक्ष्य में विज्ञापन देने का कोई औचित्य नहीं था लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का कहना था कि सरकार ने ऐसा इसलिए किया ताकि प्रियंका गांधी के रोड शो को पहले पेज पर कवरेज न मिल सके.
प्रियंका को ख़ास तवज्जो क्यों देती है योगी सरकार
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस पार्टी की राजनीतिक हैसियत यह है कि पिछले तीन दशक से वह राज्य की सत्ता से बाहर है. विधानसभा में उसके महज़ सात सदस्य हैं, लोकसभा में वह सिर्फ़ एक सीट का प्रतिनिधित्व करती है, राज्यसभा में पार्टी के पास दो और विधान परिषद में सिर्फ़ एक सीट है.
राज्य में समाजवादी पार्टी मुख्य विपक्षी पार्टी है, विधानसभा में मौजूदगी के आधार पर उसके बाद बहुजन समाज पार्टी, फिर अपना दल और उसके बाद कांग्रेस पार्टी का नंबर आता है. बावजूद इसके कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी के किसी बयान या फिर आरोपों पर राज्य सरकार और भारतीय जनता पार्टी की त्वरित प्रतिक्रिया आती है.
जहां तक अन्य राज्यों और सीमाओं पर फँसे मज़दूरों का सवाल है तो दूसरे राजनीतिक दल भी सरकार से ठोस क़दम उठाने की मांग कर चुके हैं लेकिन योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में बीजेपी सरकार प्रियंका गांधी की मांग को लगता है ख़ास तवज्जो देती है.
वरिष्ठ पत्रकार योगेश मिश्र कहते हैं, "दरअसल, भारतीय जनता पार्टी और उसके नेतृत्व वाली सरकार में मैच्योरिटी नहीं है जिसकी वजह से प्रियंका गांधी को बार-बार स्पेस मिलता है. दूसरा, राजनीतिक तौर पर प्रियंका गांधी लोगों का ध्यान खींचने में क़ामयाब भी होती हैं. यही वजह है कि अखिलेश यादव और मायावती की बजाय विपक्ष के केंद्र में कांग्रेस आ जा रही है. इसके अलावा तमाम मुद्दों पर कांग्रेस पार्टी स्टैंड भी ले रही है और सड़कों पर उतर भी रही है तो चर्चा के केंद्र में भी उसका रहना स्वाभाविक है. मायावती और अखिलेश इससे चूक रहे हैं. हां, यह अलग बात है कि इसका राजनीतिक फ़ायदा कांग्रेस को कितना मिलता है."
समाजवादी पार्टी का कहना, वो भी है मैदान में
वहीं दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी का कहना है कि उसके कार्यकर्ता लॉकडाउन में फंसे लोगों और प्रवासी मज़दूरों की हर संभव मदद कर रहे हैं और सड़क पर हैं लेकिन मीडिया में इसकी चर्चा नहीं होती.
पार्टी प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी कहते हैं, "हम लोग सेवा भाव से यह सब कर रहे हैं, लोगों की विवशता का राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश हम नहीं कर रहे हैं. लॉकडाउन के दौरान यूपी की सीमा में जिनकी भी मौत हुई है, पार्टी फ़ंड से उनके आश्रितों को एक-एक लाख रुपये दिए जा रहे हैं. हमने सरकार से भी मृतकों को दस-दस लाख रुपये देने की मांग की है लेकिन सरकार ने हमारी मांगें नहीं मानी हैं."
जहां तक बहुजन समाज पार्टी की बात है तो इस बारे में सिर्फ़ बीएसपी नेता मायावती ही या तो ट्विटर पर या फिर मीडिया में बयान जारी करती हैं.
बीएसपी के नेता यह बताने की भी स्थिति में नहीं हैं कि उनकी पार्टी की ओर से लॉकडाउन में फँसे लोगों की मदद के लिए कोई कार्यक्रम चल रहा है या नहीं.
समाजवादी पार्टी के लोग जगह-जगह राशन इत्यादि ज़रूर बांट रहे हैं लेकिन पार्टी नेता अखिलेश यादव भी बीएसपी नेता मायावती की तरह ट्विटर पर ही ज़्यादा सक्रिय दिख रहे हैं.
समाजवादी पार्टी के एक नेता नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं, "अखिलेश यादव इसलिए सड़कों पर नहीं उतर रहे हैं और कार्यकर्ताओं से भी बड़ी संख्या में अपील नहीं कर रहे हैं क्योंकि उनके कहने भर से समाजवादी युवा सड़कों पर उतर जाएंगे और हो सकता है कि अव्यवस्था फैल जाए. इसी स्थिति की आशंका में उन्होंने सीधे तौर पर अपील नहीं की है. लेकिन समाजवादी पार्टी के लोग हर ज़िले में सेवा भाव के लिए सक्रिय हैं."
लखनऊ में वरिष्ठ पत्रकार अमिता वर्मा कहती हैं, "जहां तक विपक्षी पार्टी के तौर पर कांग्रेस का सवाल है तो यह बीजेपी को भी सूट करता है. प्रियंका गांधी का विरोध करने या फिर उन्हें घेरने के पीछे ऐसा नहीं है कि बीजेपी को प्रियंका गांधी से तात्कालिक तौर पर किसी राजनीतिक नुक़सान की आशंका है लेकिन ऐसा करके वह कांग्रेस पार्टी को मुख्य विपक्षी की भूमिका में लाने की कोशिश में रहती है ताकि समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी नेपथ्य में चले जाएं. हालांकि चर्चा में रहना और फिर ज़मीनी तौर पर विपक्ष की जगह लेना, दोनों में काफ़ी अंतर है. लेकिन यह बात ज़रूर है कि प्रियंका गांधी जब राजनीतिक पटल पर स्पेस पाती हैं तो समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी दोनों ख़ुद के लिए ख़तरा महसूस करती हैं."
बस राजनीति के प्रकरण में समाजवादी पार्टी ने तो सीधे तौर पर कुछ भी कहने से परहेज़ किया है लेकिन मायावती ने इस मुद्दे पर लगातार कई ट्वीट करके बीजेपी से ज़्यादा कांग्रेस पार्टी को घेरा है. यही नहीं, मायावती कांग्रेस पार्टी को घेरने वाले कोई मौक़े नहीं छोड़तीं, चाहे राजस्थान में कोटा के एक अस्पताल में बच्चों की मौत का मामला हो, राहुल गांधी का दलितों के यहां भोजन करने का मामला हो या फिर उत्तर प्रदेश में प्रियंका गांधी की सक्रियता हो, कांग्रेस पार्टी उनके निशाने पर प्रमुखता से रहती है.
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