You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
कोरोना वायरस: यहां पर पत्तों को मास्क बनाकर पहन रहे हैं लोग
- Author, आलोक प्रकाश पुतुल
- पदनाम, रायपुर से बीबीसी हिंदी के लिए
कोरोना वायरस से बचने के लिये आपको किसी ने तीन परतों वाला मास्क पहनने की सलाह दी होगी तो किसी ने N95 मास्क का भी ज़िक्र किया होगा. लेकिन कोरोना वायरस के ख़तरे के बारे में जानने के बाद बस्तर के कुछ इलाकों में आदिवासियों ने साल के पत्तों का ही मास्क बनाकर उसका उपयोग करना शुरू कर दिया है.
असल में कांकेर ज़िले के अंतागढ़ के कुछ गांवों में जब एक बैठक बुलाई गई तो आदिवासी वहां पत्तों से बनाई गई मास्क पहनकर पहुंच गये.
भर्रीटोला गांव के एक नौजवान ने बताया, "कोरोना के बारे में गांव के लोगों ने सुना तो दहशत में आ गये. हमारे पास कोई और उपाय नहीं था. गांव वालों के पास तो मास्क है नहीं. इसलिये हमारे गांव के लोग अगर घरों से बाहर निकल रहे हैं तो वे सरई के पत्तों वाले मास्क का उपयोग कर रहे हैं."
गांव के पटेल मेघनाथ हिडको का कहना था कि हमें कोरोना वायरस की जानकारी मिली तो लगा कि ख़ुद ही उपाय करना पड़ेगा क्योंकि गांव से आसपास के सारे इलाक़े बहुत दूर हैं.
इसके अलावा इस माओवाद प्रभावित इलाके में आना-जाना भी बहुत आसान नहीं है.
एक चैनल के लिये काम करने वाले जीवानंद हल्दर ने इन इलाक़ों में रिपोर्टिंग के दौरान पाया कि पत्ते से बना मास्क एक गांव से दूसरे गांव तक पहुंच रहा है.
उन्होंने बीबीसी से बातचीत में कहा, "आदिवासियों को इस तरह के मास्क पहने देखना मेरे लिये नया अनुभव था. एक गांव के लोग मास्क का उपयोग कर रहे हैं तो दूसरे गांव के लोग भी उसकी देखा-देखी पत्तों का मास्क लगाने लग गये हैं. आदिवासी एक दिन इसका उपयोग करते हैं और अगले दिन नया मास्क बना लेते हैं."
हालांकि चिकित्सकों का कहना है कि इस तरह के मास्क एक हद तक तो बचाव करते हैं लेकिन इसमें सांस लेने में तकलीफ़ भी हो सकती है.
रायपुर के डॉ. अभिजीत तिवारी ने कहा, "आदिवासी समाज बरसों की अपनी परंपरा और ज्ञान से हम सबको समृद्ध करता रहा है. उनका पारंपरिक ज्ञान हमेशा चकित कर देता है. लेकिन कोरोना के मामले में बेहतर है कि वे भी देश के दूसरे नागरिकों की तरह अपने-अपने घरों में रहें. ज़रुरी हो तो सरकार को चाहिये कि वह आदिवासी इलाकों में कपड़ों से बने मास्क का मुफ़्त वितरण करे, जिसे धो कर बार-बार उपयोग किया जा सके."
राज्य के स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव ने कहा कि वो इस संबंध में ज़िले के कलेक्टर से बात करेंगे.
उन्होंने बीबीसी से कहा, "लोगों ने स्वयं ऐसा किया होगा, मुझे ऐसा नहीं लगता. किसी एनजीओ या सामाजिक संगठन ने ऐसी पहल की होगी. वैसे मुझे लगता है कि किसी ने मास्क की कमी को दर्शाने के लिये पहल की होगी."
आदिवासी परंपरा और पत्ते
बस्तर के आदिवासियों के जीवन में पत्तों का बहुत महत्व है. खाना खाने के लिये वे साल, सियाड़ी और पलाश के पत्ते की थाली, दोना का उपयोग करते हैं और शराब पीने के लिये महुआ के पत्तों का.
देवी-देवताओं के प्रसाद के लिये भी वे पत्तों का ही उपयोग करते हैं.
इन आदिवासियों में बालों के जूड़े में पत्ता खोंसना और गले में पत्तों की माला पहनने का भी चलन है.
यहां तक कि आदिवासियों की आजीविका में भी इन पत्तों की सबसे बड़ी भूमिका है.
अकेले छत्तीसगढ़ में लगभग 14 लाख आदिवासी परिवार तेंदूपत्ता या बिड़ी पत्ता का संग्रहण करते हैं, जो इन आदिवासी परिवारों के लिये आय का बड़ा स्रोत है.
- कोरोना वायरस के क्या हैं लक्षण और कैसे कर सकते हैं बचाव
- कोरोना वायरस: किन हालात में काम कर रहे हैं भारतीय डॉक्टर
- कोरोना वायरस का ख़तरा तेजी से फैल रहा है, WHO ने जताया
- कोरोना वायरस क्या गर्मी से मर जाता है?
- कोरोना ठीक होने के बाद दोबारा हो सकता है?
- कोरोना वायरस का आपकी सेक्स लाइफ़ पर क्या असर पड़ेगा?
- कोरोना वायरस: पांच बीमारियां जिनके प्रकोप ने बदल दिया इतिहास
- इटली का वो अस्पताल जो 'कोरोना अस्पताल' बन गया है
- कोरोना वायरस का संकट कब और कैसे ख़त्म होगा?
- कोरोना वायरस से कैसे जूझ रहा है पाकिस्तान
- कोरोना वायरस: मास्क पहनना चाहिए या नहीं?
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)