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रिसॉर्ट पॉलिटिक्स का गुजरात मॉडल- कौन हैं इसके जनक- नज़रिया
- Author, डॉ. धीमंत पुरोहित
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
कोरोना की वजह से देश दुनिया के बाज़ारों में मंदी है लेकिन हॉर्स ट्रेडिंग के बाज़ार में उछाल देखने को मिल रहा है. एक तरफ गुजरात के बाज़ार में यह अपने पांव पसार रहा है वहीं पड़ोसी राज्य मध्य प्रदेश में भी देखने को मिल रहा है.
हालांकि, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ को कुछ दिनों के लिए ही सही लेकिन कोरोना की वजह से ही जीवनदान मिल गया है.
गुजरात में राज्यसभा के चुनाव को वैसे तो औपचारिक और नीरसता के साथ देखा जाता है. लेकिन पिछली बार अहमद पटेल के चुनाव के समय इसमें पूरे देश की दिलचस्पी बनी थी और इस बार भी इसमें आईपीएल जैसा रोमांच देखने को मिल रहा है. वैसे आईपीएल फिलहाल कोरोना की वजह से स्थगित है.
गुजरात में राज्यसभा की चार सीटों पर चुनाव होने हैं. विधायकों की वर्तमान संख्या के हिसाब से ये सीटें कांग्रेस और बीजेपी में बराबर बंटने की संभावना थी.
इस चुनाव में बीजेपी ने अभय भारद्वाज और रमीला बेन बारा को तो कांग्रेस ने शक्ति सिंह गोहिल और राजीव शुक्ला को मैदान में उतारा. लेकिन जब भरत सिंह सोलंकी के गुट ने बाहरी उम्मीदवार राजीव शुक्ला का विरोध किया और ज्योतिरादित्य सिंधिया की तरह ही कांग्रेस छोड़ कर बीजेपी में शामिल होने की धमकी दी तो कांग्रेस उनकी धमकी के सामने झुक गई और राजीव शुक्ला की जगह सोलंकी को ही बतौर उम्मीदवार उतार दिया.
भरत सिंह सोलंकी बीजेपी में आते आते रह गए ऐसे में बीजेपी ने रात के 12 बजे आनन फानन में सात साल पहले कांग्रेस से बीजेपी में आए नरहरि अमीन को अपने तीसरे उम्मीदवार के तौर पर मैदान में उतारने का फ़ैसला किया.
अब समीकरण यह है कि अगर बीजेपी, कांग्रेस के सात वोट तोड़ सकी तो नरहरि अमीन राज्यसभा पहुंच सकते हैं और इस आर्टिकल के लिखे जाने तक पांच कांग्रेसी विधायकों ने पार्टी से इस्तीफ़ा भी दे दिया है.
कांग्रेस ने इसे अक्षम्य अपराध बताते हुए उन पांचों विधायकों के समर्थकों को पार्टी से निष्कासित कर दिया है.
गुजरात में क्या हो रहा है?
कुछ और भी कार्यकर्ता हैं जो दीवार फांद कर बीजेपी में जाने को आतुर हैं. इन्हीं कार्यकर्ताओं के बूते बीजेपी तीन सीटों पर अपने दांव लगा रही है. पार्टी छोड़ कर जाने वाले इन विधायकों और कार्यकर्ताओं की वजह से कांग्रेस ने अपने सभी विधायकों को जयपुर के रिसॉर्ट में भेज दिया. फिर भी नरहरि अमीन लगातार कांग्रेस की गिल्लियां बिखेरने में जुटे हैं.
2017 में भी ऐसे ही रोमांच का अनुभव हुआ था, तब राज्यसभा की तीन सीटों के लिए चुनाव हुए थे. उस हाई-प्रोफ़ाइल चुनाव में बीजेपी की तरफ से अमित शाह और स्मृति इरानी जबकि कांग्रेस की ओर से अहमद पटेल उच्च सदन पहुंचे थे.
तब बीजेपी ने अहमद पटेल को हराने के लिए उनके ही पुराने साथी कांग्रेसी बलवंत सिंह राजपूत को अपने पाले में करते हुए पटेल के ख़िलाफ़ खड़ा किया था. दल बदल को रोकने के लिए तब कांग्रेस ने अपने सभी विधायकों को बेंगलुरू के रिसॉर्ट में भेज दिया था.
रिसॉर्ट पॉलिटिक्स के जनक
कांग्रेस में बडे़ पैमाने पर क्रॉस वोटिंग के बावजूद शक्ति सिंह गोहिल ने कुछ वैधानिक मापदंडों का हवाला देते हुए दो वोट रद्द करवाए थे और भारतीय आदिवासी पार्टी के छोटू वसावा के एक वोट की बदौलत अहमद पटेल की डूबती नैया बची थी.
इस पूरे खेल के सूत्रधार थे कांग्रेस के शंकर सिंह वाघेला. उनके साथ 14 कांग्रेसी विधायकों ने इस्तीफ़ा दे दिया था.
अभी एनसीपी में शामिल शंकर सिंह वाघेला देश में रिसॉर्ट पॉलिटिक्स के जनक माने जा सकते हैं.
बापू के नाम से जाने जाने वाले वाघेला संघ, जनसंघ और बीजेपी में रह चुके हैं. कैडर पर आधारित बीजेपी में सबसे पहले बगावत की बिगुल बजाने वाले नेता भी वाघेला ही थे.
1995 में केशुभाई पटेल को मुख्यमंत्री के पद से हटा कर खुद इस पद पर आसीन होने के लिए अपने गुट के विधायकों को चार्टर्ड प्लेन से अहमदाबाद से मध्य प्रदेश के खजुराहो के रिसॉर्ट में ले कर गए थे. इसके बाद उन्होंने पार्टी छोड़ी और बीजेपी की सरकार को गिरा कर खुद मुख्यमंत्री भी बने.
1995 में वाघेला के इस प्रकरण के बाद से ही यह प्रचलन में आया कि बीजेपी, कांग्रेस या अन्य दलें किसी भी राजनीतिक संकट के दौरान खुद की राज्य सरकार को बचाने या बनाने के लिए अपने विधायकों को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से किसी भी महफूज रिसॉर्ट में भेजती रही है ताकि विधायकों की ख़रीद फ़रोख्त से बचा जा सके.
कुछ इसमें सफल होते हैं तो कुछ असफल. लेकिन रास्ता तो बापू का ही अपनाते आ रहे हैं. महात्मा गांधी का नहीं बल्कि गुजरात के दूसरे बापू यानी शंकर सिंह वाघेला का.
दल बदल क़ानून का भी डर नहीं
एक ज़माने में हरियाणा के एक विधायक गया लाल एक दिन में तीन बार अपनी पार्टी बदले थे. तब से देश में पार्टी बदलने वालों को 'आया राम, गया राम' के तौर पर देखा जाता है. लेकिन इसमें भी लोगों को शर्म आनी बंद हो गई.
1985 में इस तरह की राजनीति को रोकने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी दल बदल क़ानून लेकर आए थे. इसके तहत अगर एक तिहाई से कम विधायक अगर दल बदलते हैं तो उनकी विधायकी रद्द हो जाएगी.
कुछ साल ये चला लेकिन नेताओं ने इसका भी तोड़ ढूंढ लिया. दल बदलने के लिए उन्हें इतना कुछ मिल जाया करता है कि विधायक खुशी खुशी इस्तीफ़ा देने के लिए तैयार हो जाते हैं. कायदे से ऐसा कुछ भी नहीं किया जा सकता.
अगर लोकतंत्र को दल बदल से बचाना है तो यह संसद को ही करना होगा, एक ऐसा क़ानून लाकर जिसके जरिए दल बदल को पूरी तरह से रोका जा सके.
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