कोरोना संकट: मोदी सरकार के आर्थिक पैकेज से क्या किसानों की बदहाली दूर होगी?

    • Author, तारेंद्र किशोर
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

लॉकडाउन की वजह से पैदा हुए आर्थिक संकट को देखते हुए 12 मई को भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 20 लाख करोड़ के आर्थिक पैकेज की घोषणा की थी. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पाँच प्रेस ब्रीफिंग में ये 20 लाख करोड़ किन मदों में इस्तेमाल होंगे, इसका ब्यौरा दिया था. अपनी तीसरी प्रेस ब्रीफिंग में उन्होंने कृषि के क्षेत्र में बुनियादी ढांचे को ठीक करने और कृषि से संबंधित क्षेत्रों पर 1.5 लाख करोड़ ख़र्च करने की बात कही थी.

कृषि संबंधित जिन सुधारों की उन्होंने बात कही है उनमें अनिवार्य वस्तु अधिनियम को संशोधित करना शामिल है. इस संशोधन के तहत अनाज, खाद्य तेल, तिलहन, दाल, प्याज और आलू के उत्पादन और बिक्री को डीरेगुलेट किया जाएगा. इससे इन उत्पादों पर कोई स्टॉक लिमिट नहीं रह जाएगी. राष्ट्रीय आपदा जैसी आपात स्थिति में ही इस पर स्टॉक लिमिट लगाई जाएगी.

इसके अलावा कृषि उपज बाज़ार समिति (एपीएमसी) के दबदबे को दरकिनार करने की बात है ताकि किसान किसी भी ख़रीदार को अपना उत्पाद बेच सकें. तीसरे सुधार के तहत उन्होंने कृषि उत्पादों के लिए एक राष्ट्रीय क़ानून लाने की बात कही है ताकि निजी निवेश को आकर्षिक किया जा सके और एपीएमसी को अधिक प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़े.

इन तीन सुधारों के अलावा उन्होंने आठ उपायों की बात की है. लेकिन सवाल यह है कि क्या ये क़ानूनी सुधार और उपाय कृषि क्षेत्र के संकट को दूर करने के लिए पर्याप्त हैं. क्या इन सुधारों का असर निकट भविष्य में धरातल पर दिखने वाला है या फिर लंबा वक़्त लगेगा इसके प्रभावी होने में.

जब बीबीसी ने ये सवाल पूर्व कृषि सचिव सिराज हुसैन से पूछा तो उनका जवाबा था, "क़ानून सुधार की जो बात है जैसे अनिवार्य वस्तु अधिनियम और एपीएमसी वग़ैरह, इनके प्रभावी होने की बात तो सबसे पहले इस पर निर्भर करता है कि सरकार इन्हें कब तक लाती है और इसे किस तरीक़े से लागू करती है."

उन्होंने कहा, "लागू होने के बाद बाज़ार के माहौल पर उसका असर पड़ेगा और जब ख़रीफ़ की फ़सल आएगी तब हो सकता है कि निजी कंपनियों की ओर से कुछ ख़रीदारी हम देखे."

"क़ानून आने के छह महीने बाद संभव है कि एपीएमसी एक्ट के कुछ प्रभाव देखने को मिले."

तत्काल राहत नहीं

सरकार की घोषणाओं में किसानों के लिए तत्काल राहत की बात पर जेएनयू में सेंटर फ़ॉर इकोनॉमिक स्टडीज़ एंड प्लानिंग के प्रोफ़ेसर प्रवीण झा बीबीसी से बातचीत में कहते हैं कि इन घोषणाओं से किसानों को तत्काल राहत नहीं मिलने वाली है.

वो कहते हैं, "जो घोषणाएँ हुई हैं उनमें उम्मीद की गई है कि भविष्य में कृषि उत्पाद के भंडारण में निवेश ज्यादा होगा लेकिन यह ख्याली पुलाव ज्यादा है. अभी किसने मना किया है निवेशकों को निवेश करने से. यह तो कोई मुद्दा ही नहीं है."

कृषि विशेषज्ञ देवेंद्र शर्मा का मानना है कि कृषि क्षेत्र में जो सुधार की बात की गई है उसमें से ज्यादातर पहले से ही चल रही है. कई मामलों में यह रिपैकेजिंग की तरह है. इसमें से कई को ज़मीनी स्तर पर आने में सालों लगेंगे. इसलिए किसानों को जो तत्काल राहत की ज़रूरत है वो नहीं मिलती दिख रही है. उन्हें सीधे रक़म देने की ज़रूरत है.

कृषि क्षेत्र में क़ानूनी सुधार के मसले पर अर्थशास्त्री प्रवीण झा कहते हैं, "सरकार की घोषणाओं में सबसे ज्यादा ज़ोर एपीएमसी एक्ट में संशोधन पर दिया गया है. इसके तहत अंतरराजीय छूट देने की बात कही गई है लेकिन सवाल उठता है कि इस एक्ट के तहत किसी राज्य के अंदर ही कृषि उत्पादों का कितना बड़ा दायरा आ पाता है."

"बिहार जैसे राज्य में साल 2006 में ही एपीएमसी को हटा दिया गया था. इसके अलावा भी कई राज्य हैं जहाँ यह प्रभावी नहीं है. आख़िर कृषि उत्पाद का कितना प्रतिशत एपीएमसी के मार्फ़त बाज़ार में आता है. अगर पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्यों को छोड़ दें तो कहीं भी इसका कोई इतना प्रभाव नहीं है. इसलिए यह कोई बड़ा बाधक नहीं था जिसके लिए क़ानून में संशोधन की ज़रूरत थी. "

देवेंद्र शर्मा भी एपीएमसी को लेकर कहते हैं कि जब साल 2006 में इसे बिहार में ख़त्म किया गया था तब भी बहुत संभावनाओं की बात कही गई थी कि इससे निजी निवेश बढ़ेगा और निजी मंडियों का दौर आएगा. फिर किसानों को अपनी फ़सल की अच्छी क़ीमत मिलेगी. लेकिन हुआ यह कि अब भी हर साल बिहार के किसान अपनी फ़सल पंजाब, हरियाणा और दूसरे राज्यों में लाकर बेचते हैं. किसानों की बदहाली इन चौदह सालों में कहाँ सुधरी?

अर्थशास्त्री प्रवीण झा कहते हैं कि क़ानून बदल देना कोई समाधान नहीं है. यह तो आसानी से किया जा सकता है लेकिन इन सुधारों से संबंधित आधारभूत संरचना में बदलाव की जो संभावनाएँ हैं उसमें तो कितने साल लगेंगे इसका कोई अंदाज़ा नहीं है.

वो कहते हैं, "इन आधारभूत संरचनाओं में सुधार को लेकर जो बाधक हैं जैसे कुछ ख़ास तरह के निवेश उनके लिए सरकार ने कुछ नहीं किया है. रिटेल सेक्टर को कृषि के क्षेत्र में जब छूट दी गई तब उम्मीद की गई थी कि इससे कृषि निवेश में बढ़ावा मिलेगा लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ."

निजी निवेश कितना कारगर

सरकार ने जो घोषणाएँ की हैं उसमें कृषि क्षेत्र को बाज़ार के लिए खोलने की बात है. ये कितना कारगर होने वाला है?

प्रवीण झा का कहना है कि "जब हम बाज़ार को खोलते हैं तो इससे उत्पाद के मूल्य में जो चढ़ाव-उतार होता है, उसकी संभावना में वृद्धि हो जाती है. भारत समेत दुनिया के तमाम देशों में यही देखा गया है."

"इससे होता यह है कि मान लीजिए किसी किसान ने किसी साल बीटी कॉटन की मूल्य वृद्धि को देखते हुए लोन लेकर सारी रक़म बीटी कॉटन की फ़सल में डाल दिया. इसकी खेती महंगी होती है. जिस साल उसने लोन लिया उस साल बीटी कॉटन के भाव गिर गए. अब ऐसी स्थिति में तो किसान मारा जाएगा. पिछले कुछ अर्सों से जो ये किसानों की आत्महत्याएँ हो रही हैं, उसके पीछे यह एक अहम कारण रहा है."

वो बताते हैं, "कृषि उत्पाद में पाँच प्रतिशत का भी आउटपुट अगर ऊपर-नीचे होता है तो फिर संकट 50 से 60 प्रतिशत तक जाता है. इस क्षेत्र में कभी भी यह नहीं मानकर चला जा सकता है कि सबकुछ अच्छा ही होगा और फिर उसे मानते हुए आप जोखिमों को नज़रअंदाज़ कर दें."

वो कहते हैं कि कृषि उत्पाद बड़े पैमाने पर हर साल बर्बाद हो जाते हैं, इसलिए इसे निजी क्षेत्रों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता है. इसमें सरकार को अपनी भागीदारी रखनी ही होगी ताकि किसानों को सुरक्षा की भावना मिल सके.

वो मानते हैं कि प्रोसेसर्स को इस बात की छूट देना कि वो जितना चाहे, उतना कृषि उत्पाद स्टोर कर सकते हैं, यह आ बैल मुझे मार जैसी वाली स्थिति पैदा करने जैसा है क्योंकि उत्पाद के मूल्य के घटने-बढ़ने में कई तरह के बिचौलिए की भूमिका होती है.

देवेंद्र शर्मा भी यही मानते हैं. वो कहते हैं, "कृषि बाज़ार में निजी निवेश तो अमरीका और यूरोप में तो पहले से है फिर भी वहाँ कृषि का संकट क़ायम है. वहाँ भी सरकारों को किसानों को भारी सब्सिडी देना पड़ता है. जब वहां ये सिस्टम नहीं चल पाया तो कैसे उम्मीद करते हैं कि यहाँ चल जाएगा.

वो बताते हैं कि अभी देश में सात हज़ार एपीएमसी की मंडियां हैं और तक़रीबन 42000 मंडियों की ज़रूरत है. पंजाब जैसे राज्यों में एपीएमसी की मंडियों के माध्यम से ही किसानों की स्थिति इतनी मज़ूबत हुई है और अब सरकार इन्हीं एपीएमसी को मंडियों को ख़त्म करने जा रही हैं. इसे ख़त्म करने नहीं बल्कि बनाने की ज़रूरत है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)