निर्भया: रेप पीड़िताओं के मन की बात, 'हम तरसे अब अपराधी भी तड़पे'

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    • Author, कमलेश
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

साल 2012 का निर्भया गैंगरेप मामला जिसमें करीब सात सालों की क़ानूनी लड़ाई आख़िर अपने अंत तक पहुंच गई.

20 मार्च को निर्भया गैंगरेप के दोषियों को फांसी के फंदे पर लटका दिया गया. लेकिन, क्या ये सज़ा महिलाओं के साथ होने वाले अपराधों पर रोक के लिए कुछ जवाब लेकर आई है?

ये सवाल इसलिए क्योंकि फांसी की सज़ा का फ़ैसला होने के बाद से ही इस सज़ा की सार्थकता पर बहस शुरू हो गई थी.

कई लोगों का ये मानना है कि सख़्त सज़ा से अपराधियों के मन में डर बैठेगा और महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध पर रोक लगेगी. वहीं, ऐसा मानने वाले भी लोग हैं कि फांसी का डर महिलाओं को सुरक्षित करने की बजाय ख़तरे में डाल देगा.

अपराधी पकड़े जाने के डरे से उन्हें ज़िंदा छोड़ने से बचेंगे. लोग इस चर्चा में कई तरह के तर्क और विचार सामने रखते हैं.

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आम लोगों, विशेषज्ञों और विचारकों की राय अपनी जगह मायने रखती है लेकिन वो क्या कहती हैं जिन्होंने ख़ुद इस दर्द को झेला है. जो परिवार और समाज से बेदखली, अकेलेपन और लंबी क़ानूनी प्रक्रिया का सामना कर चुकी हैं. जो इतना सब होने पर भी आज मजबूती से खड़ी हैं.

क्या फांसी की सजा उनके लिए न्याय पाने की उम्मीद की तरह है या वो कुछ और चाहती हैं?

ये जानने के लिए बीबीसी ने बलात्कार पीड़िताओं से बात की और इस महत्वपूर्ण फैसले पर उनकी राय पूछी.

कई मुश्किलों से गुज़र चुकीं ये पीड़िताएं क्या चाहती हैं, हम यहां बता रहे हैं. लेकिन, यहां उनकी पहचान उजागर नहीं की गई है. उनके नाम बदलकर दिए जा रहे हैं.

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मीनू: वो भी हमारी तरह घुट-घुट कर जिएं

मैं मानती हूं कि जो बलात्कार करता है, उसे ज़्यादा से ज़्यादा सज़ा मिलनी चाहिए. अपराधी को फांसी देकर मार देने की बजाय उम्रकैद देनी चाहिए ताकि वो भी हमारी तरह अपने परिवार और बच्चे के लिए तड़पे, उसे भी हमारी जैसी घुटन महसूस हो.

मुझे जबरन उठाकर ले जाया गया जहां मुझे एक महीने तक बंधक बनाकर रखा. मेरे पति, मां-बाप सभी ने मेरा साथ छोड़ दिया. मुझे कहा कि मैं अपनी मर्ज़ी से भागी थी. मैं अपने मां-बाप के लिए तरसी हूं और मैंने सड़कों पर धक्के खाए हैं. आज भी मैं अकेली रह रही हूं और मुक़दमा लड़ रही हूं. जब वो हमारी तरह तकलीफ़ महसूस करेगा तब जाकर हो सकता है कि कुछ बदलाव आए.

निर्भया के साथ तो बहुत गलत हुआ था. उसके अपराधियों को तो फांसी होनी ही चाहिए. उन्होंने बलात्कार किया तो किया उसके साथ हैवानियत भी दिखाई.

वहीं, ये भी ज़रूरी है कि अगर किसी महिला के साथ घटना होती है तो उसे सहयोग मिलना चाहिए. जब मेरे साथ रेप हुआ तब मुझे ना क़ानून की जानकारी थी और ना ही कोई साथ देने वाला. हमें क़ानूनी मदद ज़रूर मिलनी चाहिए.

साथ ही वो लोग भी गलत हैं जो लड़क की बजाय लड़कियों पर ही सवाल उठाते हैं. अगर कहीं बस, ट्रेन या पैदल चलते लड़कियों के साथ छेड़छाड़ होती है तो इसमें लड़कियों की क्या गलती?

लोग लड़कियों का ही आना-जाना बंद कर देते हैं. ऐसा है तो फिर बस और ट्रेन भी बंद कर देनी चाहिए. इस सोच को बदलने की ज़रूरत है.

(मीनू को काम के बहाने ले जाकर एक महीने के लिए एक कमरे में बंद कर दिया गया. उसके साथ गैंगरेप किया गया. इसके बाद उन्हें बेचने की भी कोशिश हुई. किसी तरह वहां से बचकर आईं मीनू अभी तक मुक़दमा लड़ रही हैं.)

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सीमा: हर कोई नहीं डरता

निर्भया के मामले को सात साल हो गए हैं. इतने सालों से उसकी मां ने न्याय पाने का इंतज़ार किया. ऐसे में अपराधियों को फांसी होनी ही चाहिए.

अपराध करने वाले बहुत से लोग तो सख़्त सज़ा से डर जाते हैं लेकिन कई ऐसे हैवान होते हैं जो किसी से भी नहीं डरते. फिर भी मुझे लगता है कि थोड़ा बहुत सुधार हो सकता है. ये भी ज़रूरी है कि अगर किसी लड़की के साथ ग़लत होता है और वो शिकायत दर्ज़ कराने जाती है तो उसकी जल्द से जल्द सुनवाई हो और उसका मेडिकल कराया जाए.

देर से मेडिकल कराने पर उसमें कुछ भी नहीं पता नहीं चलता और अपराधी छूट जाता है. फिर हमसे कह देते हैं कि आपने झूठी रिपोर्ट लिखवाई है.

मेरे साथ तो 20-21 साल की उम्र में रेप हुआ था वो भी एक बार नहीं बल्कि वो दो बार मुझे उठाकर ले गया था. एक मामले में उसे सज़ा हो गई है और दूसरे के लिए मैं आज भी मुक़दमा लड़ रही हूं.

मुझे अपने परिवार से पूरी मदद मिली इसलिए अभी तक लड़ाई लड़ पा रही हूं. लेकिन, हर लड़की के साथ ऐसा नहीं होता और वो टूट जाती है. पूरी दुनिया में खुद को अकेला महसूस करने लगती है. सभी को अपनी बेटियों का साथ देना चाहिए.

रेप पीड़िताओं के लिए क़ानूनी मदद और परिवार का सहयोग सबसे ज़्यादा ज़रूरी है. अगर ये मिल जाए तो उनकी तकलीफ़ बहुत हद तक कम हो जाती है.

(सीमा के मोहल्ले में रहने वाले एक शख़्स ने उनका अपहरण किया था. उन्हें कई महीनों तक पकड़कर रखा गया और रेप किया गया. इस दौरान वो गर्भवती भी हो गईं तो अपराधी के परिवार वालों ने उनका गर्भपात कराया और उन्हें छुड़ाया. उनका अपहरण और रेप करने वाले को सज़ा हो चुकी है.)

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उमा: सख़्त सज़ा से बढ़ेगा पीड़िताओं का हौसला

रेप के मामलों में फांसी नहीं होती इसलिए इसके ज़्यादा मामले सामने आते हैं. अपराधी सोचते हैं कि उनके पास पैसा है, वो पैसे भरेंगे और छूट जाएंगे. जिसके पास कोई साथ देने वाला नहीं होता, उसे ही वो लोग परेशान करते हैं.

मेरे ही मामले में आठ साल से मुक़दमा लड़ रही हूं. मेरा साथ जिसने बुरा काम किया उसे निचली अदालत में छोड़ दिया गया लेकिन मैं हारी नहीं और फिर हाईकोर्ट में गई.

रेप पीड़िताओं को सख़्त सज़ा से हौसला मिलेगा. अपराधी ग़लत काम करने से बचेगा क्योंकि उसे लगेगा कि उसे भी ऐसी सज़ा मिल सकती है.

निर्भया मामले पर हम लोगों के बीच भी कई बार बात होती है. ये अच्छी बात है कि उसे न्याय मिल रहा है. इसी तरह हर रेप पीड़िता को न्याय मिलना चाहिए.

साथ ही मैं ये भी चाहती हूं कि किसी निर्दोष को फांसी न हो इसलिए इन मामलों की जांच अच्छी तरह हो. कई बार रेप के गलत मामले भी दर्ज़ किए जाते हैं तो ऐसे में कोई निर्दोष भी फंस जाता है. मामले की पूरी तरह जांच होनी चाहिए.

(30 साल की उमा को क़ानूनी लड़ाई लड़ते-लड़ते आठ साल हो चुके हैं. उमा के पड़ोसी पर उनके साथ रेप करने का आरोप है. लेकिन, निचली अदालत में अभियुक्त को बरी कर दिया गया और अब उमा हाईकोर्ट में मुक़दमा लड़ रही हैं.)

विरोध प्रदर्शन

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सज़ा ही नहीं, और भी कदम ज़रूरी

रेप पीड़िताओं की मदद के लिए काम करने वाले आसिफ़ शेख़ कहते हैं कि फांसी की सज़ा के साथ-साथ दूसरे पक्षों पर भी काम करना ज़रूरी है.

आसिफ़ शेख राष्ट्रीय गरिमा अभियान के राष्ट्रीय संयोजक हैं. वो कहते हैं, "पिछले कुछ समय में जहां-जहां इस तरह की घटनाएं घटी हैं वहां सिस्टम में कोई बदलाव नहीं देखने को मिलता है. निर्भया फंड के आवंटन और इस्तेमाल के अंतर को ही देख लें. वन-स्टॉप सेंटर हर राज्य में नहीं हैं, कई जगह पीड़िताओं के साथ 'टू फिंगर' टेस्ट होता है. अगर ये सारी चीजें आगे भी होती रहेंगी तो फांसी की सज़ा के बावजूद भी कोई बदलाव होने वाला नहीं है."

आसिफ़ का कहना है कि लोगों को अपनी जिम्मेदारियां भी समझनी होंगी. अपने अंदर झांकना होगा. हमारे समाज में रेप पीड़िताओं को अलग-थलग कर दिया जाता है. छोटी बच्चियों को पढ़ाना बंद कर देते हैं और जल्दी-जल्दी शादी करा देते हैं. वो पीड़ित होते हुए अपराधी महसूस करती हैं. इन सवालों के जवाब सरकार या अदालत से नहीं बल्कि समाज से मिलेंगे. सज़ा का अपना महत्व है लेकिन अगर हम पूरा हल सज़ा में ढूंढेंगे तो ये समस्या कभी ख़त्म नहीं होगी.

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