कोरोना छिपाना आपको पहुंचा सकता है जेल

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- Author, गुरप्रीत सैनी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
कोरोना वायरस छिपाने के आरोप में एक व्यक्ति पर एफ़आईआर दर्ज की गई है. भारत में अपनी तरह का ये पहला मामला है.
जिस पर एफ़आईआर दर्ज की गई है उनकी बेटी अपने पति के साथ विदेश गई थीं.
पूरा मामला उत्तर प्रदेश के आगरा का है.
भारत वापस लौटने पर महिला के पति को कोरोना की जांच के लिए बेंगलुरु एयरपोर्ट पर रोका गया था. जांच में वो कोरोना से संक्रमित पाए गए.
लेकिन उनकी पत्नी बिना किसी को जानकारी दिए हवाई जहाज़ के ज़रिए चुपचाप दिल्ली आ गईं और दिल्ली से ट्रेन के ज़रिए नौ मार्च को आगरा पहुंचीं.
जब वो आगरा आ रही थीं, उसी बीच बेंगलुरु से जानकारी मिली कि ये महिला ट्रैवल कर रही हैं. तब उन्हें स्टेशन पर रोकर अलग किया गया. उन्हें वहां से आइसोलेशन रूम में भेज गया. जहां इनकी जांच हुई.
लेकिन वो वहां से भी चुपचाप अपने पिता के घर आगरा चली आईं.

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महिला के घर जाने के बाद स्वास्थ्य अधिकारियों ने उनके घर पर संपर्क किया और कहा कि महिला को ले जाकर आइसोलेशन वॉर्ड में भर्ती कराना होगा.
तब महिला के पिता ने अधिकारियों को झूठी जानकारी दी कि उनकी बेटी ताज एक्सप्रेस से दोबारा दिल्ली चली गई हैं और दिल्ली से हवाई जहाज़ से बेंगलुरु चली गईं.
पुलिस ने उनसे उनकी बेटी का नंबर मांगा, लेकिन उन्होंने नंबर देने से मना कर दिया.
पुलिस ने ख़ुद महिला का नंबर निकाला और उसे सर्विलांस पर डाल दिया. नंबर को ट्रेस किया गया तो नंबर महिला के पिता के घर आगरा में ही मिल रहा था.
उसके बाद मेडिकल टीम के साथ पुलिस, महिला के पिता के घर पहुंची और काफ़ी देर तक समझाने के बाद महिला को सख्ती से एम्बुलेंस में बैठाकर ज़रूरी स्वास्थ्य कार्रवाई के लिए भेजा गया.
आगरा के ज़िलाधिकारी प्रभु एन सिंह ने कहा, "बेंगलुरु में काम करने वाले शख्स की पत्नी का सैंपल भी कोरोना वायरस से पॉज़िटिव पाया गया है. उन्हें शुक्रवार से आइसोलेशन वॉर्ड में अलग करके रखा गया है. स्वास्थ्य विभाग ने उनका इलाज शुरू कर दिया है."

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इस बीच एडिशनल चीफ मेडिकल ऑफिसर डॉ विनय कुमार की शिकायत के आधार पर महिला के पिता के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज की गई. डॉ विनय कुमार ने शिकायत की थी कि "उन्होंने स्वास्थ्य अधिकारियों के साथ सहयोग नहीं किया और ज़िला अधिकारी से भी अपनी बेटी की जानकारी छिपाई."
आगरा के सदर बाज़ार पुलिस स्टेशन के एसएचओ कमलेश सिंह के मुताबिक़ "उनके ख़िलाफ़ आईपीसी की धारा 269 और 270 के तहत मामला दर्ज कर लिया गया है."

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क्या है धारा 269 और 270
कमलेश सिंह कहते हैं, "ये जीवन के साथ खिलवाड़ है. अगर संक्रमण से प्रभावित हर व्यक्ति ऐसा करेगा तो इससे पूरा देश बर्बाद हो सकता है. वो महिला एक प्राइवेट गाड़ी में बैठकर हवाई अड्डे तक आई. इस दौरान जितने व्यक्ति मिले होंगे, हो सकता है उनमें से कोई संक्रमित हुआ हो. फिर हवाई अड्डे पर मौजूद लोगों के संपर्क में आई होंगी, उसके बाद प्लेन में. फिर ट्रेन में लोगों को प्रभावित किया होगा. उसके बाद वो अपने घर चली आईं. इस तरह कई लोग उनके संपर्क में आए."
आईपीसी की धारा 269 तब लगती है जब कोई लापरवाही का ऐसा काम करे, जिससे जीवन को ख़तरे में डालने वाली बीमारी का इंफेक्शन फैल सकता हो. इसके तहत छह महीने तक की सज़ा हो सकती है या जुर्माना लग सकता है, या दोनों से, दंडित किया जा सकता है.
आईपीसी की धारा 270 तब लगती है जब कोई ऐसा घातक काम करे जिससे जीवन को ख़तरे में डालने वाली बीमारी का इंफेक्शन फैल सकता हो. इसके तहत दो साल की सज़ा और जुर्माना या दोनों हो सकता है.

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आगरा के ज़िलाधिकारी प्रभु एन सिंह कहते हैं, "जो भी व्यक्ति कोरोना वायरस के प्रसार को रोकने की राज्य प्रशासन की कोशिशों में बाधा डालेगा और गुमराह करने की कोशिश करेगा उन पर क़ानूनी कार्रवाई होगी. अफ़वाह फैलाने वालों को भी नहीं छोड़ा जाएगा."
फ़िलहाल महिला के अलावा उनके पिता समेत घर के आठ लोगों को अलग-थलग करके रखा गया है.
महिला के पिता ने एक अख़बार से बातचीत में कहा, "मेरा पूरा परिवार बेहद परेशान है. परिवार के आठ सदस्यों के सैंपल निगेटिव पाए जाने के बाद फ़िलहाल हमें सेल्फ-कोरेंटाइन में रहने के लिए कहा गया है. लेकिन प्रशासन ने हमें ये नहीं बताया है कि हमारी बेटी कहां है. हम बस चाहते हैं कि हमारी बेटी वापस आ जाए. मुझे पता है वो ठीक होगी."

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महिला के पिता रेलवे में काम करते हैं. आगरा के डिविजनल रेलवे मैनेजर के जन संपर्क अधिकारी एस के श्रीवास्तव ने कहा, "ज़िलाधिकारी की शिकायत के बाद रेलवे प्रशासन उनके ख़िलाफ़ विभागीय कार्रवाई पर विचार कर रहा है. फ़िलहाल उनकी बेटी, जो ख़ुद भी रेलवे में काम करती हैं, उन्हें 14 दिन की छुट्टी पर भेज दिया गया है."
रेलवे प्रशासन ने अपने छह कर्मचारियों को, "जिनमें संक्रमित महिला के पिता के पाँच पड़ोसी भी शामिल हैं, उन्हें अपने नाक, गले और ख़ून का सैंपल देने के लिए कहा है. साथ ही अगले नोटिस तक सेल्फ कोरेंटाइन रहने के लिए कहा है."
महामारी रोग क़ानून 1897
उत्तर-प्रदेश सरकार ने कोरोना वायरस फैलने से रोकने के लिए एफ़आईआर का सहारा लिया. लेकिन कर्नाटक सरकार ने 123 साल पुराने क़ानून पर दांव लगाया.
कोरोना वायरस कोविड-19 को फैलने से रोकने के लिए कर्नाटक ने एक अधिसूचना जारी कर 123 साल पुराने एक क़ानून के प्रावधानों को लागू किया है.
राज्य सरकार का दावा है कि इसके बाद अब ये सुनिश्चित किया जा सकेगा कि इस वायरस के संक्रमित व्यक्ति अस्पताल से भागे नहीं और क्वारंटाइन के सभी नियमों का पालन करें.
महामारी रोग क़ानून 1897 नाम के इस क़ानून का इस्तेमाल विभिन्न स्तर पर अधिकारियों द्वारा शिक्षण संस्थाओं को बंद करने, किसी इलाक़े में आवाजाही रोकने और मरीज़ के उसके घर या अस्पताल में क्वारंटाइन करने के लिए किया जाता है.
हाल में मेंगलुरु हवाई अड्डे पर जब कोरोना वायरस संक्रमण के लिए जाँच हो रही थी उस वक़्त दुबई से आ रहे एक यात्री को मामूली बुख़ार था.
इस यात्री को तुरंत सरकारी अस्पताल ले जाया गया ताकि आगे की विस्तृत जाँच के लिए उनके नमूने लिए जा सकें, लेकिन ये यात्री अस्पताल से भाग गए.
बाद में सुरक्षाबलों के एक दस्ते ने इन्हें देर रात खोज निकाला. ये अपने घर पर थे. इन्हें अस्पताल ले जाया गया और जाँच में इनमें कोरोना वायरस के संक्रमण की पुष्टि नहीं हुई जिसके बाद उन्हें घर पर ही क्वारंटाइन किया गया.
अब प्रदेश सरकार ने इस तरह के मामलों को रोकने के लिए एक आदेश जारी किया है.
इस आदेश में कहा गया है, "यदि कोई संदिग्ध व्यक्ति अस्पताल जाने से इनकार करता है या सभी से अलग रहने से इनकार करता है तो महामारी रोग क़ानून की धारा तीन के तहत अधिकारी व्यक्ति को जबरन अस्पताल में भर्ती करा सकते हैं. उन्हें 14 दिनों के लिए या फिर उनकी जाँच रिपोर्ट नॉर्मल आने तक दूसरों से अलग रहने के लिए बाध्य कर सकते हैं."
भारत में कोरोना वायरस से संक्रमित होने वाले लोगों की संख्या बढ़कर 114 हो चुकी है. ऐसे में इस बीमारी को फैलने से रोकने के लिए सरकार सावधानी के साथ-साथ क़ानून का सहारा ले रही है.

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