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गलवान घाटी को लेकर क्यों है भारत-चीन में तनाव
- Author, कमलेश मठेनी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत और चीन के बीच सीमा पर पिछले कई हफ़्तों से तनाव की स्थिति है. वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर दोनों देश अपने सैनिकों की मौजूदगी बढ़ा रहे थे.
अक्साई चीन में स्थित गलवान घाटी को लेकर दोनों देशों के बीच इस तनाव की शुरुआत हुई थी.
भारत का कहना है कि गलवान घाटी के किनारे चीनी सेना के कुछ टेंट देखे गए हैं. इसके बाद भारत ने भी वहाँ फ़ैज की तैनाती बढ़ी दी है. वहीं, चीन का आरोप है कि भारत गलवान घाटी के पास रक्षा संबंधी ग़ैर-क़ानूनी निर्माण कर रहा है.
मई में दोनों देशों के बीच सीमा पर अलग-अलग जगह टकराव हो चुका है. नौ मई को नॉर्थ सिक्किम के नाकू ला सेक्टर में भारतीय और चीनी सैनिकों में झड़प हुई थी. उसी दौरान लद्दाख़ में एलएसी के पास चीनी सेना के हेलिकॉप्टर देखे गए थे. इसके बाद भारतीय वायुसेना ने भी सुखोई समेत दूसरे लड़ाकू विमानों से पेट्रोलिंग शुरू कर दी.
सोमवार को वायुसेना प्रमुख आरकेएस भदौरिया ने भी चीन का ज़िक्र किया था.
उन्होंने कहा, “वहां कुछ असामान्य गतिविधियां देखी गई थीं. ऐसी घटनाओं पर हम क़रीब से नज़र रखते हैं और ज़रूरी कार्रवाई भी करते हैं. ऐसे मामलों में ज्यादा चिंता की ज़रूरत नहीं.”
वहीं, थलसेना प्रमुख जनरल एमएम नरवणे ने दोनों देशों की सेनाओं के बीच टकराव के बाद पिछले हफ़्ते कहा था कि चीन के साथ लगी सीमा पर भारतीय सैनिक अपनी ‘स्थिति’ पर क़ायम हैं. सीमावर्ती क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे के विकास का काम चल रहा है.
उन्होंने ये भी बताया था कि इन झड़पों में दोनों देशों की सेनाओं के सैनिकों का व्यवहार आक्रामक था इसलिए उन्हें मामूली चोटें भी आई हैं.
चीन का भारत पर आरोप
चीन ने इस तनाव की वजह भारत को बताया है. चीन के सरकारी अख़बार ग्लोबल टाइम्स में सोमवार को प्रकाशित एक आर्टिकल में गालवन नदी (घाटी) क्षेत्र में तनाव के लिए भारत को ज़िम्मेदार बताया गया है.
अख़बार ने चीनी सेना के हवाले से कहा, “भारत ने इस इलाक़े में रक्षा संबंधी ग़ैर-क़ानूनी निर्माण किए हैं. इसकी वजह से चीन को वहां सैन्य तैनाती बढ़ानी पड़ी है. भारत ने इस तनाव की शुरुआत की है. लेकिन, हमें यक़ीन है कि यहां डोकलाम जैसे हालात नहीं बनेंगे जैसा साल 2017 में हुआ था. भारत कोविड-19 की वजह से आर्थिक परेशानियों से जूझ रहा है और जनता का ध्यान हटाने के लिए उसने गालवन में तनाव पैदा किया.”
ग्लोबल टाइम्स ने ये भी लिखा है कि गालवन घाटी चीनी इलाक़ा है. भारत द्वारा उठाए गए क़दम सीमा संबंधी मुद्दों पर भारत और चीन के बीच हुए समझौते का उल्लंघन करते हैं. भारत मई की शुरुआत से ही गालवन घाटी में सीमा पार कर रहा है और चीनी इलाक़े में घुस रहा है.
क्यूं अहम है गालवन घाटी
गलवान घाटी विवादित क्षेत्र अक्साई चीन में है. गलवान घाटी लद्दाख़ और अक्साई चीन के बीच भारत-चीन सीमा के नज़दीक स्थित है.
यहां पर वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) अक्साई चीन को भारत से अलग करती है. अक्साई चीन पर भारत और चीन दोनों अपना दावा करते हैं. ये घाटी चीन के दक्षिणी शिनजियांग और भारत के लद्दाख़ तक फैली है.
जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी के पूर्व प्रोफ़ेसर और अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार एसडी मुनि बताते हैं कि ये क्षेत्र भारत के लिए सामरिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण हैं क्योंकि ये पाकिस्तान, चीन के शिनजियांग और लद्दाख़ की सीमा के साथ लगा हुआ है. 1962 की जंग के दौरान भी गालवन नदी का यह क्षेत्र जंग का प्रमुख केंद्र रहा था.
कोरोना के बीच सीमा पर तनाव
एक तरफ़ पूरी दुनिया कोरोना वायरस से लड़ रही है. भारत में भी मामले एक लाख के पार जा चुके हैं और चीन पर यूरोप और अमरीका बार-बार सवाल उठा रहे हैं. ऐसे में दोनों देशों के एक नए विवाद में पड़ने की वजह क्या है.
एसडी मुनि कहते हैं कि भारत इस वक़्त उन क्षेत्रों में अपना दावा मज़बूत करना चाहता है जिन्हें अपना मानता है पर वो विवादित हैं.
वह बताते हैं, “इसकी शुरुआत तो 1958 से हो गई थी जब अक्साई चीन में चीन ने सड़क बनाई थी जो कराकोरम रोड से जुड़ती है और पाकिस्तान की तरफ़ भी जाती है. जब सड़क बन रही थी तब भारत का ध्यान उस पर नहीं गया लेकिन सड़क बनने के बाद भारत के उस समय के प्रधानमंत्री प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उस पर आपत्ति जताई थी. उस वक़्त से ही भारत कह रहा है कि अक्साई चीन को चीन ने हड़प लिया है.”
लेकिन, तब भारत ने इस पर कोई सैन्य कार्रवाई नहीं की थी. अब कार्रवाई इसलिए हो रही है क्योंकि भारत को अपना दावा करना है. जैसा कि पीओके और गिलगित-बालतिस्तान को लेकर भारत ने अपना दावा मज़बूत करना शुरू कर दिया है. उसी संदर्भ में अक्साई चीन में भी गतिविधियां हो रही हैं. लेकिन, अब चीन को इससे परेशानी होने लगी है.
एसडी मुनि बताते हैं कि चीन गालवन घाटी में भारत के निर्माण को ग़ैर-क़ानूनी इसलिए कह रहा है क्योंकि भारत-चीन के बीच एक समझौता हुआ है कि एलएसी को मानेंगे और उसमें नए निर्माण नहीं करेंगे. लेकिन, चीन वहां पहले ही ज़रूरी सैन्य निर्माण कर चुका है और अब वो मौजूदा स्थिति बनाए रखने की बात करता है. अपनी स्थिति मज़बूत करने के लिए अब भारत भी वहां पर सामरिक निर्माण करना चाहता है.
भारत की बदलती रणनीति
पीओके से लेकर अक्साई चीन पर भारत की बदलती रणनीति की वजह क्या है. क्या भारत असुरक्षित महसूस कर रहा है या वो आक्रामक हो गया है.
एसडी मुनि के मुताबिक़ भारत आक्रमक नहीं हुआ है बल्कि मुखर हो गया है. जिन जगहों पर वो अपना अधिकार बताता रहा है अब उन पर अधिकार जताने भी लगा है.
वह कहते हैं कि 1962 के मुक़ाबले आज का भारत बहुत सशक्त भारत है. आर्थिक दृष्टिकोण से भी ये मज़बूत है. उसके अलावा चीन जिस तरह से उभरकर आया है उससे ख़तरा बढ़ा हुआ है. पाकिस्तान से भी भारत के संबंध बेहद ख़राब चल रहे हैं और इससे ख़तरा ज़्यादा बढ़ जाता है. ऐसे में भारत सरकार को लग रहा है कि उसे अपनी सीमाओं को सुरक्षित करना चाहिए. अगर अक्साई चीन में भारत सैन्य निर्माण करता है तो वहां से चीन की सेना की गितिविधियों पर नज़र रख पाएगा.
वहीं, ग्लोबल टाइम्स ने एक रिसर्च फेलो के हवाले से लिखा है कि गालवन घाटी में डोकलाम जैसी स्थिति नहीं है. अक्साई चीन में चीनी सेना मज़बूत है और तनाव बढ़ाने पर भारतीय सेना को इसकी भारी क़ीमत चुकानी पड़ सकती है.
इस संबंध में जानकारों का मानना है कि चीन की स्थिति वहां पर मज़बूत तो है जिसका भारत को नुक़सान हो सकता है. लेकिन, कोरोना वायरस के चलते चीन अभी कूटनीतिक तौर पर कमज़ोर हो गया है. यूरोपीय संघ और अमरीका उस पर खुलकर आरोप लगा रहे हैं जबकि भारत ने अभी तक चीन के लिए प्रत्यक्ष तौर पर कुछ ख़ास नहीं कहा है. ऐसे में चीन भारत से संतुलित रुख़ अपनाने की उम्मीद कर रहा है. भारत इस मोर्चे पर चीन से मोल-तोल करने की स्थिति में है.
क्या देशों पर बढ़ेगा दबाव
कोरोना काल में दो देशों की सीमाओं पर तनाव पैदा होने से क्या उन पर दबाव बढ़ेगा. चीन ने भारत पर कोरोना के मामलों से ध्यान भटकाने के लिए सीमा विवाद पैदा करने का आरोप लगाया है.
इस एसडी मुनि कहते हैं कि कोरोना वायरस से लड़ाई अपनी जगह है और देश की सुरक्षा अपनी जगह. चीन भी दक्षिण चीन सागर में अपने सैन्य निर्माण का विस्तार कर रहा है. दुनिया कोरोना वायरस से निपटने में व्यस्त है लेकिन फ़ौज तो कोरोना वायरस से नहीं लड़ रही है. फ़ौज अपना काम करेगी. ये सामरिक महत्व के मसले हैं जो कोरोना से पहले भी थे, अब भी हैं और आगे भी रहेंगे. इसलिए चीन का ये दावा ठीक नहीं है.
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