दिल्ली हिंसा की शिकार दो साल की बच्ची जिसके मां-बाप लापता हैं- ग्राउंड रिपोर्ट

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- Author, कीर्ति दुबे
- पदनाम, बीबीसी हिंदी संवाददाता, उत्तर-पूर्वी दिल्ली से लौट कर
''पिछले चार दिन से कुछ भी नहीं बोलती. भूख लगने पर कपड़ा खींचती है, कितनी बार नाम पूछते हैं, चाहते हैं कुछ तो बोले लेकिन ये कुछ नहीं बोलती.''
सऊद आलम अपनी बात बीच में रोक कर पास में खड़ी अपनी पत्नी से कहते हैं, ''अरे मस्जिद से इसके लिए कपड़े मिले तो लाना.''
सामने सीढियों पर बैठी बच्ची कुछ नहीं बोल रही है. अपनी फ़्रॉक पर लगे सितारे नोचने की कोशिश करते उसके नन्हें हाथ जब थक जाते हैं तो नन्हें क़दमों से वो ऊंची ऊंची सीढियां नापने की कोशिश करने लगती है. वो कौन है किसी को नहीं पता, उसका नाम क्या है, कहां से आई है कुछ भी नहीं पता. बस उम्र का एक अंदाज़ा है कि दो या ढाई साल की होगी.
मंगलवार, 25 फ़रवरी को जब उत्तर पूर्वी दिल्ली के शिव विहार में हिंसा भड़की तो इसके शिकार (ज़्यादातर मुस्लिम) अपना घर, सालों की कमाई सब कुछ छोड़कर भागे. इसी दौरान सऊद आलम और मोहम्मद सलाम का परिवार शिव विहार में अपने किराए का घर छोड़, जान बचाने के लिए सड़क पर निकला.

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सऊद आलाम कहते हैं, ''यहीं उन्हें तोड़-फोड़ और हिंसा से बीच मदीना मस्जिद के पास रोती हुई दो साल की बच्ची मिली. उसके आस-पास कोई नहीं था, उसके सिर में चोट लगी थी और वो रो रही थी.''
सऊद आलम अपने परिवार के साथ बाहर निकले तो अकेली बच्ची को हिंसा होती सड़कों पर रोता देख उसे अपने साथ लाए.
इस वक़्त वह अपने परिवार और रिश्तेदार के साथ बाबू नगर के एक घर में शरण लेकर रह रहे हैं. पिछले पाँच दिन से ये बच्ची उनके साथ है लेकिन उसके मां-बांप कौन हैं, कहां गए और कैसे दोबारा मिलेंगे इसका जवाब किसी को नहीं पता.

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'हमारी पहचान के काग़ज़ भी जल गए'
दिल्ली में हिंसा की आग कुछ कम हुई तो लोग अपनों की तलाश में निकल पड़े हैं. कई लोग सोमवार और मंगलवार को घरों से निकले लेकिन वो कहां हैं, ज़िंदा हैं भी या नहीं किसी को नहीं पता. लेकिन इस दो साल की बच्ची की हालत इससे भी बुरी है, वो इतनी छोटी है कि उसे अपना नाम तक नहीं पता.
बिहार के अररिया ज़िले के रहने वाले आलम 10-12 साल पहले नौकरी की तलाश में दिल्ली आए. पेशे से नाले की सफ़ाई का काम करने वाले सऊद आलम मंगलवार तक अपनी पत्नी और एक बेटे के शिव विहार में किराये के मकान में रहते थे, लेकिन आज वो बेघर हैं.
वह बताते हैं, ''मंगलवार को शाम 6 बजे हमारे इलाक़े में हंगामा शुरू हुआ. एकाएक भीड़ गलियों में आई, नारे लगाए जाने लगे. हम परिवार के साथ छत पर भागे. दंगाई लोग पास की छतों से सिलेंडरों में आग लगा कर फेंक रहे थे. हमारे छत पर भी सिलेंडर का एक जलता हिस्सा आया. मेरे बच्चे रोने लगे. डंडों के साथ आई भीड़ ने हमसे कहा, तुरंत भाग जाओ वरना जान से जाओगे.''
''तमंचा की नोक पर हमारे पॉकेट में हाथ डाल कर पैसे निकाल लिए. हम अपनी पहचान क्या बताएंगे अब हमारा तो आधार कार्ड तक हमारे पास नहीं रहा. बस जान बचाकर पैदल ही यहां आए. क्या पता ऐसे किसी परिवार की ये बच्ची छूटी हो, यही सोचकर इसे लाए.''
सऊद को पुलिस से न्याय की उम्मीद नहीं है. वो कहते हैं, ''पुलिस को 112 और 100 नंबर पर फ़ोन किया तो कहा 10 मिनट में आ रहे हैं. आज तक एक सप्ताह हो गए 10 मिनट नहीं हुआ.''
मंगलवार की रात ही सऊद आलम अपने परिवार और एक रिश्तेदार के साथ चमन पार्क पहुंचे जहां शिव विहार से आने वाले मुसलमान परिवार शरण लेकर रह रहे हैं, लेकिन वहां उन्हें जगह नहीं मिल सकी. इस वक़्त वो बाबूनगर में स्थित एक घर में रह रहे हैं.
वो बताते हैं कैसे ठंड के दिनों में उन्होंने कम क़ीमत में फ़्रिज ख़रीदी थी लेकिन अगले ही पल मायूस आखों के साथ कहते हैं, ''कुछ भी नहीं छोड़ा पूरा घर जला दिया. फ़्रिज भी जल गया होगा.''
लोगों के भीतर डर समा चुका है, कुछ ईदगाहों को और कुछ लोगों ने अपने घर के दरवाज़े इन पीड़ितों के लिए खोल दिए हैं. यहां सैंकड़ों लोग रह रहे हैं जिनका कोई पक्का डेटा नहीं है. अफ़रा-तफ़री का माहौल है. किसी बाहरी को देख महिलाओं के कुछ तय सवाल हैं उन्हें वो पूछ पड़ती हैं. मसलन- ''आप डॉक्टर हैं?'', ''मैडम कुछ खाने का बांट रही हैं क्या?''

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सवाल ये भी है कि ये दंगा पीड़ित लोग दिल्ली सरकार के राहत शिविरों में क्यों नहीं जा रहे?
कुछ लोग ईदगाह के एक कमरे में बैठे जब दहशत के दिन याद करते हैं तो रो पड़ते हैं लेकिन इस दो साल की बच्ची को नहीं पता कि उसके साथ क्या हुआ है. उसे नहीं पता कि ये अजनबी लोग कौन हैं और क्यों उससे मिलने आ रहे हैं.
यहां दूसरे हमउम्र बच्चों में उसने अपने दोस्त चुन लिए हैं, जिनके साथ कभी हंस लेती है.

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