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क्या प्रतीक हजेला को जानबूझ कर असम एनआरसी का खलनायक बनाया जा रहा है?: BBC Special
- Author, प्रियंका दुबे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, असम से लौटकर
असम के डिब्रूगढ़ ज़िले में रहने वाले पचास वर्षीय चंदन मजूमदार अकेले नागरिक हैं जिन्होंने नेशनल सिटिज़न रजिस्टर या एनआरसी में अपना और अपने परिवार का नाम नहीं आने पर एनआरसी के पूर्व असम कोऑर्डिनेटर प्रतीक हजेला के ख़िलाफ़ आपराधिक षड्यंत्र का मुक़दमा दर्ज करवाया है.
पूछने पर वह सिर्फ़ इतना कहते हैं कि उन्होंने प्रतीक हजेला के ख़िलाफ़ एफ़आइआर करके सिर्फ़ अपने 'भारतीय नागरिक होने के अधिकार' का इस्तेमाल किया है. इस तरह असम में नागरिकता की लड़ाई भी नागरिक अधिकारों का इस्तेमाल करके लड़ी जा रही है.
31 अगस्त 2019 को असम में प्रकाशित हुए एनआरसी के अंतिम ड्राफ़्ट से 19 लाख लोगों के बाहर किए जाने के बाद से अब प्रतीक हजेला के ख़िलाफ़ तीन मामले दर्ज करवाए जा चुके हैं. साथ ही गुवाहाटी में दर्ज करवायी गयी दो अन्य शिकायतों पर अभी तहक़ीकात चल रही है लेकिन इन मामलों में अभी तक एफ़आइआर दर्ज नहीं हुई है.
चंदन नागरिकता की लड़ाई को अपने 'नागरिक अधिकार' का इस्तेमाल करते हुए ही लड़ रहे हैं. हालांकि बीते एक साल में नागरिकता का दुख इस राज्य में कई करवट बदल चुका है.
सुप्रीम कोर्ट के आदेश और निगरानी में 2015 में शुरू हुई एनआरसी लिस्ट तैयार करने की इस यात्रा ने नागरिकता के मसले पर अब असम को संशय और भ्रम में डूबे एक विचित्र दोहरे पर लाकर खड़ा कर दिया है. प्रतीक हजेला के ख़िलाफ़ दायर हो रहे मुक़दमे इस नीतिगत उथल-पुथल का ही एक परिणाम है.
जुलाई 2018 में आए एनआरसी के पहले ड्राफ़्ट से बाहर किए गए 40 लाख लोगों से लेकर अगस्त 2019 की अंतिम सूची में बाहर हुए 19 लाख लोगों तक- अनेक धर्मों और जनजातीय समूहों में बंटी असम की जनता की भी नागरिकता क़ानून के साथ अपनी एक दुरूह यात्रा रही है.
एनआरसी लिस्ट तैयार करना ऐसी विशालकाय प्रक्रिया थी जिससे नागरिकता के दावे के साथ इस लिस्ट में शामिल होने का आवेदन करने वाले 3 करोड़ 29 लाख लोगों का जीवन सीधे तौर पर जुड़ा हुआ था. और अब अंतिम ड्राफ़्ट के प्रकाशन के कुछ 6 महीने बाद - यहां के हालात पहले से ज़्यादा ख़राब और जटिल हो चुके हैं.
असम में ज़िंदगी शुरू 1951 हुई थी या 1971 से?
100 प्रतिशत री-वेरिफ़िकेशन की बढ़ती माँग के साथ अब असम में एनआरसी की पूरी प्रक्रिया ही सवालों के घेरे में आ खड़ी हुई है. नागरिकता तय करने के लिए कट-ऑफ़ डेट को 1971 से 1951 बनाए जाने की नई मांग राज्य में गूंज रही है.
यदि अंतिम निर्णय में सुप्रीम कोर्ट 1951 को राज्य में नागरिकता तय करने के निर्णायक साल के तौर पर चिन्हित करती है तो मार्च 1971 को कट ऑफ़ डेट मान कर तैयार की गयी वर्तमान एनआरसी लिस्ट में अब तक हुई सालों की मेहनत और सरकारी ख़र्च 1600 करोड़ रुपए - सब बेकार हो जाएँगे.
ऐसी स्थिति में एनआरसी लिस्ट में नाम न आने के कारण घनघोर मानसिक पीड़ा, आर्थिक बोझ और भविष्य को लेकर गहरी अनिश्चिता में डूबे असम के 19 लाख लोगों के दुखों की ज़िम्मेदारी भी सरकार और अदालत पर होगी. यहां यह भी भूलना नहीं चाहिए कि एनआरसी में नाम न आने के तनाव की वजह से दर्जन भर से लोग तथाकथित तौर पर ख़ुद अपनी जान लेने को मजबूर हो गए थे.
क्या असम एनआरसी के ख़लनायक है हजेला?
सवालों के घेरे में आ रही प्रतीक हजेला की भूमिका की पड़ताल करने के लिए बीबीसी ने क़ानूनी काग़ज़ खंगालने के साथ साथ शिकायतकर्ताओं, पुलिस, क़ानूनी विशेषज्ञों से लेकर असम एनआरसी से जुड़े सभी पक्षों से बात की. जवाब में जो कुछ मिला उसने कई नए सवाल खड़े करने के साथ साथ संप्रदाय और भाषा के आधार पर बंटे एक ऐसे राज्य की तस्वीर को भी उजागर किया जहाँ लोग एक दूसरे को लेकर गहरे संशय में डूबे हैं.
क्या है उन पर आरोप :
प्रतीक हजेला पर आर्थिक भ्रष्टाचार, एनआरसी की अंतिम प्रकाशित लिस्ट से छेड़छाड़ करने, सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का उलंघन करने, साइबर अपराध करने, झूठे दस्तावेज़ तैयार करने और एनआरसी के स्टेट को-ओर्डिंनेटर होने के नाते अपनी संवैधानिक स्थिति का दुरुपयोग करने जैसे आरोप लगाते हुए असम पब्लिक वर्क्स ने अब तक कुल तीन शिकायतें दर्ज करवायीं हैं. पहली शिकायत पर एफ़आइआर दर्ज़ हो चुकी है.
राज्य के सीआइडी विभाग को सौंपी गई बाक़ी दो शिकायतों पर अभी तक एफ़आइआर दर्ज़ नहीं हुई है. गुवाहाटी सीआइडी के पुलिस उपमहानिरीक्षक मृदुलानंद शर्मा ने बताया कि असम पब्लिक वर्क्स ने राज्य सीआइडी के पास प्रतीक हजेला के ख़िलाफ़ शिकायत ज़रूर दर्ज़ करवायी हैं लेकिन अधिकार क्षेत्र न होने की वजह से सीआइडी ने वह शिकायत गुवाहाटी पुलिस को सौंप दी है. उधर गुवाहाटी पुलिस कमिश्नर एमपी गुप्ता ने बताया कि उन्हें प्रतीक हजेला के ख़िलाफ़ शिकायत प्राप्त हो गयी है और वो प्राथमिक तहक़ीक़ात के बाद एफ़आइआर दर्ज़ करेंगे.
नागरिकता संशोधन अधिनियम के पास होने के बाद से असम में एनआरसी और नागरिकता से जुड़ी पूरी बहस ने बहुपरतीय और जटिल मोड़ ले लिया है. इसका पहला उधाहरण प्रतीक हजेला के ख़िलाफ़ एक मुक़दमा दायर करवाने और दो अन्य एफ़आइआर दर्ज करवाने की अर्ज़ी असम पुलिस को देने वाले 'असम पब्लिक वर्क्स' (अपव) के संस्थापक और निदेशक अभिजीत शर्मा हैं.
सन 2009 में असम में अवैध प्रवासियों की पहचान करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में पहली याचिका दायर करने वाले अभिजीत शर्मा भी चंदन मजूमदार की ही तरह असम एनआरसी से नाखुश हैं. अंतर बस इतना है कि वह नए नागरिकता क़ानून और एनआरसी को एक अलग दृष्टि से देखते हैं.
बीबीसी से बातचीत में वह कहते हैं, "आज वो सभी नए नागरिकता क़ानून का विरोध कर रहे हैं जिन्होंने असम में एनआरसी के अंतिम ड्राफ़्ट प्रकाशित होने पर खुशी जताई थी. अगर इस एनआरसी में 70 से 80 लाख अवैध प्रवासियों को चिन्हित किया जाता तो हमें कोई दुख नहीं होता. लेकिन इस एनआरसी में घोर भ्रष्टाचार हुआ है. सिर्फ़ 19 लाख लोगों की संख्या! जबकि हमारा शोध कहत है कि असम में कम से कम 80 लाख प्रवासी अवैध तरीक़े से रह रहे हैं".
'धरती-पुत्रों' को किया गया एनआरसी लिस्ट से बाहर
प्रतीक हजेला पर लगाए आरोपों का विस्तृत ब्योरा अपने शपथपत्रों में दिखाते हुए वह जोड़ते हैं, "डेटा एंट्री ओपरेटरों के वेतन से लेकर हज़ारों की संख्या में ख़रीदे गए लैपटॉप और जेनरेटरों तक की ख़रीद में धांधली हुई है. मनचाहे तरीक़े से ऊँचे पदों और नियुक्तियां हुई हैं. फ़ॉरेन ट्रायब्यूनल द्वारा विदेशी घोषित कर दिए गए लोगों को भी एनआरसी लिस्ट में शामिल कर लिया गया है...यहां तक की आतंकवादी गतिविधियों से तथाकथित तौर पर जुड़े होने के आरोप में गिरफ़्तार हुए संदिग्धों का नाम भी एनआरसी लिस्ट में आ गया है...लेकिन असम के मूल निवासी, यहां के धरती पुत्रों को ख़ुद को नागरिक साबित करने के लिए दर दर भटकना पड़ रहा है. इसलिए हमने हजेला के ख़िलाफ़ मुक़दमे दायर कराए हैं और आगे और भी मुक़दमे करेंगे".
562/2012 मुक़दमे का नतीजा एनआरसी को सिफ़र कर सकता है :
सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच के पास लम्बित पड़े मुक़दमा क्रमांक 562/2012 - असम सम्मिलिता महासंघ बनाम भारत संघ- का ज़िक्र करते हुए अभिजीत जोड़ते हैं, "इस मुक़दमे में असम में नागरिकता की कट-ऑफ़ डेट मार्च 1971 से बदलकर पूरे भारत की तरह 1951 करने की अपील की जा रही हैं. अगर नतीजे में ऐसा हो जाता है तो एनआरसी की वर्तमान प्रक्रिया पूरी व्यर्थ साबित हो जाएगी. इसलिए अदालत से हमने इस एनआरसी के सौ प्रतिशत रीवेरिफ़िकेशन की मांग की है. और जब तक यह रीवेरिफ़िकेशन नहीं होता - तब तक आगे की सारी प्रक्रिया को रोकने की गुज़ारिश की है".
धुभरी, कोकराझार, चिरांग, गोलपारा, बोंगाईगांव, लखीमपुर, सोनितपुर, कछार, गोलघाट और करीमगंज जैसे सीमवर्ति ज़िलों में सौ प्रतिशत रीवेरिफ़िकेशन की माँग करते हुए असम पब्लिक वर्क्स ने अपनी क़ानूनी अपील में कहा है कि 'अनुमानित 80 लाख विदेशी प्रवासियों की बजाय सिर्फ़ 19 लाख को निकलकर प्रतीक हजेला ने अपने भ्रष्ट और लापरवाह रवैए का परिचय दिया है. इन्होंने सीमावर्ती ज़िलों में उन्ही लोगों को एनआरसी की ड्यूटी पर लगाया जो ख़ुद प्रवासी थे..इसलिए उन्होंने बाक़ी प्रवासियों को भी फ़र्ज़ी तरीक़े से लिस्ट में दाख़िल करवा दिया".
ग़ौरतलब है कि असम में नागरिकता विमर्श के वीपरीत ध्रुवों पर खड़े चंदन और अभिजीत दोनों को ही लगता हैं कि स्थानीय स्तर पर एनआरसी में की गयी नियुक्तियां भेदभाव की भावना से प्रभावित रही हैं.
प्रतीक हजेला का जवाब :
प्रतीक हजेला का पक्ष जानने के लिए बीबीसी से उनसे फ़ोन और लिखित संदेशों से ज़रिए पहुँचने का प्रयास किया- लेकिन उन्होंने इस मामले पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. लेकिन उनके क़रीबी विश्वस्त सूत्रों ने नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर बीबीसी को बताया कि हजेला को विश्वास है कि उनके खिलाफ लगे आरोप अदालत में खड़े नहीं हो पाएंगे. "विदेशी नागरिकों को लिस्ट में शामिल करने का सीधा सीधा दारोमदार वैसे भी प्रतीक हजेला पर नहीं आता है क्योंकि उसके लिए संबंधित फील्ड टीम से पूछताछ की जाने चाहिए. जहां तक आर्थिक अनियमिताओं का प्रश्न है, पूरी तरह से ऑडिट और पड़ताल होने पर उनकी भूमिका एकदम साफ़ निकलगी", उन्होंने कहा.
मूलतः मध्यप्रदेश के रहने वाले पचास वर्षीय हजेला आइआइटी से इलेक्ट्रोनिक्स इंजीनियरिंग की डिग्री लेने के बाद 1995 में असम-मेघालय कैडर से भारतीय प्रशासनिक सेवा में चयनित हुए थे. 16,00 करोड़ के बजट और पचास हज़ार कर्मचारियों के साथ 2015 से एनआरसी की पूरी प्रक्रिया का नेतृत्व करने वाले हजेला ने राज्य में एनआरसी की अंतिम लिस्ट प्रकाशित होने के बाद चारों ओर से हमले झेले. इस बीच अक्तूबर 2019 में सुप्रीम कोर्ट में लगायी गयी उनकी ट्रांसफ़र की गुहार स्वीकार कर ली गयी. तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने एनआरसी से जुड़े अपने आख़िरी फ़ैसले में प्रतीक हजेला की पोस्टिंग वापस भोपाल में कर दी जहाँ वह अभी जनस्वास्थ विभाग में कार्यरत हैं.
श्रम विभाग में प्रतीक हजेला के ख़िलाफ़ मामला दर्ज :
गुवाहाटी उप श्रमायुक्त इशानु शाह ने राज्य के श्रम विभाग के पास प्रतीक हजेला के ख़िलाफ़ आयी शिकायत की पुष्टि करते हुए बीबीसी को बताया कि राज्य के तक़रीबन बीस ज़िलों में फैले एनआरसी के 786 कर्मचारियों ने वेतन का भुगतान न किए जाने का मामला दर्ज करवाया है. "यह सब एनआरसी में कार्यरत डेटा एंट्री ओपरेटर हैं जिनका कहना है कि उन्हें 10500 रुपए प्रति माह के मानदेय पर नियुक्त किया गया था लेकिन मात्र 6050 रुपए प्रति माह का भुगतान ही किया गया. हम फ़िलहाल मामले की जांच कर रहे हैं".
भाजपा भी कर रही है रीवेरिफ़िकेशन की मांग का समर्थन :
भाजपा की असम इकाई के उपाध्यक्ष विजय कुमार गुप्ता असम पब्लिक वर्क्स को अर्थिक और राजनीतिक रूप से समर्थन देने के सभी क़यासों को नकारते हुए कहते हैं, "हमारा असम पब्लिक वर्क्स के साथ कोई संबंध नहीं है और न ही हमारी सरकार या पार्टी ने उन्हें किसी भी तरह से समर्थन दिया है. लेकिन जहां तक प्रतीक हजेला का सवाल है, हमने 2018 में पहला ड्राफ़्ट आने के बाद से ही हमने इस पूरी प्रक्रिया में मौजूद झोल को उनके सामने रखना शुरू कर दिया था. हमने उन्हें कई मेमोरंडम भी दिए...मैं ख़ुद उनसे मिलने गया कितनी बार लेकिन हर बार वो बहुत ज़्यादा चुपचाप तरीक़े से मिले."
"उन्हें लगता था कि अगर किसी से एनआरसी के सम्बंध में कोई भी बात की जाएगी तो उनका प्रोजेक्ट लीक हो सकता है..लेकिन हमारा सवाल यह है कि एनआरसी से जुड़ी सारी जानकारी जनता के सामने देखने पढ़ने के लिए क्यों नहीं होनी चाहिए? प्रतीक हजेला ने एनआरसी की पूरी प्रक्रिया पर अपना एकधिकार बना के रखा था....यहां तक कि राज्य के मुख्यमंत्री ने उन्हें दो बार मिलने के लिए बुलाया लेकिन वो 'प्रोटोकोल' का वास्ता देते हुए उनसे भी मिलने नहीं गए. वो रहस्यमयी ढंग से काम करते थे. सील बंद लिफ़ाफ़ों में सुप्रीम कोर्ट कौन से काग़ज़ जाते थे, हमें क्या पता?"
एनआरसी और प्रतीक हजेला पर दर्ज हुए मुक़दमों की संवैधानिक वैद्यता :
पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के साथ लम्बे वक़्त तक काम कर चुके गुवाहाटी हाई कोर्ट के एक वरिष्ठ अधिवक्ता ने नाम न प्रकाशित की शर्त पर बताया कि प्रतीक हजेला और गोगोई का पेशेवर परिचय 2000 के दशक तक जाता है. "2000 के आख़िर में रंजन गोगोई गुवाहाटी हाई कोर्ट में प्रशासनिक जज थे- यह हाई कोर्ट के मुख्य न्यायधीश के बाद दूसरे स्थान का पद होता है. तब हजेला गुवाहाटी में डेप्युटी कमिश्नर के तौर पर नियुक्त थे. प्रशासनिक जज होने की वजह से गोगोई को हजेला से पेशेवर संबंध रखने पड़ते थे. उनका परिचय इतना पुराना है. फिर एनआरसी की पूरी प्रक्रिया के दौरान सुप्रीम कोर्ट में गोगोई इसकी निगरानी का नेतृत्व करते रहे और यहां से हजेला उन्हें रिपोर्ट करते रहे. यहां तक कि अपना कार्यकाल ख़त्म होने के ठीक पहले एनआरसी पर अपना आख़िरी ऑर्डर पास करते हुए गोगोई ने हजेला का स्थानांतरण भोपाल कर यहां सबको चौंका दिया".
हालांकि प्रतीक हजेला पर मौजूद काम के बोझ को अभूतपूर्व बताते हुए वह जोड़ते भी हैं, "यह सच है कि प्रतीक हजेला पर आर्थिक भ्रष्टाचार और विवादित तरह से एनआरसी की प्रक्रिया पूरी करवाने के कई आरोप लग रहे हैं. लेकिन यह सिर्फ़ आरोप हैं जिन्हें अदालत में साबित होना अभी बाक़ी है. लेकिन इसके लिए एक एफ़आइआर ही काफ़ी है. इस तरह आधा दर्जन मुक़दमे करके एक आदमी के पीछे ही पड़ जाना कहाँ तक उचित है? और फिर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इस प्रक्रिया में तीन करोड़ से ज़्यादा लोगों की नागरिकता का फ़ैसला होना था! हजेला के कंधों पर विशालकाय और एक अभूतपूर्व ज़िम्मेदारी थी".
एनआरसी की प्रक्रिया की संवैधानिक वैद्यता पर सवाल उठाते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता जोड़ते हैं, "अदालत का काम न्याय करना है, प्रशासनिक अभिशासन करना नहीं. लेकिन सर्वोच्चतम न्यायलय द्वारा एनआरसी की प्रक्रिया को ख़ुद अपनी निगरानी में पूरा करवाना संविधान के आर्टिकल 14 और 21 का उल्लंघन करता है. क्योंकि अगर सुप्रीम कोर्ट पहले ही किसी काग़ज को नागरिकता साबित करने के लिए अनिवार्य बता देगी- तो ऐसी स्थिति में अगर किसी नागरिक को उस काग़ज के ख़िलाफ़ शिकायत करनी है या उसकी वैद्यता को चुनौती देनी है तो वह कहां जाकर देगा? एक तरह से ख़ुद पूरी प्रक्रिया की निगरानी अपने हाथ में लेकर सुप्रीम कोर्ट ने लोगों से शिकायत और अपील करने का अधिकार छीना है. इस तरह से एनआरसी की पूरी प्रक्रिया की संवैधानिक वैधता पर भी सवाल खड़े होते हैं".
असमिया मुस्लिम जनजातियों ने भी खोला हजेला के खिलाफ मोर्चा:
गुवाहाटी शहर के बीचों-बीच मौजूद एक चाय की दुकान पर हमारी मुलाक़ात होती है 'आल असम गोरिया मोरिया युवा छात्र परिषद' के छात्र नेता मोईनुल हक़ से. असम के कुल 1.3 करोड़ मुस्लिम जनसंख्या में से तक़रीबन 40 लाख मुसलमान यहां की मूल जनजातियों से आते हैं. गोरिया, मोरिया, देसी, जोलहा नामक चार प्रमुख मुस्लिम जनजातियों से आने वाले मुसलमानों ने राज्य में अपने अधिकारों की लड़ाई को लेकर एक नया मोर्चा खोला है.
इसी लड़ाई के तहत सितम्बर 2019 में संगठन ने गुवाहाटी के लतासिल पुलिस थाने में प्रतीक हजेला के ख़िलाफ़ एक एफ़आइआर भी दर्ज करवाई. मुक़दमे के बारे में बताते हुए मोईनुल कहते हैं, "प्रतीक हजेला ने असम के मूल निवासियों के साथ विश्वासघात किया है. अवैध प्रवासियों को एनआरसी लिस्ट में भर दिया गया और जनजातियों से आने वाले कितने ही मूल निवासियों को लिस्ट से बाहर कर दिया गया है. एक ही तरह के काग़जों के बाद भी एक ही परिवार के आधे लोगों का नाम आया है जबकि आधे बाहर कर दिए गए हैं. इसलिए हमने प्रतीक हजेला के ख़िलाफ़ आपराधिक षडयंत्र और असम के लोगों को धोखा देने का मुक़दमा दर्ज किया है".
असम के बाक़ी मुसलमानों से ख़ुद को दूर बताते हुए मोईनुल कहते हैं, "हमें हमेशा बांग्लादेशी मुसलमानों के साथ मिला कर देखा जाता है जबकि हम उनमें से नहीं हैं. हम असम की मिट्टी के लोग हैं. सिर्फ़ इसलिए कि वह मुसलमान है, बांग्लादेशी मुसलमान हमारा भाई नहीं हो जाएगा...हमारे भाई असम के मूल निवासी हैं. हम पहले असमिया हैं बाद में भारतीय".
असम की पूरी यात्रा के दौरान 'धरती पुत्रों' का इतना ब्योरा दर्ज करने के बाद एक सवाल यह भी खड़ा हुआ कि पुत्रियों का क्या होगा? क्या वह धरती से नहीं जन्मीं?
एनआरसी दफ़्तर का सुन्न पड़ा हाल और अधर में लटका 19 लाख लोगों का भविष्य :
एनआरसी की अंतिम सूची प्रकाशित किए जाने के वक़्त घोषणा की गयी थी कि जिन लोगों का नाम अंतिम सूची में शामिल नहीं होगा उनको नब्बे दिनों के भीतर नाम न आने का कारण बताते हुए नोटिस भेजा जाएगा. इसके बाद संबंधित व्यक्ति नागरिकता के दावे के साथ फ़ॉरेन ट्रायब्यूनल का दरवाज़ा खटखटा सकता है.
लेकिन गुवाहाटी से लेकर डिब्रूगढ़ तक, बीबीसी से जितने भी प्रभावित लोगों से बात की, उन्हें एनआरसी लिस्ट के प्रकाशन के छह महीने बाद भी कोई नोटिस नहीं मिला था. गुवाहाटी स्थित एनआरसी के दफ़्तर में माहौल ठंडा था. एनआरसी के नए स्टेट को-ओर्डिनेटर हितेश देव शर्मा ने कई प्रयासों के बाद भी बीबीसी से बातचीत करने से इंकार कर दिया.
वहीं डिब्रूगढ़ में रहने वाले मोहम्मद वसिउल्ला बीते 6 महीने से एनआरसी के नोटिस का इंतजार करते करते और एक अनिश्चित अंधेरे भविष्य से जूझते हुए तंग आ चुके हैं. बीबीसी से बातचीत में वह कहते हैं, "हमारे साथ अजीब त्रासदी हुई है. सभी मर्दों और बच्चों का नाम एनआरसी में आ गया है जबकि मेरी माँ, मेरी पत्नी और दोनों भाभियों का नाम लिस्ट से ग़ायब है. जो भी ए लिस्ट के काग़ज थे सब जमा किए. इतनी बार एनएसके में सुनवाई हुई...लेकिन अंत में, वही ढाक के तीन पात. घर की किसी महिला का नाम लिस्ट में नहीं आया".
डिब्रूगढ़ में पले बढ़े वसिउल्ला बीत दस सालों से शहर में अकाउंटेसी पढ़ाते हैं. 82 साल की अपनी माँ के बारे में बात करते हुए, रुँधे गले से कहते हैं, "मैं बीते 6 महीनों से इतने तनाव में हूँ. न पढ़ा पाता हूँ, न और कोई काम हो पाता है. सारा दिन नोटिस की राह देखता रहता हूँ -लिस्ट आएगी तो बात आगे बढ़ेगी...ट्रायब्यूनल जाएँगे, अदालत जाएँगे...जो बस में होगा सब करेंगे. लेकिन नोटिस ही नहीं आया अभी तक. अभी तो दिन रात मुझे एक ही बुरा ख़्वाब सताता है कि मेरी बूढ़ी माँ को सारी ज़िंदगी हिंदुस्तान में रहने के बाद भी अपनी ज़मीन के मालिकाना काग़ज़ होने के बाद भी इस उम्र में डिटेंशन सेंटर भेजा जा रहा है. जब कहा था कि नोटिस भेजेंगे तो अब भेजते क्यों नहीं? आख़िर हमें कब पता चलेगा की हमारा क्या होने वाला है?".
प्रतीक हजेला का योगदान :
एनआरसी से जुड़े चौतरफ़ा आरोपों और 19 लाख लोगों के अधर में लटके भविष्य के बोझ तले दबे प्रतीक हजेला के योगदान पर असम के अग्रिणी बुद्धिजीवी हीरेन गोहाईन कहते हैं, "एनआरसी होना है यह सबको पता था, लेकिन कैसे होना है, यह कोई नहीं जानता था. एनआरसी की इस जटिल प्रक्रिया को पूरा करने के लिए इंटेरफ़ेस- एक तकनीकी सिस्टम को विकसित करने का श्रेय प्रतीक हजेला को जाता है."
"जब सुप्रीम कोर्ट इस सिस्टम से संतुष्ट हुआ तब जाकर 2015 से एनआरसी की प्रक्रिया शुरू हुई. यह प्रक्रिया सरकारी, जटिल और नौकरशाही में डूबी हुई थी इसलिए इसमें कमियाँ भी थीं. लेकिन कुल मिलाकर जब एनआरसी की अंतिम सूची प्रकाशित हुई तब असामी प्रेस से लेकर सिविल सोसाइटी तक ने इसको स्वीकर किया था. सिर्फ़ कुछ हिंदुवादी संगठनों और चंद असमिया अति राष्ट्र्वादियों को छोड़ कर लगभग सभी ने एनआरसी की अंतिम सूची का स्वागत किया था".
प्रतीक हजेला पर लग रहे आरोपों को एनआरसी की छवि धूमिल करने का प्रयास बताते हुए हीरेन जोड़ते हैं, "हजेला पर अभी आरोप लगे हैं जिन्हें अदालत में साबित किया जाना बाक़ी है. जहाँ तक उनका इस प्रक्रिया का अकेले नेतृत्व करने का प्रश्न है, तो अगर उनकी जगह पांच लोगों की कोई कमेटी होती तब हमें समस्या यह होती की कोई भी एक आदमी ज़िम्मेदारी लेने को तैयार नहीं होता. सीधी बात है- हजेला की विश्वसनीयता पर सवाल उठाने का मतलब है एनआरसी की विश्वसनीयता पर प्रश्न चिन्ह लगना".
असम के नागरिकता से जुड़े दुख अब एक दूसरे के जुड़वां कार्बन कॉपी से बन गए हैं. कौन से दुख का बीज उसके किस जुड़वां में क़ैद है, निश्चित तौर पर कहा नहीं जा सकता.
असम की गलियों, गांव और शहरों में आज बंगाली भाषी लोगों से लेकर असमिया राष्ट्र्वादियों तक सभी ब्रह्मपुत्र नदी और उस पर अपनी कालजयी कविता लिखने वाले भूपेन हज़ारिका को 'अपना आसमिया प्रतीक' बताते हैं. लेकिन नागरिकता की इस तीखी लड़ाई और इंतज़ार के निराश अंधेरों के बीच बहती दुखों की नदी ब्रह्मपुत्र भी, हज़ारिका की आवाज़ में शयाद आज यही पूछती है - आख़िर उसके नागरिक कौन हैं?
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