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उत्तर-पूर्वी दिल्ली का वो इलाका, जहां हिंदू परिवारों को निशाना बनाया गया - ग्राउंड रिपोर्ट
- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, नई दिल्ली
मुस्तफ़ाबाद को बृजपुरी से जोड़ती है नाले पर बनी एक पुलिया. इस पुलिया के एक तरफ़ मुसलमान बहुल इलाका है तो दूसरी तरफ हिन्दुओं की कम आबादी वाला बृजपुरी.
मगर इतने सालों से ये पुलिया कभी यहां रहने वाले लोगों के बीच अड़चन नहीं बन पाई. बृजपुरी में हिन्दुओं की बस्तियों में कुछ मुसलामानों के मकान भी हैं.
सालों से एक दूसरे के साथ कारोबार और लेन-देन इनकी ज़िंदगी का अहम हिस्सा रहा है. यहां रहने वालों का कहना है कि सदियों से पुलिया के आर-पार रहने वालों के बीच आपसी रिश्ते मधुर रहे हैं और सुख और दुःख में साथ रहना और आपस में खुशियां बांटना यहां सालों से होता रहा है.
मगर इस साल की फ़रवरी 24 की तारीख़ ने पूरे इलाक़े का चेहरा ही बदल दिया है. लोगों के आपसी संबंधों के बीच अब ये पुलिया आ गई है.
हिंसा का केंद्र रहे भजनपुरा से आप जैसे ही मुस्तफ़ाबाद के लिए मुड़ते हैं आपको बृजपुरी से होकर गुज़रना पड़ता है.
ये मूलतः हिन्दुओं की बस्ती है जहां एक स्कूल और राशन से लेकर कपड़े और हार्डवेयर तक की कई दुकानें हैं.
सड़क पर अब भी पत्थरों के टुकड़े और घरों और दुकानों का टूटा-फूटा सामान बिखरा पड़ा है. ये सब उस दिन की गवाही दे रहे हैं जिस दिन इस इलाक़े को दंगाइयों के एक बड़े हुजूम ने घंटों तक बंधक बनाये रखा.
बाज़ार के पास की गली नंबर 8 में 22 साल के राहुल सिंह का मकान है. उनके पिता उमेश सिंह रेलवे सुरक्षा बल यानी (आरपीएफ़) में अधिकारी हैं और पंजाब में काम करते हैं. उमेश सिंह के दो बेटों में छोटे बेटे राहुल हैं.
उनके घर पर फिलहाल सन्नाटा है. परिवार का कोई सदस्य घर पर नहीं है.
पड़ोसी बताते हैं कि 24 तारीख़ को लगभग शाम चार बजे हिंसा शुरू हुई थी. राहुल उत्सुकतावश घर से बाहर ये देखने निकले थे कि बाहर शोर क्यों हो रहा है.
पड़ोस की एक महिला बताती हैं, "वो इस गली से निकला और उस गली से उसकी लाश वापस आई. उसे गोली लगी हुई थी."
राहुल की मौत के बाद से पूरे मोहल्ले में मातम और उदासी छाई हुई है. पड़ोसियों का कहना है कि राहुल की मां उसी दिन से सदमे में हैं और कोमा में चली गई हैं. उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया है और इसी कारण घर का कोई सदस्य यहां मौजूद नहीं है.
पड़ोसियों में आक्रोश भी है कि हिंसा को पांच दिन हो गए हैं मगर अभी तक अस्पताल में राहुल के शव का न तो 'पोस्टमॉर्टम' हुआ और न ही उनका शव परिजनों को सौंपा गया है.
अगली ही गली में अजय का घर है. उन्हें भी हिंसा में काफ़ी चोटें आई हैं. लेकिन इलाज के बाद अब वो घर लौट आये हैं.
अजय हिंसा की घटना के चश्मदीद भी हैं. उनका कहना है कि अगर वो बाहर निकलकर घरों को नहीं बचाते तो सब के सब घर जल जाते क्योंकि दंगाइयों का हुजूम बहुत बड़ा था.
वो बताते हैं कि उन पर पत्थरों से हमला किया गया और लोगों न उन्हें पीटा भी.
बृजपुरी के ही रहने वाले रवि राठौड़ को भी चोटें आई हैं. वो कहते हैं कि उनकी क़िस्मत अच्छी थी कि वो बच गए वरना जिस तरह दंगाइयों ने उन पर हमला किया था, उनके सही सलामत रहने की उम्मीद कम ही थी.
रवि बताते हैं कि बृजपुरी के कई घायलों का इलाज वहीं नज़दीक रहने वाले डाक्टर चौधरी ने किया जिनका ख़ुद का घर हूजूम ने जलाकर राख़ कर दिया था.
हिंसा के बाद अब बृजपुरी में सबसे ज़्यादा अगर कोई डरा हुआ है तो वो हैं यहां की महिलाएं. यहां रहने वाली राधा बताती हैं कि लगभग दो ढाई घंटों तक दंगाइयों ने इलाक़े पर क़ब्ज़ा कर रखा था जबकि पुलिस भी वहीं मौजूद थी.
यहां की 10 नंबर गली में सुनीता रहती हैं. वो कहती हैं, "उस दिन अगर आप यहां होते तो देख नहीं पाते कितना बुरा हाल था. हमारे पास अपनी सुरक्षा के लिए कुछ भी नहीं है. घर में एक छुरी है जिससे सब्ज़ियां भी ठीक से नहीं कट पाती हैं."
राजीव अरोड़ा जिनकी राशन की दुकान को तोड़ा और लूटा गया है वो भी सदमे में हैं.
वो कहते हैं कि उनका मन इतना उदास है कि वो अब इस इलाक़े से बाहर कहीं और जाकर बसना चाहते हैं.
अरोड़ा कहते हैं कि उन्हें नहीं लगता कि वो अब फिर अपनी दुकान की मरम्मत करवा पाएंगे और यहां फिर अपना व्यवसाय शुरू कर पाएंगे.
अरोड़ा कहते हैं कि एक ही दिन ने यहां सब कुछ बदल दिया.
वो कहते हैं अब बृजपुरी और मुस्तफ़ाबाद की ये पुलिया ही इन दोनों जगहों के बीच दरार के रूप में खड़ी है.
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