मध्य प्रदेश: शह-मात का खेल अब किस करवट

    • Author, सरोज सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

मध्य प्रदेश में अस्तित्व के संकट से जूझ रही कमलनाथ सरकार को और एक दिन की मोहलत मिल गई लगती है.

राज्यपाल लालजी टंडन ने अब मुख्यमंत्री कमलनाथ को मंगलवार को बहुमत साबित करने के लिए कहा है.

इससे पहले सोमवार को कोरोना वायरस को लेकर राज्य सरकार की चिंताओं के मद्देनज़र विधानसभा 26 मार्च तक के लिए स्थगित कर दी गई.

हालांकि राज्य में विपक्षी बीजेपी ने राज्यपाल लालजी टंडन के निर्देश के मुताबिक़ फ़्लोर टेस्ट कराए जाने की मांग की थी.

विधानसभा का सत्र स्थगित किए जाने के बाद मुख्यमंत्री कमलनाथ ने कहा, "अगर बीजेपी फ़्लोर टेस्ट की मांग कर रही है और कह रही है कि हमारे पास बहुमत नहीं है तो उन्हें मेरी सरकार के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव लाना चाहिए."

सत्तारूढ़ कांग्रेस के 22 विधायकों के इस्तीफ़े के मद्देनज़र राज्यपाल लालजी टंडन ने मुख्यमंत्री को शनिवार रात को भी ये निर्देश दिया था कि वे सदन का विश्वास हासिल करें.

सियासी या संवैधानिक संकट

मध्य प्रदेश का राजनीतिक संकट अब संवैधानिक संकट में बदलता हुआ दिख रहा है क्योंकि फ़्लोर टेस्ट कराने के राज्यपाल के निर्देश की विधानसभा में तामील नहीं की गई.

ये सवाल उठने लगे हैं कि मध्य प्रदेश की राजनीति अब किस तरफ़ बढ़ रही है.

एक तरफ़ शिवराज सिंह चौहान सुप्रीम कोर्ट चले गए हैं और दूसरी तरफ़ उन्होंने राज्यपाल लालजी टंडन के पास 106 विधायकों के समर्थन का दावा लेकर गए हैं.

यानी गेंद दोनों ही संवैधानिक संस्थाओं के पाले में हैं.

राज्यपाल की भूमिका पर विधि सेंटर फ़ॉर लीगल पॉलिसी के सीनियर रेजिडेंट फेलो आलोक प्रसन्ना कहते हैं, "राज्यपाल पहले स्पीकर को संदेश भेजेंगे कि आप सदन में फ्लोर टेस्ट कराएं ताकि ये पता चल सके कि किसके पास बहुमत है."

मध्य प्रदेश की अभूतपूर्व स्थिति

विधानसभा का सत्र स्थगित करने के लिए दो वजहें बताई गई हैं. एक तो ये कि कांग्रेस के विधायकों को कर्नाटक पुलिस के नियंत्रण में रखकर उन्हें मजबूर किया जा रहा है और दूसरी वजह कोरोना वायरस का संक्रमण.

कमलनाथ सरकार में पंचायती राज और ग्रामीण विकास मंत्री कमलेश्वर पटेल ने सोमवार को सदन में हंगामे के बीच कहा, "जिस तरह से कोरोना वायरस फैल रहा है और बहुत सारे सदस्य उन इलाक़ों से आए हैं जहां बड़े पैमाने पर संक्रमण हुआ है. इसलिए ऐसा करने की ज़रूरत थी."

इस पर आलोक प्रसन्ना कहते हैं, "मध्य प्रदेश में जो रहा है, वो अपने आप में अभूतपूर्व स्थिति है. इससे पहले शक्ति परीक्षण कराने में जब भी देरी हुई थी तो यही दलील दी गई कि सरकार को और समय चाहिए था. कोई और कारण नहीं दिया गया था. मध्य प्रदेश में इस बार देरी की वजह बताई गई है इसलिए ये कहना मुश्किल है यहां जो हालात हैं, उसमें क्या होगा. मध्य प्रदेश सरकार देरी की वजह कोरोना वायरस संक्रमण बता रही है कि दो हफ़्ते के लिए विधानसभा नहीं बैठेगी."

मध्य प्रदेश की राजनीतिक स्थिति को लेकर कर्नाटक का उदाहरण भी दिया जा रहा है.

आलोक प्रसन्ना कहते हैं, "साल 2018 में भी जब कर्नाटक में येदियुरप्पा सरकार को राज्यपाल वजूभाई वाला ने समय दिया था तो उन्होंने दो हफ़्ते का वक़्त दिया था और इसकी कोई वजह नहीं बताई थी. लेकिन जब मामला कोर्ट में गया तो ये सवाल उठा कि दो हफ़्ते क्यों चाहिए, दो दिन में बहुमत साबित करें कि आपके पास बहुमत है या नहीं."

राज्यपाल की भूमिका

जब केंद्र और राज्य में अलग राजनीतिक पार्टियों की सरकारें होती हैं तो ऐसे में सभी की निगाहें राजभवन की तरफ़ होती हैं.

भोपाल के राजभवन में इस समय बीजेपी के पुराने राजनेता लालजी टंडन विराजमान हैं.

सियासी हलकों में ऐसे कयास भी लगाए जा रहे हैं कि राज्यपाल कमलनाथ सरकार को बर्खास्त करके नई सरकार को शपथ भी दिला सकते हैं.

संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप कहते हैं, "मुख्यमंत्री कमलनाथ की सरकार को बर्खास्त करने का अधिकार राज्यपाल लालजी टंडन के पास है लेकिन वे ऐसा करेंगे या नहीं, ये राजनीतिक सवाल होगा. सभी राजनीतिक पार्टियां दलगत लाभ-हानि देख रही हैं."

पर आलोक प्रसन्ना इस बात से सहमत नहीं दिखते. वे कहते हैं, "राज्यपाल मौजूदा सरकार को बर्खास्त नहीं कर सकते हैं क्योंकि इसके लिए भी पहले फ़्लोर टेस्ट कराना ज़रूरी है. एसआर बोम्मई के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ये साफ़ किया था कि राज्यपाल को ऐसा करने का हक़ नहीं है."

फ़्लोर टेस्ट की अहमियत

बोम्मई मामले में ही सुप्रीम कोर्ट ने ये साफ़ किया था कि सरकार के पास बहुमत है या नहीं, इसका फ़ैसला केवल विधानसभा के भीतर हो सकता है न कि राजभवन में.

यानी ये वो प्रक्रिया है जिसकी अहमियत को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है.

आलोक प्रसन्ना कहते हैं, "संविधान के अनुसार राज्यपाल का निर्णय फ़्लोर टेस्ट के बाद ही आना चाहिए. चिट्ठियों और विधायकों की परेड के आधार पर राज्यपाल फ़ैसला नहीं कर सकते. अगर वे ऐसा करेंगे तो सुप्रीम कोर्ट इस पर ज़रूर कार्रवाई करेगा."

सुभाष कश्यप की राय भी कुछ ऐसी ही है. उनका कहना है, "जहां तक संविधान का सवाल है, संविधान के अनुसार तो जल्द से जल्द फ़्लोर टेस्ट हो जाना चाहिए था. अगर बहुमत सरकार के साथ है तो सरकार चलती रहती और बहुमत नहीं है तो सरकार को इस्तीफ़ा देना होता."

और फ़्लोर टेस्ट कराने की ज़िम्मेदारी विधानसभा के स्पीकर पर रहती है जो सोमवार को मध्य प्रदेश में हो नहीं पाया. ऐसे में राज्यपाल के पास क्या विकल्प हैं?

आलोक प्रसन्ना कहते हैं, "विधानसभा के भीतर स्पीकर का आदेश अंतिम होता है और वहां राज्यपाल का आदेश स्पीकर पर बाध्यकारी नहीं है. राज्यपाल संदेश भेजकर स्पीकर से किसी बात के लिए आग्रह कर सकते हैं कि विधानसभा का सत्र बुलाकर फ्लोर टेस्ट कराया जाए."

स्पीकर के अधिकार

मध्य प्रदेश की ताज़ा राजनीतिक स्थिति में स्पीकर की भूमिका भी अहम मानी जा रही है.

उन्होंने कांग्रेस के 22 बाग़ी विधायकों में से छह के इस्तीफ़े तो मंज़ूर कर लिए हैं लेकिन बाक़ी 16 विधायकों के इस्तीफ़े उन्होंने स्वीकार नहीं किए हैं.

स्पीकर की दलील है कि जब तक इस बात का भरोसा न हो जाए कि विधायकों ने अपनी मर्जी से इस्तीफ़ा दिया है, वो ये त्यागपत्र नहीं स्वीकार करेंगे.

सुभाष कश्यप कहते हैं, "विधायकों के इस्तीफ़े स्वीकार करने के मामले में स्पीकर के पास कोई समय सीमा नहीं होती पर कर्नाटक के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि स्पीकर को जल्द से जल्द निर्णय लेना चाहिए था. दूसरी तरफ़ नियमों के तहत स्पीकर को इस बात का भरोसा होना चाहिए कि विधायकों ने स्वेच्छा से इस्तीफ़ा दिया है. स्पीकर ख़ुद को किस तरह से संतुष्ट करते हैं कि विधायकों का इस्तीफ़ा स्वेच्छा से दिया गया है, ये उन्हीं पर निर्भर करता है."

क्या कोर्ट या राज्यपाल स्पीकर को इस सिलसिले में कोई निर्देश भी दे सकते हैं?

सुभाष कश्यप का कहना है, "अदालत स्पीकर को फ़्लोर टेस्ट कराने का निर्देश तो दे सकती है लेकिन विधायकों के इस्तीफ़े स्वीकार करने के बारे में कोई निर्देश नहीं दे सकती क्योंकि जब तक स्पीकर ये सुनिश्चित न कर लें कि विधायकों ने अपनी मर्जी से इस्तीफे दिए हैं तो उन्हें इसके लिए बाध्य नहीं किया जा सकता."

कोर्ट क्या करेगा?

शिवराज सिंह चौहान ने इस मसले को सुप्रीम कोर्ट में उठाया है और ये माना जा रहा है कि कांग्रेस भी अपने बचाव में पूरी जोर लगाएगी.

कोर्ट की भूमिका पर आलोक प्रसन्ना कहते हैं, "ये देखना होगा कि कोर्ट राज्यपाल के निर्देश पर क्या कहता है. सुप्रीम कोर्ट भी कोरोना वायरस की वजह से सामान्य तरीके से काम नहीं कर पा रहा है. मेरे ख्याल से कोर्ट ये कहेगा कि हालात असामान्य हैं."

"जैसे कर्नाटक और महाराष्ट्र में किया था, वैसे ही मध्य प्रदेश में 48 घंटे में फ़्लोर टेस्ट कराओ लेकिन ये सब सावधानियां बरतनी होंगी. देखना होगा कि कोर्ट कौन सी सावधानियां बरतने के लिए कह सकता है? कोर्ट दो हफ़्ते का वक़्त देने नहीं जा रहा है. कोर्ट विधानसभा का सत्र बुलाने के लिए नहीं कहेगा पर ये ज़रूर कहेगा कि सब विधायकों को लेकर आएं और बहुमत साबित करके दिखाएं और वापस चले जाएं."

कोर्ट में क्या हो सकता है, इस पर रोशनी डालते हुए सुभाष कश्यप कहते हैं, "फ़्लोर टेस्ट टालने के लिए ये दलील नहीं दी जा सकती है कि विधायकों के इस्तीफ़े स्वैच्छिक हैं या नहीं, इसका फ़ैसला नहीं हो पा रहा है क्योंकि विधानसभा का सत्र बुलाने के लिए सदस्यों की उपस्थिति को लेकर कोई शर्त नहीं है."

"10 या 20 सदस्य उपस्थित नहीं हैं तो इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. बस ज़रूरी ये है कि सदन का कोरम पूरा होना चाहिए. बहुमत के लिए केवल वही सदस्य मायने रखते हैं जो सदन में मौजूद हों और वोटिंग कर रहे हों. सभी सदस्यों का हाजिर होना बिलकुल ही ज़रूरी नहीं है."

राजनीतिक पहलू

सियासी गलियारों में कमलनाथ सरकार के भविष्य को लेकर तमाम तरह की अटकलें चल रही हैं.

ये सवाल भी पूछा जा रहा है कि अगर सरकार ने बहुमत खो दिया है तो कमलनाथ इस्तीफ़ा क्यों नहीं दे रहे हैं.

सुभाष कश्यप कहते हैं, "हो सकता है कि राजनीतिक कारणों से बजाय इसके कि सदन में हारकर इस्तीफ़ा दें. राजनीतिक लाभ इसमें ज़्यादा दिखता हो कि राज्यपाल सरकार को बर्खास्त कर दें और फिर शहीद होने का नाटक किया जाए. उससे लाभ उठाने की कोशिश की जाए कि हमें राजनीतिक कारणों से बर्खास्त कर दिया गया."

मध्य प्रदेश में 25 मार्च को राज्यसभा के चुनाव होने हैं और 26 मार्च तक विधानसभा स्थगित किए जाने के फ़ैसले को इस चुनाव से जोड़कर देखा जा रहा है.

ज्योतिरादित्य सिंधिया बीजेपी की तरफ़ से राज्यसभा चुनाव में उम्मीदवार हैं और उनके इस्तीफ़ा देने वाले विधायक उनके ही समर्थक हैं.

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