कोरोना वायरस: लॉकडाउन में मछुआरों की मदद के लिए BSF ने संभाली कमान

मछली पकड़ना

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    • Author, रॉक्सी गागडेकर
    • पदनाम, बीबीसी गुजराती

कोरोना वायरस के कारण देश में सबकुछ बंद है. लेकिन गुजरात के कच्छ में लखपत और नारायण सरोवर इलाक़े में रहने वाले मछुआरों के पास ख़ुश होने की वजह है. ये वजह उन्हें स्थानीय प्रशासन और बीएसएफ़ की 79 बटालियन ने दी है.

स्थानीय प्रशासन और सीमा सुरक्षा बल की 79 बटालियन यह सुनिश्चित कर रही है कि इन मछुआरों को कोविड 19 के संक्रमण से बचाया जाए. उनके लिए पर्याप्त स्क्रीनिंग और मास्क की व्यवस्था की जाए और साथ ही मछली पकड़ने के उनके काम में उन्हें मदद की जाए.

गुजरात का लखपत इलाक़ा भारत-पाकिस्तान सीमा से बमुश्किल 40 किमी दूर अंतिम इंसानी बस्ती है. आजीविका के लिए यहां के अधिकांश लोग मछली पकड़ने के काम पर निर्भर करते हैं.

यहां एक नाव पर छह से सात मछुआरे सवार होकर तीन से पाँच दिन के लिए समुद्र में मछली पकड़ने के लिए जाते हैं. एक बार जब वे मछली पकड़कर किनारे लौटते हैं तो उन्हें इन मछलियों के बदले स्थानीय बाज़ार में क़रीब 20 से 25 हज़ार रुपये तक मिल जाते हैं.

अखिल भारतीय फ़िशरमैन असोसिएशन ऑफ़ इंडिया के वल्जीभाई मसानी ने बीबीसी को बताया, "आमतौर पर मछुआरों द्वारा जो मछली पकड़ी जाती है वो वेरावल के थोक बाज़ार में भेज दी जाती है और बहुत उम्दा क़िस्म की मछली को निर्यात कर दिया जाता है. कुछ मछलियां स्थानीय बाज़ारों में भी बिकने के लिए जाती हैं."

हालांकि लखपत में मछुआरा समुदाय 22 मार्च से 13 अप्रैल तक मछली पकड़ने जाने में सक्षम नहीं था. जिसे देखते हुए बीएसएफ़ और स्थानीय प्रशासन उनकी मदद को आगे आया ताकि वो अपनी नावों के साथ समुद्र में लौट सकें.

लखपत लगभग 350 लोगों की आबादी वाला एक छोटा सा गांव है. गांव में बीएसएफ़ की मदद से पहले तक खाद्य सामग्री की कमी थी. पीने के पानी की भी क़िल्लत थी. एक ओर जहां 24 मार्च को पूरे देश में लॉकडाउन की घोषणा की गई वहीं भारतीय गृहमंत्रालय ने मछली पकड़ने के काम को लॉकडाउन के दायरे से बाहर रखा.

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मसानी कहते हैं, "मछली का उपभोग भारत और भारत के बाहर बड़े पैमाने पर किया जाता है. इसका एक बड़ा इस्तेमाल यह है कि लोग इसे खाते हैं और खाने की चीज़ों को ज़रूरी चीज़ों में रखा गया है. यही वजह रही कि इसे लॉकडाउन की श्रेणी से बाहर रखा गया."

हालांकि लॉकडाउन की घोषणा के बाद बीएसएफ़ और प्रशासन की सहायता के बिना मछुआरों के लिए यह संभव नहीं था कि वे दोबारा समुद्र की ओर लौट सकें.

बीएसएफ़ ने स्थानीय प्रशासन की मदद से मेडिकल स्क्रीनिंग की व्यवस्था की, टेस्ट की व्यवस्था की और इन लोगों को सुरक्षा से जुड़े उपकरण मुहैया कराए.

बीएसएफ़ गांधीनगर के डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल एमएल गर्ग ने बीबीसी को बताया, "सबसे पहली और अहम ज़रूरत थी कि हम उनके लिए मेडिकल स्क्रीनिंग की व्यवस्था करें और हमने स्थानीय प्रशासन की मदद से उसकी व्यवस्था की भी."

गर्ग बताते हैं कि लखपत सीमा से लगा गांव है. ऐसे में ये उनकी ज़िम्मेदारी के अंतर्गत आता है कि वे इस गांव के लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करें.

वो कहते हैं कि इस तरह के महामारी संकट के दौरान बटालियन राजस्थान के बाड़मेर से लेकर गुजरात के झाकू तक लोगों की हर संभव मदद करने की कोशिश कर रही है.

गर्ग के मुताबिक़, "लखपत गांव के मछुआरों के लिए हमने ग्लव्स और सैनेटाइज़र की व्यवस्था की है और सोशल डिस्टेंसिंग के महत्व को समझाने के लिए वर्कशॉप भी की. ये सबकुछ लॉकडाउन की घोषणा के बाद जब पहला जत्था मछली पकड़ने के लिए जा रहा था उससे पहले ही कर लिया गया था."

वो कहते हैं कि यह सारी प्रक्रिया और कार्रवाई तब तक जारी रहेगी जब तक की कोरोना वायरस का संकट बना हुआ है.

स्थानीय कलेक्टरेट ने स्क्रीनिंग की व्यवस्था तब की जब पहला जत्था रवाना हो रहा था और जब वे लौटकर आए उस वक़्त भी उनकी स्क्रीनिंग की गई.

बीबीसी से बात करते हुए स्थानीय तहसीलदार एएल सोलंकी बताते हैं कि लखपत के 18 मछुआरों और कोटेश्वर के 94 मछुआरे 13 अप्रैल को समुद्र में गए थे और 16 अप्रैल को वे वापस लौटे.

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सोलंकी बताते हैं कि एहतियात बरतते हुए एक नाव में अधिकतम चार लोगों के सवार होने की ही अनुमति है. इससे पहले एक नाव में 6 लोग सवार हुआ करते थे.

क़रीब 500 जोड़े ग्लव्स, 500 मास्क और सैनेटाइज़र की व्यवस्था इन लोगों के लिए की गई है.

यह इलाक़ा कच्छ के दयापार पुलिस स्टेशन के तहत आता है. बीबीसी से बात करते हुए यहां के सब-इंस्पेक्टर जेपी सोधा ने कहा कि मछुआरों के समुद्र में जाने से पहले मछुआरों को बर्फ़ की आवश्यकता होती है, डीज़ल चाहिए होता है और कुछ सूखा खाना भी. हमने ये सब कुछ उपलब्ध कराने में उनकी मदद की और ये भी सुनिश्चित किया कि ये सारा सामान उन्हें सही समय पर मिल जाए.

भारत में कोरोनावायरस के मामले

यह जानकारी नियमित रूप से अपडेट की जाती है, हालांकि मुमकिन है इनमें किसी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के नवीनतम आंकड़े तुरंत न दिखें.

राज्य या केंद्र शासित प्रदेश कुल मामले जो स्वस्थ हुए मौतें
महाराष्ट्र 1351153 1049947 35751
आंध्र प्रदेश 681161 612300 5745
तमिलनाडु 586397 530708 9383
कर्नाटक 582458 469750 8641
उत्तराखंड 390875 331270 5652
गोवा 273098 240703 5272
पश्चिम बंगाल 250580 219844 4837
ओडिशा 212609 177585 866
तेलंगाना 189283 158690 1116
बिहार 180032 166188 892
केरल 179923 121264 698
असम 173629 142297 667
हरियाणा 134623 114576 3431
राजस्थान 130971 109472 1456
हिमाचल प्रदेश 125412 108411 1331
मध्य प्रदेश 124166 100012 2242
पंजाब 111375 90345 3284
छत्तीसगढ़ 108458 74537 877
झारखंड 81417 68603 688
उत्तर प्रदेश 47502 36646 580
गुजरात 32396 27072 407
पुडुचेरी 26685 21156 515
जम्मू और कश्मीर 14457 10607 175
चंडीगढ़ 11678 9325 153
मणिपुर 10477 7982 64
लद्दाख 4152 3064 58
अंडमान निकोबार द्वीप समूह 3803 3582 53
दिल्ली 3015 2836 2
मिज़ोरम 1958 1459 0

स्रोतः स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय

11: 30 IST को अपडेट किया गया

सोधा कहते हैं कि एक बार जब वे मछली पकड़कर लौटे तो पुलिस ने भी सुनिश्चित किया कि उनकी पकड़ी हुई मछली सही समय पर बाज़ार में पहुंच जाए.

कोटेश्वर और लखपत में कुल मिलाकर 50 नावें हैं. बीबीसी से बात करते हुए लखपत के एक मछुआरे अब्दुल अली ने बताया कि वे गृहमंत्रालय की घोषणा के बाद से ही समुद्र में जाने की कोशिश कर रहे थे.

वो कहते हैं, "हम कोशिश कर रहे थे लेकिन हम अपनी नावों को नहीं ला पा रहे थे. कोरोना वायरस का डर इसका कारण था. इसके अलावा ज़रूरी सामान भी नहीं मिल रहा था कि हम नावों को लेकर समुद्र में उतरें."

हर नाव को समुद्र में उतरने से पहले क़रीब 10 हज़ार रुपये तक की लागत की ज़रूरत पड़ती है.

एक अन्य मछुआरे हसम भदाला हालांकि ख़ुश नहीं है. वो इस बात पर खेद जताते हैं कि मछुआरों को बहुत गहराई में अंदर तक जाने की अनुमति नहीं है.

भदाला कहते हैं, "फ़िशरमैन असोसिएशन ने अनुमति मांगी तो है लेकिन हम अभी सरकार की ओर से जवाब आने की राह देख रहे हैं. "

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