You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
कोरोना लॉकडाउन: 12 घंटे काम करने का नियम आया तो कौन सी मुश्किलें आएंगी?
- Author, ब्रजेश मिश्र
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
कोरोना वायरस महामारी की वजह से दुनियाभर की अर्थव्यवस्था प्रभावित है और लोगों के सामने रोज़ी-रोटी का संकट खड़ा हो रहा है.
इस महामारी के चलते अब तक दुनियाभर में करोड़ों लोगों की नौकरियां छिन चुकी है और लोग खाने के लिए भी तरस रहे हैं. भारत में लॉकडाउन का तीसरा दौर चालू है. तीसरे चरण में सरकार ने कुछ नियमों के साथ निजी कंपनियों और फैक्ट्रियों को खोलने के लिए निर्देश जारी किए हैं, लेकिन समस्याएं अब भी कई हैं.
इस बीच इनफ़ोसिस के सह-संस्थापक नारायण मूर्ति ने काम के घंटे बढ़ाने का सुझाव दिया. इकोनॉमिक टाइम्स से बातचीत में उन्होंने यह भी कहा कि हफ़्ते में छह दिन काम कराया जाए और सोशल डिस्टेंसिंग के लिए तीन शिफ़्टों में काम शुरू किया जाए. नारायण मूर्ति ने काम के घंटे बढ़ाकर एक हफ़्ते में 60 घंटे करने का भी सुझाव दिया है. नारायण मूर्ति के इस सुझाव की हर तरफ आलोचना हो रही है.
अधिकतर जानकारों का कहना है कि कोरोना महामारी और लॉकडाउन का बहाना देकर काम के घंटे बढ़ाना कामगारों के अधिकारों के ख़िलाफ़ होगा और यह उनका शोषण है. उनका मानना है कि अगर ऐसा कोई नियम लागू होता है तो उसका सबसे बुरा असर असंगठित क्षेत्र में काम करने वालों और मज़दूर वर्ग पर पड़ेगा, जो कॉन्ट्रैक्ट पर काम करते हैं या दैनिक मज़दूरी करते हैं.
दुनियाभर में काम के घंटों का सामान्य मानक 8 घंटे तय है. दुनिया के कई देशों में कंपनियों में फाइव डे वर्किंग (हफ़्ते में पांच दिन काम) यानी हफ़्ते में 40 घंटे काम करने का नियम लागू है और अतिरिक्त घंटे (ओवर टाइम) काम करने पर उसका पैसा दिया जाता है.
गुजरात सरकार पर उठ रहे सवाल
नारायण मूर्ति के सुझावों पर सवाल उठाते हुए ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (AITUC) की महासचिव अमरजीत कौर कहती हैं, ''कम वर्कफ़ोर्स का हवाला देकर काम के घंटे बढ़ाना बिल्कुल सही नहीं है. इससे कामगारों पर शारीरिक और मानसिक दबाव बढ़ेगा साथ ही स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं भी बढ़ेंगी. हम चाहते हैं कि फिजिकल डिस्टेंसिंग को अपनाते हुए काम कराया जाए या फिर शिफ़्टों में काम कराया जाए. लेकिन काम के घंटे बढ़ाकर लोगों का शोषण करना सही नहीं है.''
उन्होंने कहा, "हर कोई इस महामारी से परेशान है. लोगों के सामने रोज़ीरोटी का संकट है. लोग काम चाहते हैं. ऐसे में आप वही करें जो फैक्ट्री एक्ट के तहत लागू किया जा सकता है. काम के घंटे बढ़ाने की कोशिश करना ग़लत है. इस बारे में देश के चार राज्य सरकारें नियम बना चुकी हैं. हिमाचल प्रदेश, राजस्थान और पंजाब, इन तीन राज्यों की सरकारें फैक्ट्री एक्ट को अपनाते हुए लोगों से काम करवा रही हैं और कहा है कि अतिरिक्त काम करने पर उसका पैसा भी दिया जाएगा लेकिन गुजरात की सरकार ने इससे अलग नियम लागू किया है और कहा है कि काम हम 12 घंटे करवाएं लेकिन पैसे सिर्फ़ 8 घंटे काम करने के ही देंगे. अब अगर एक सरकार फैक्ट्री कानून को नज़रअंदाज़ करके काम कराती है तो वह ग़लत होगा."
अमरजीत कौर कहती हैं कि दुनियाभर में ऐसा देखा जा रहा है कि कोविड-19 के बहाने सिविल राइट्स को नियंत्रित किया जा रहा है. इसके बहाने कामगारों के अधिकारों पर हमला किया जा रहा है जो ग़लत है. देश में वर्कफ़ोर्स कम नहीं है. देश में करीब 54 करोड़ कामगार हैं. यह आंकड़ा 10 साल पुराना है. इनमें से करीब 50 करोड़ लोग असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं. अगर काम के घंटे बढ़ाए गए तो असंगठित क्षेत्र में काम करने वालों पर बुरा असर पड़ेगा.
वो कहती हैं, "बहुत सी कंपनियां कामगारों को कोई अतिरिक्त सुविधा नहीं दे रहीं. न उन्हें आने-जाने की सुविधा दी जा रही है, न खाने की सुविधा दी जा रही और न ही कोई स्वास्थ्य संबंधी सुविधा दी जा रही लेकिन काम के घंटे बढ़ा दिए जाएंगे. ऐसे में तो काम करने वालों पर दबाव बढ़ता जाएगा और यह पूरी तरह उनका शोषण है. अगर कंपनियां ओवरटाइम कराती हैं तो छुट्टी देने का भी प्रावधान है वो भी लागू होना चाहिए."
किसे होगी सबसे ज़्यादा मुश्किल
ट्रेड यूनियन ऐसे सुझावों का विरोध कर रहे हैं और उनका कहना है कि अगर ऐसा कोई भी प्रावधान लागू होता है तो यह देश में 100 साल से भी ज़्यादा समय तक लड़ी गई लड़ाई के बाद मज़दूरों को मिले अधिकारों को फिर से छीनने की कोशिश होगी.
ट्रेड यूनियन का कहना है कि फैक्ट्री एक्ट के तहत काम के लिए आठ घंटे तय किए गए हैं और अगर उससे अधिक काम लिया जाता है तो उसकी एवज में अतिरिक्त पैसा दिया जाना चाहिए साथ ही छुट्टी देने का भी प्रावधान होना चाहिए. अगर ऐसा नहीं होता तो यूनियन इसके ख़िलाफ़ उतरेंगे.
सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियंस (सीटू) के महासचिव तपन सेन कहते हैं, "रोज़ाना आठ घंटे काम का मानक अंतरराष्ट्रीय है. नारायण मूर्ति के यह सुझाव कामगारों के हितों में नहीं हैं. कॉरपोरेट हो या दैनिक मज़दूरी करने वाले लोग, ऐसा कोई सुझाव लागू होता है तो सब पर इसका बुरा असर पड़ेगा. काम के घंटे बढ़ेंगे तो कामगारों के स्वास्थ्य पर असर पड़ेगा. तकनीकी के इस दौर में काम के घंटे आठ से घटकर और कम होना चाहिए. हमारे देश में मज़दूरों की कमी नहीं है. नारायण मूर्ति ऐसे सुझाव देकर सिर्फ़ कम पैसे में ज़्यादा मुनाफ़ा कमाने की कोशिश में हैं. यह सही नहीं है."
वो कहते हैं, जिन राज्यों ने पब्लिक इमरजेंसी का हवाला देकर काम के घंटे बढ़ाकर लोगों को काम करने को मजबूर किया है वह ग़लत है.
तपन सेन कहते हैं, "हम लोग इसका विरोध करेंगे. अर्थव्यवस्था जो गिर रही है उसे उबारने के लिए अगर आप कामगारों की भागीदारी चाहते हैं तो उनके हितों को ध्यान में रखना होगा वरना सरकार को और नुकसान झेलना पड़ेगा."
'बिना सुविधा के काम नहीं'
स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग की राष्ट्रीय निरीक्षण और निगरानी समिति की सदस्य वर्षा देशपांडे के मुताबिक, "इस महामारी का अंत कहां है कोई नहीं जानता. असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले लोगों को लेकर जो भी कानून हैं उन पर वो भी पूरी तरह लागू नहीं होते. दूसरा कॉरपोरेट की तर्ज पर न तो उनके पास प्रॉविडेंट फंड (पीएफ) और ग्रैचुटी की सुविधा है और न ही मेडिकल सुविधाएं दी जातीं. न किसी तरह का बीमा दिया जाता. सिर्फ़ इंडस्ट्री को देखते हुए काम शुरू करवाना चाहते हैं तो पहले उन्हें बेसिक सुविधाएं देनी होंगी. असंगठित क्षेत्र में काम करने वालों के लिए सहूलियतें कौन देगा? पहले उन्हें जीवन बीमा जैसी सुविधाएं दी जाएं तब उनसे काम लिया जाए. ग़रीब तबके की जान जोखिम में डालकर उनसे काम करवाना सरासर ग़लत है."
वो कहती हैं कि अगर काम के दौरान किसी को कुछ हो जाता है, कोरोना की वजह से किसी की मौत हो जाती है तो क्या करेंगे, उनका परिवार क्या करेगा? इसलिए उन्हें दवा-पानी की सुविधा दी जाए तभी मज़दूरों को काम पर बुलाया जाए.
वर्षा देशपांडे का मानना है कि "दैनिक मज़दूरी करने वालों पर इसका सबसे बुरा असर होगा. दूसरे राज्यों से आने वाले कामगारों के लिए सुविधाएं दी जानी चाहिए. जिन कंपनियों ने लोगों को नौकरी से निकाल दिया उनके ख़िलाफ़ कोई एक्शन नहीं लिया गया. असंगठित क्षेत्र में काम करने वालों का कोई रजिस्ट्रेशन तक नहीं होगा. काम के घंटे बढ़ाकर उनकी मुसीबतें और बढ़ा दी जाएंगी."
वो कहते हैं कि ग़रीब के हक में कानून लागू करने के लिए जिस राजनीतिक इच्छा और सामाजिक सहभागिता की ज़रूरत है वो नज़र नहीं आती. इसलिए लोगों को काम पर जाने के लिए नहीं कहा जा सकता.
- कोरोना वायरस के क्या हैं लक्षण और कैसे कर सकते हैं बचाव
- कोरोना वायरसः किसी सतह पर कितनी देर ज़िंदा रहता है ये विषाणु
- कोरोना: महामारी से निपटने में दुनिया के सामने भारत ने पेश की मिसाल- नज़रिया
- कोरोना वायरस के संक्रमण जिन-जिन इलाजों से हो रहे ठीक
- कोरोना वायरसः भारत में इस पहली मौत पर क्यों उठ रहे सवाल?
- कोरोना वायरस: महामारी की आड़ में सत्ता और मज़बूत करने वाले ये नेता
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)