शब-ए-बारात इस बार कैसी होगी और क्या है परेशानी

    • Author, विभुराज
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

दुनिया भर के मुसलमान इस रविवार और सोमवार की दरम्यानी रात का इंतज़ार कर रहे हैं. ये मौक़ा है शब-ए-बारात का.

पिछले साल इस वक्त देश के लोग कोरोना महामारी और लॉकडाउन की पाबंदियों के साथ जी रहे थे तो इस बार भी हालात बेहतर नहीं लग रहे हैं.

देश में एक बार फिर से कोरोना संक्रमण के बढ़ते मामलों के मद्देनज़र कई शहरों और राज्यों में होली और शब-ए-बारात सार्वजनिक तौर पर नहीं मनाने की हिदायत दी गई है.

कहीं-कहीं तो पाबंदियां भी लागू हैं. राजस्थान और दिल्ली की सरकार ने होली और शब-ए-बारात दोनों त्योहार सार्वजनिक रूप से मनाने पर रोक लगाई है.

गुजरात की सरकार ने शब-ए-बारात मनाने पर पाबंदी लगाई है तो नागपुर नगर निगम ने कहा है कि लोग न तो होली और न ही शब-ए-बारात सार्वजनिक तौर पर मना सकेंगे.

क्या है शब-ए-बारात

इस्लामी कैलंडर के आठवें महीने 'शाबान' की 15वीं रात को मुसलमान 'शब-ए-बारात' मनाते हैं.

मुसलमानों के लिए ये मुबारक मौक़ा रमज़ान के दो हफ़्ते पहले आता है. इसे माफ़ी की रात भी कहा जाता है और इसकी वजह भी है.

ये वो वक़्त होता है जब मुसलमान ख़ुदा से अपनी ग़लतियों के लिए माफ़ी मांगते हैं.

मुसलमानों का ये मानना है कि 'शब-ए-बारात' की रात किसी की क़िस्मत का फ़ैसला होता है कि आने वाला साल उसके लिए कैसा गुज़रेगा.

इस मौक़े पर रिश्तेदारों की क़ब्रों पर जाने और दान देने का भी रिवाज है.

दुनिया के कुछ हिस्सों में इस रात को मनाने के लिए मुसलमान आतिशबाज़ी भी करते हैं, हालांकि ऐसी कोई मज़हबी बंदिश नहीं है.

मुसलमानों के लिए कितना अहम

मुसलमानों के लिए शब-ए-बारात की अहमियत समझाते हुए लेखक और विद्वान हफ़ीज़ किदवई बताते हैं, "शब-ए-बारात मोहम्मद साहब की यात्रा का उत्सव है जिसे शब-ए-क़द्र भी कहते हैं. माना जाता है कि शब-ए-क़द्र शब-ए-बारात की रात को पड़ा होगा. इसलिए मुसलमान रात भर जागकर प्रार्थना करते हैं. कहा जाता है कि शब-ए-बारात की रात मोहम्मद साहब को ईश्वर ने सात तरह की दुनिया दिखाई थी. शब-ए-बारात का मौक़ा इसी का उत्सव है."

दुनिया के हर मज़हब में हरेक त्योहार का एक ख़ास धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक संदेश होता है.

शब-ए-बारात के संदेश पर हफ़ीज़ क़िदवई कहते हैं, "इसका एक संदेश तो ये है कि मुस्लिम समाज अपने पूर्वजों को याद करेगा. इसीलिए क़ब्रिस्तान जाकर उनकी याद में प्रार्थना की जाती हैं."

मुसलमानों का एक बड़ा हिस्सा इस दिन रोज़ा भी रखता है.

हफ़ीज़ किदवई कहते हैं, "मुसलमानों का एक तबक़ा शब-ए-बारात को मानता है जबकि कुछ फिरके इस पर यक़ीन नहीं रखते. ठीक इसी तरह सऊदी अरब में शब-ए-बारात नहीं मनाया जाता है जबकि तुर्की और ईरान में ये मनाया जाता है."

लॉकडाउन के समय

पिछले साल लॉकडाउन के माहौल में वक़्फ बोर्डों के अलावा कुछ मौलवियों ने भी इस सिलसिले में फ़तवा जारी किया था कि लोग क़ब्रिस्तान न जाएं.

हफ़ीज़ किदवई बताते हैं, "शब-ए-बारात के मौक़े पर लोग क़ब्रिस्तान में अपने पुरखों की क़ब्र पर मोमबत्तियां जलाते हैं. ये काम बिना क़ब्रिस्तान गए घर से भी हो सकता है."

"लोगों का क़ब्रिस्तान जाना शब-ए-बारात की सबसे दिखने वाली घटना है. लेकिन ये इस पर्व का एक तिहाई हिस्सा ही है. बाक़ी दो तिहाई काम लोग घरों पर करते हैं. लोग हलवा या कोई मीठी चीज़ बनाते हैं जो वे अपने पुरखों को अर्पित करते हैं. ये खाना लोग घरों में बनाते हैं और ख़ुद ही खाते हैं. लोग रोशनी करके अपना घर भी सजाते हैं."

शब-ए-बारात का अर्थ ही होता है बरकत की रात. इसीलिए ये रात में मनाया जाने वाला त्योहार है.

हफ़ीज़ किदवई बताते हैं, "शब-ए-बारात के ज़्यादातर रिवाज सूरज ढलने के बाद पूरे किए जाते हैं. सूरज ढलने के बाद तीन काम किए जाते हैं. क़ब्र पर मोमबत्ती जलाना, रोशनी से घर सजाना और तीसरा घर में कोई मीठी चीज़ बनाना. चूंकि अभी लॉकडाउन है इसलिए अब आपको क़ब्र पर नहीं जाना है, लेकिन अब आप अपने घर पर दीया जला सकते हैं और हलवा भी बना सकते हैं. अपने बुजुर्गों को इस तरह से याद कर सकते हैं."

पुलिस के लिए कैसी परेशानी

बीते कुछ सालों में देखा गया है कि शब-ए-बारात की रात मुस्लिम नौजवान अपनी मोटरसाइकिलों पर रात में तफ़रीह के लिए निकला करते हैं.

पिछली बार की तरह इस बार भी कुछ शहरों और राज्यों में शब-ए-बारात से जुड़ी पाबंदियां और निर्देश दिए गए हैं.

तो ऐसे में पुलिस की चिंता समझ में आती है.

उत्तर प्रदेश पुलिस के पूर्व डीजी ब्रजमोहन सारस्वत कहते हैं, "क़ब्रिस्तान में पूर्वजों की क़ब्र पर पूरा किए जाने वाले धार्मिक रीति-रिवाजों के दौरान सोशल डिस्टेंसिंग हो नहीं पाएगी."

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