कोरोना: इटली से लौटे लेकिन एक महीने बाद भी अपने घर नहीं पहुंच सके

    • Author, आलोक प्रकाश पुतुल
    • पदनाम, रायपुर से बीबीसी हिंदी के लिए

कोरोना वायरस के लॉकडाउन वाले इस दौर में जिस कहावत का मतलब लोगों को सबसे अधिक समझ में आ रहा है, वह है "आसमान से टपके, खजूर पे अटके".

छत्तीसगढ़ के दुर्ग के रहने वाले वैभव पुरोहित ने पहले भी यह कहावत सुन रखी थी. लेकिन उन्हें पहली बार इस कहावत का ठीक-ठीक मतलब अब समझ में आया है.

वैभव पुरोहित इटली के जेनोआ शहर में रह कर स्नातकोत्तर की पढ़ाई कर रहे हैं. इटली के पांचवें सबसे बड़े शहर जेनोआ में जब कोरोना वायरस ने दस्तक देना शुरु किया तो वहां रहने वाले भारतीयों की वापसी शुरु हुई.

15 मार्च को दिल्ली पहुंचने के साथ ही 23 साल के वैभव को दूसरे लोगों के साथ ही दिल्ली-एनसीआर के छावला स्थित इंडियन तिब्बत बॉर्डर पुलिस के कैंप में ले जाया गया. मेडिकल चेकअप के बाद उन्हें वहीं 14 दिनों तक क्वारंटाइन में रहने की सलाह दी गई. इस दौरान उनका कोरोना टेस्ट भी किया गया, जिसकी रिपोर्ट निगेटिव आई.

29 मार्च को उनकी फिर से जांच की गई और उनकी रिपोर्ट फिर निगेटिव आई. लेकिन एहतियातन उन्हें क्वारंटाइन में ही रखा गया.

वैभव कहते हैं, "मैंने अनिवार्य रुप से 14 दिन और फिर उसके बाद 17 दिन तक क्वारंटाइन में दिन गुजारे. कुल 31 दिन गुजारने के बाद संकट था कि मैं जाउं कहां?"

असल में यह सवाल इसलिए सामने आया क्योंकि उनके उनके माता-पिता इन दिनों इंदौर में रहते हैं, जहां कोरोना वायरस का प्रकोप अपने चरम पर था. घरवालों की सलाह के बाद उन्होंने तय किया कि वे छत्तीसगढ़ के दुर्ग में रहने वाले अपने दादा और चाचा के घर चले जायेंगे.

दिल्ली के दक्षिण-पश्चिम इलाके के डीएम से ट्रांजिट पास ले कर वे एक टैक्सी में, इटली से ही साथ लौटे नागपुर के रहने वाले अपने मित्र सूरज के साथ छत्तीसगढ़ के दुर्ग के लिए 15 अप्रैल को रवाना हुए. हरियाणा, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश होते हुए वे महाराष्ट्र के नागपुर पहुंचे, जहां उन्होंने सूरज को उन के घर पर छोड़ा और खुद दुर्ग के लिए निकले.

सीमा पर अटके

वैभव कहते हैं, "लॉकडाउन के कारण रास्ते में जगह-जगह हमारी गाड़ी और काग़ज़ात की जांच होती रही. जब गुरुवार की रात नौ बजे के आसपास महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ की सीमा को बांटने वाली बागनदी को पार कर जैसे ही हमारी टैक्सी छत्तीसगढ़ की सीमा में पहुंची, उसी समय हमारी गाड़ी को रोक लिया गया."

"ट्रांजिट पास दिखाए जाने के बाद भी मुझे कहा गया कि उच्च अधिकारियों से बात करने के बाद ही आपको छत्तीसगढ़ में घुसने की इजाज़त मिलेगी. मैंने देखा कि वहां कई लोग इसी तरह अनुमति की प्रतीक्षा में हैं."

12-13 सौ किलोमीटर की थका देने वाली यात्रा के बाद वैभव और उनके ड्राइवर ने बचा-खुचा खाना खा कर पानी पीया और फिर रात मच्छरों के बीच, गाड़ी में ही गुजारी.

सुबह भी सीमा पर बनाये गये जांच चौकी पर पुलिस अधिकारियों ने कहा कि रायपुर से अनुमति मिले बिना कोई चारा नहीं है.

यह अनुमति कब मिलेगी, कोई बताने वाला नहीं था. इधर टैक्सी ड्राइवर ने साफ़ कह दिया था कि वह अब और प्रतीक्षा नहीं कर सकता, उसे अब दिल्ली लौटना ही होगा.

वैभव के साथ संकट था कि अगर वे टैक्सी छोड़ देते तो इजाज़त मिल जाने की स्थिति में भी उनके पास छत्तीसगढ़ के दुर्ग जाने के लिये कोई दूसरी सुविधा उपलब्ध नहीं थी. अंततः उन्होंने महाराष्ट्र में अपने एक रिश्तेदार के यहां लौटना तय किया.

वैभव कहते हैं, "मैं जब आधे रास्ते पहुंचा तो शुक्रवार की दोपहर मेरे पास एक अधिकारी का फ़ोन आया कि आप वापस लौट कर काग़ज़ात की औपचारिकता पूरी कर दें तो आपको अनुमति मिल सकती है."

"मैंने तय कर लिया था कि अब और परेशान नहीं होना है. इसलिये मैंने महाराष्ट्र के गोंदिया में अपने रिश्तेदार के यहां ही लॉकडाउन तक रुकना तय किया."

महाराष्ट्र के सीमावर्ती ज़िला राजनांदगांव के वरिष्ठ पत्रकार अतुल श्रीवास्तव का कहना है कि वे हाल के दिनों में छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र की सीमा से लगे हुये इलाकों में रिपोर्टिंग के लिये जा चुके हैं और वहां एकाध अवसरों पर तो चार-चार पांच-पांच सौ लोगों को छत्तीसगढ़ की सीमा में प्रवेश के लिये मशक्कत करते देखा है.

अतुल कहते हैं, "ज़िले में अभी तक कोरोना से प्रभावित एक मामला सामने आया है, जिसे ज़िले में ही इलाज के बाद छुट्टी दे दी गई. लेकिन इसके बाद से ज़िले में सख़्ती बरती जा रही है. कई-कई राज्यों से बेधड़क पहुंचने वाले लोगों को यहां सीमा पर रोक दिया गया है और थक हार कर उन्हें वापस लौटना पड़ा है. इनमें कुछ पत्रकार भी शामिल थे."

राजनांदगांव ज़िले में कोरोना संबंधी मामलों की नोडल अधिकारी सुरेशा चौबे का कहना है कि बाहर से आने वाले लोगों को स्वास्थ्य सुरक्षा के लिहाज से छत्तीसगढ़ में प्रवेश की मनाही है.

सुरेशा कहती हैं, "हमारे पास इस बात के सख़्त निर्देश हैं कि मृत्यु और स्वास्थ्य से जुड़े मामलों को छोड़ कर किसी को छत्तीसगढ़ की सीमा में प्रवेश न करने दिया जाए. लोगों के पास फ़िलहाल इंतज़ार करने के अलावा कोई चारा नहीं है. वे चाहें तो हमारे अस्थाई राहत शिविर में रुक सकते हैं. लेकिन अगर कोई यहां नहीं रहना चाहे तो उसका क्या किया जा सकता है."

600 किलोमीटर दूर पहुंचाया

सुरेशा का दावा है कि सीमा पर सरकार द्वारा सर्वसुविधा युक्त राहत शिविर बनाये गये हैं और उनमें बाहर से आने वाले लोगों को रखा जा रहा है.

सुरेशा चौबे के पास इस बात का कोई आंकड़ा नहीं है कि देश या विदेश से लौटने वाले कितने लोगों को छत्तीसगढ़ की सीमा पर प्रवेश से रोका गया और उन्हें वापस किसी दूसरे ठिकाने पर लौटना पड़ा. लेकिन उनका दावा है कि राजनांदगांव ज़िले के अलग-अलग राहत शिविरों में पिछले कई दिनों से लगभग 900 लोग रह रहे हैं.

लेकिन इसी तरह से छत्तीसगढ़ की सीमा में प्रवेश की इजाज़त के लिये दो दिन तक भटकने के बाद राजस्थान के श्रीगंगानगर लौटने वाली अमृता साहा ने कहा कि सारे ज़रुरी काग़ज़ात के बाद भी हमें छत्तीसगढ़ में प्रवेश नहीं करने दिया गया.

उन्होंने कहा, "राहत शिविर में रुक जाते तो भी कोई बताने वाला नहीं था कि आख़िर यहां से आगे, छत्तीसगढ़ में जाने की इजाज़त कब मिलेगी. इसलिये मैंने अपनी बहन के यहां वापस राजस्थान लौटना ठीक समझा."

सीमा पर बनाये गये राहत शिविरों को लेकर भी कई शिकायतें हैं. झारखंड के गढ़वा के रहने वाले एक मज़दूर रामेश्वर महतो (बदला हुआ नाम) का कहना है कि सीमा पर बनाये गये अस्थाई राहत शिविर में हमें कीड़े वाला खाना दिया जा रहा था.

रामेश्वर के अनुसार, "हम लोगों ने विरोध किया तो हमें गाड़ियों में डाल कर राजनांदगांव से लगभग 600 किलोमीटर दूर जशपुर ज़िले के एक कैंप में रख दिया गया है. इतनी ही दूर भेजना था तो इतने में तो हमें हमारे राज्य में छोड़ा जा सकता था."

हमने इस संबंध में ज़िले के कलेक्टर जयप्रकाश मौर्य से भी संपर्क करने की कोशिश की लेकिन उन्होंने हमारे फ़ोन और संदेशों का उत्तर नहीं दिया.

रायपुर में कोरोना प्रभावितों के लिये एक अस्थाई आश्रय स्थल चला रही समर्थ चैरिटेबल ट्रस्ट की मंजीत कौर बल का कहना है कि उनके शिविर में देश के अलग-अलग हिस्सों के लोग हैं. इनमें बांग्लादेश के नागरिक भी शामिल हैं.

मंजीत कौर बल कहती हैं-"राज्य की सीमा तो क्या, ज़िलों की सीमा में भी प्रवेश के नियम नहीं हैं. कई जगह लोगों को उनके ज़िलों में पहुंचने के बाद भी रोक दिया गया. यह थोड़ा असुविधाजनक हो सकता है लेकिन स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से यह ज़रुरी है."

वी द पीपल संस्था के विनयशील का कहना है कि देश में जब पहले ही घोषणा की जा चुकी है कि जो जहां हैं, वहां ही रहने की कोशिश करें, तब श्रमिक तबके की मुश्किल तो समझ में आती है लेकिन जिनके पास सुविधायें हैं, उनका यहां से वहां जाना, दूसरों को और खुद को भी मुश्किल में डालने वाला क़दम साबित हो सकता है.

विनयशील समझाने वाले अंदाज में कहते हैं, "जिनके हिस्से कुछ भी नहीं है, उनकी मुश्किलें समझी जा सकती हैं. लेकिन जो साधन संपन्न हैं, उन्हें हरसंभव यहां-वहां जाने से बचना चाहिये."

"यह एक मुश्किल समय है और इसमें सबको बहुत धैर्य व समझदारी के साथ फ़ैसले लेने होंगे. हो सकता है कि सरकार की सख़्ती असुविधा पैदा करने वाली हो लेकिन इसके अलावा रास्ता कहां है?"

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