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कोरोना वायरस: संकट में फंसा एयर इंडिया कैसे बना संकटमोचक
- Author, भूमिका राय
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
कोरोना वायरस के बढ़ते संक्रमण को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 21 दिन के लॉकडाउन की घोषणा की है.
लोगों से कहा गया है कि फ़िलहाल इस संक्रमण से सुरक्षित रहने का यही एकमात्र तरीक़ा है.
इस वायरस के लिए अभी तक कोई वैक्सीन नहीं बनी है इसलिए सोशल डिस्टेंसिंग का आदेश जारी किया गया है. मतलब ये कि ज़रा सी भी अनदेखी ख़तरनाक साबित हो सकती है.
बावजूद इस ख़तरे के एयर इंडिया के कर्मचारी लगातार विदेशों में फंसे भारतीयों को वापस लाने के काम में लगे हुए हैं.
एक फ़रवरी को चीन के वुहान शहर से 324 छात्रों को वापस भारत लाने से शुरू हुआ ये मिशन अब भी जारी है. विदेश में फंसे हज़ारों भारतीयों को अभी तक वापस भारत लाया जा चुका है.
23 मार्च को पीआईबी की ओर से दी गई सूचना के मुताबिक़ विदेश में फंसे दो हज़ार से अधिक भारतीयों को वापस लाया जा चुका है.
इनमें से ज़्यादातर भारतीय चीन, इटली और ईरान में फंसे हुए थे. ये तीनों ही देश इस महामारी से सबसे अधिक प्रभावित हैं.
चीन वो देश है जहां से इस वायरस के संक्रमण की शुरुआत हुई और फिर ये दुनिया भर में फैल गया.
वहीं इटली मौजूदा समय में कोरोना वायरस के संक्रमण से जूझ रहा, सबसे अधिक संकटग्रस्त देश है. जहां मौत का आंकड़ा थमने का नाम ही नहीं ले रहा. हर रोज़ यह आँकड़ा 600-700 के पार होता है. वहीं ईरान भी बेहद मुश्किल दौर से गुज़र रहा है.
कुल मिलाकर इन तीनों देशों में इस समय जाना, मतलब सीधे संक्रमण को न्योता देने के बराबर है. बावजूद इसके एयर इंडिया के कर्मचारी इस काम को कर रहे हैं.
एयर इंडिया के प्रयास की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी सराहना की है. उन्होंने एक ट्वीट किया. उन्होंने लिखा है, 'एयर इंडिया की इस टीम पर गर्व है, जिन्होंने अदम्य साहस और मानवता का परिचय दिया है. उनके इस प्रयास को पूरा देश याद रखेगा.'
इस बीच कई ऐसी भी रिपोर्टें आईं कि लोगों को सुरक्षित वापस लाने वाले एयर इंडिया के कर्मचारियों को लोगों के दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ रहा है.
सोशल मीडिया पर एविएशन इंडस्ट्री से जुड़े कई सदस्यों ने इसकी शिकायत की.
इन कर्मचारियों की शिकायत है कि एक ओर जहां ये अपनी जान जोखिम में डालकर दूसरों को सुरक्षित लाने का काम कर रहे हैं वहीं इन्हें अपने ही देश में भेदभाव और बुरे व्यवहार का सामना करना पड़ रहा है.
कुछ का आरोप था कि जिस सोसायटी में वो रहते हैं, वहां उन्हें घुसने नहीं दिया जा रहा. उनके परिवार के साथ ख़राब सुलूक किया जा रहा है.
इन सारी घटनाओं के सामने आने के बाद नागरिक उड्डयन मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने ट्वीट करके खेद जाहिर किया. उन्होंने लोगों से अपील की कि लोग ऐसा न करें.
वुहान और ईरान से लोगों को वापस लाने वाले दल के एक मेडिकल सदस्य डॉ. नितिन सेठ ने बीबीसी से कहा कि कम से कम हमारे देश में तो हमारे साथ ऐसा नहीं किया जाना चाहिए.
उन्होंने कहा, "आप ख़ुद सोचें, ऐसे वक़्त में जब लोग घर से बाहर निकलने तक से डर रहे हैं, अपनों के साथ खाने-पीने से डर रहे हैं. हम उन लोगों के लिए अपनी जान जोख़िम में डाल रहे हैं जिन्हें हम जानते तक नहीं हैं."
वो कहते हैं, "हमे पता है कि इस काम को करने का जोखिम क्या है, बावजूद इसके हम ये कर रहे हैं क्योंकि ये हमारे देश के लोगों के लिए है."
नितिन कहते हैं, "ये किसी बॉर्डर पर खड़े सैनिक की तरह युद्ध लड़ने जैसा ही है. फ़र्क ये है कि वहां जो दुश्मन खड़ा होता है कम से कम वो दिखाई तो देता है. जबकि हमारा दुश्मन तो अदृश्य है."
वो कहते हैं, "हमें पता होता है कि जिन लोगों को हम बचाकर ले जा रहे हैं वो संक्रमित हो सकते हैं और उनके संपर्क में सबसे पहले आने वाले हम ही लोग होते हैं, लेकिन ये ड्यूटी है और ज़िम्मेदारी भी. ऐसे में जब ख़राब व्यवहार का सामना करना पड़ता है तो तक़लीफ़ होती है."
विदेश में फंसे लोगों को कैसे वापस लाया जाता है?
नितिन बताते हैं कि सबसे पहले भारतीय विदेश मंत्रालय की तरफ़ से एक आधिकारिक पत्र जारी किया जाता है. जिसमें वापस लाए जाने वाले लोगों से जुड़ी सारी जानकारी होती है. इसके बाद ये पत्र सिविल एविएशन मिनिस्ट्री को भेजा जाता है.
इसके बाद सिविल एविएशन मिनिस्ट्री के डायरेक्टर जनरल के माध्यम से आदेश जारी किया जाता है.
नितिन कहते हैं कि फ़िलहाल देश के बाहर फंसे लोगों को वापस लाने का काम सिर्फ़ एयर इंडिया ही कर रही है.
डायरेक्टर जनरल की तरफ़ से जारी किए गए पत्र में निर्देश दिए जाते हैं कि कैसे और कब वापस लाने का काम करना है.
इस काम में उस दूसरे देश में मौजूद भारतीय दूतावास से भी मदद ली जाती है. जो भारत और उस दूसरे देश के बीच माध्यम का काम करता है.
वो बताते हैं कि चालक दल के सदस्यों के चुनाव को लेकर कोई विशेष प्रावधान नहीं है लेकिन अनुभव को वरीयता दी जाती है. साथ ही बहुत से सदस्य ऐसे होते हैं जो ख़ुद आगे आकर इस काम में सहयोग करना चाहते है, तो उन्हें शामिल किया जाता है.
लोगों को सुरक्षित ले आने वाली इस टीम में चालक दल के सदस्यों के अलावा एक मेडिकल टीम होती है. जो वापस लाए जाने वाले लोगों की जांच करने से लेकर स्वास्थ्य से जुड़ी हर छोटी-बड़ी बात के लिए ज़िम्मेदारी लेती है.
एयर इंडिया का कौन सा विमान लोगों को लेने के लिए जाएगा ये पैसेंजर्स की संख्या पर निर्भर करता है. जो विमान इस काम में लगाए जाते हैं उन्हें पूरी तरह से संक्रमण मुक्त और सैनिटाइज़ किया जाता है.
किस तरह की जाती है मेडिकल जांच?
नितिन बताते हैं कि जिस तरह के अभी हालात हैं उसे देखते हुए हर स्तर पर सावधानी बरती जा रही है.
जब कोई फ़्लाइट इस काम के लिए जाने वाली होती है तो उस पर जाने वाले हर सदस्य की जांच की जाती है. इसके साथ ही ग्राउंड स्टाफ़ की भी जांच होती है.
जब विमान में यात्री सवार हो रहे होते हैं तो सबसे पहले उनकी जांच की जाती है. इसके बाद एक जांच उस वक़्त होती है जब विमान भारत लैंड कर जाता है.
नितिन बताते हैं कि यूं तो विदेश से आने वाले हर पैसेंजर को क्वारंटीन किया जा रहा है लेकिन यह जांच इसलिए महत्वपूर्ण हो जाती है कि इससे ये पता चल जाता है कि कौन संक्रमित है और कौन नहीं.
नितिन के मुाबिक़, लोगों को निकालने का पहला काम वुहान से किया गया था. तब विमान में सवार होते वक़्त यात्रियों की जांच नहीं की गई थी. उनकी जांच फ़्लाइट के इंडिया लैंड करने पर की गई थी लेकिन अब यात्रियों के सवार होने से पहले भी टेस्ट किया जा रहा है.
नितिन उस मेडिकल टीम में शामिल थे जो वुहान से छात्रों को लेकर आया था.
लेकिन मुश्किलें भी कम नहीं हैं
नितिन बताते हैं कि क्रू सदस्यों और मेडिकल स्टाफ़ के लिए सुरक्षा के उपकरण तो हैं लेकिन ख़तरा फिर भी रहता है.
वो कहते हैं, "हम फ्रंट पर हैं और हमें ख़तरे का पूरा अंदाज़ा भी है, बावजूद इसके हम काम कर रहे हैं. लेकिन जिस तरह का भेदभाव सोसायटी कर रही है, वो दुखी करता है."
नितिन बताते हैं कि वो लगभग दो महीने से लगातार काम कर रहे हैं और बाहर के देशों से नहीं, बल्कि देश के भीतर एक राज्य से दूसरे राज्य से भी लोगों को निकाला जा रहा है. लेकिन मुश्किल ये है कि कई बार लोगों का सहयोग नहीं मिलता.
वो कहते हैं, "जब ईरान, चीन या इटली गए तो डर था, क्योंकि संक्रमण से सीधे मुक़ाबला था लेकिन डर को छोड़कर काम करना होता है."
नितिन के मुताबिक़, इसका अंदाज़ा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि एयर इंडिया के दो क्रू सदस्य फिलहाल राम मनोहर लोहिया अस्पताल में आइसोलेशन में हैं.
मुश्किल वक़्त से जूझ रहा है एयर इंडिया
बीते कुछ दिनों से एयर इंडिया भले ही अपने रेस्क्यू ऑपरेशन की वजह से चर्चा में हो लेकिन कुछ महीने पहले तक जब भी एयर इंडिया का ज़िक्र हुआ तो उसकी नीलामी को लेकर ही हुआ.
इस बात को लेकर भी आशंकाएं ज़ाहिर की गईं कि एयर इंडिया के कर्मचारियों का क्या होगा. बावजूद इसके एयर इंडिया कोरोना वायरस संक्रमण के इस दौर में विदेश में फंसे भारतीयों के लिए उम्मीद बनकर आगे आया है.
इसे इस तरह भी समझा जा सकता है कि जिसके ख़ुद के भविष्य पर संकट छाया हुआ है वो दूसरों की जान बचाने का काम कर रहा है.
लेकिन यह संकट काल पहला नहीं है जब एयर इंडिया सेवियर बनकर उभरा है.
एयर इंडिया ने अब तक सबसे ज़्यादा लोगों को सुरक्षित एयरलिफ़्ट कराया है.
1990 में इराक़ ने जब क़ुवैत पर हमला किया तब 59 दिनों के भीतर 10 लाख से ज़्यादा भारतीयों को एयर इंडिया के 488 विमानों से सुरक्षित भारत पहुंचाया गया था.
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