You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
जवाहरलाल नेहरू का एडविना माउंटबेटन से कैसा रिश्ता था?
- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत आने के बाद लॉर्ड माउंटबेटन ने जब गवर्नमेंट हाउज़ में पहली गार्डेन पार्टी दी तो लोग ये देख कर दंग रह गए कि जवाहरलाल नेहरू एडविना के कदमों पर ज़मीन पर बैठ कर डांस शो का आनंद उठा रहे हैं.
हालांकि कुर्सियों की कमी पड़ जाने की वजह से भारत के भावी प्रधानमंत्री ने ऐसा किया था, लेकिन लोगों की नज़र से ये छिप नहीं सका कि आखिर नेहरू एडविना के ही पैरों के पास क्यों बैठे.
पार्टी के तुरंत बाद एडविना अपनी बेटी पामेला के साथ नेहरू के घर गईं थीं. दिलचस्प बात ये थी कि इस बार लॉर्ड माउंटबेटन उनके साथ नहीं थे.
वैसे तो लॉर्ड वेवेल के ज़माने से ही नेहरू गवर्नमेंट हाउज़ के स्वीमिंग पूल में तैरने जाया करते थे, लेकिन तब कोई इस बारे में बात नहीं करता था.
लेकिन जब एडविना माउंटबेटन भी इस स्वीमिंग पूल में नेहरू के साथ तैरती हुई देखी जाने लगीं तो लोगों ने इन दोनों के संबंधों के बारे में बातें करनी शुरू कर दी.
सलमान रुश्दी के चचा शाहिद हमीद ने 31 मार्च, 1947 को अपनी डायरी में लिखा था, "माउंटबेटन दंपत्ति के भारत पहुंचने के 10 दिनों के भीतर ही एडविना और नेहरू की नज़दीकियों पर भौंहें उठना शुरू हो गई हैं."
रेडक्रॉस के एक समारोह में खींची गई तस्वीरों में ये साफ़ क़ैद हुआ कि किस तरह एडवीना नेहरू को प्यार से निहार रही हैं.
कद्दावर कांग्रेस नेता अबुल कलाम आज़ाद की आँखों से भी ये बात छिप नहीं सकी और उन्होंने अपनी किताब 'इंडिया विन्स फ़्रीडम' में लिखा, "नेहरू माउंटबेटन से तो मुतासिर हैं ही, लेकिन उससे कहीं ज़्यादा वो लेडी माउंटबेटन से मुतासिर हैं."
पामेला हिक्स भी मुरीद हुई नेहरू की
नेहरू की आकर्षक शख़्सियत का असर न सिर्फ़ माउंटबेटन दंपत्ति पर पड़ा, बल्कि उनकी 17 साल की बेटी पामेला हिक्स भी उनसे बहुत प्रभावित हुई थीं.
अपनी किताब 'डॉटर ऑफ़ एम्पायर' में पामेला लिखती हैं, "जब नेहरू ने पहली बार मुझसे हाथ मिलाया था मैं तभी से उनकी आवाज़, कपड़े पहनने के तरीके, सफ़ेद शेरवानी और उसके बटनहोल में लगे लाल गुलाब और उनकी गर्मजोशी की मुरीद हो गई थी."
एक बार बीबीसी से बात करते हुए पामेला ने बताया था, "मेरी माँ और पंडितजी एक दूसरे को बहुत प्यार करते थे. पुराना मुहावरा 'सोलमेट' उन पर पूरी तरह लागू होता था. मेरे पिता बहुर्मुखी थे, जबकि मेरी माँ अपने-आप में ही रहना पसंद करती थीं."
"वो बहुत लंबे समय तक विवाहित रहे थे और एक दूसरे के बहुत नज़दीक साथी भी थे लेकिन इसके बावजूद मेरी माँ अकेलेपन की शिकार थीं. तभी उनकी मुलाक़ात एक ऐसे शख़्स से हुई जो संवेदनशील, आकर्षक, सुसंस्कृत और बेहद मनमोहक था. शायद यही वजह थी कि वो उनके प्यार में डूब गई."
एडविना का हाथ पकड़ने से परहेज़ नहीं
इस बीच भारत में राजनीतिक उथल-पुथल के बावजूद लोगों की नज़र एडविना और नेहरू पर थी.
नेहरू के जीवनीकार स्टेनली वॉलपर्ट अपनी किताब 'नेहरू-अ ट्रिस्ट विद डेस्टिनी' में लिखते हैं, "मैंने एक बार नेहरू और एडविना को ललित कला अकादमी के उद्घाटन समारोह में देखा था. मुझे ये देख कर आश्चर्य हुआ था कि नेहरू को सबके सामने एडविना को छूने, उनका हाथ पकड़ने और उनके कान में फुसफुसाने से कोई परहेज़ नहीं था."
"माउंटबेटन के नाती लॉर्ड रेम्सी ने एक बार मुझे बताया था कि उन दोनों के बीच महज़ अच्छी दोस्ती थी, इससे ज्यादा कुछ नहीं. लेकिन खुद लॉर्ड माउंटबेटन एडविना को लिखी नेहरू की चिट्ठियों को प्रेम पत्र कहा करते थे. उनसे ज़्यादा किसी को अंदाज़ा नहीं था कि एडविना किस हद तक अपने 'जवाहार' को चाहती थीं."
रूसी मोदी ने देखा था नेहरू को एडविना को अपनी बाहों में भरते
नेहरू की एक और जीवनी लिखने वाले एमजे अकबर बताते हैं कि इस बारे में उन्हें सबसे सशक्त प्रमाण टाटा स्टील के मुख्य कार्यकारी अधिकारी रह चुके रूसी मोदी ने दिया था.
अकबर अपनी किताब 'नेहरू-द मेकिंग ऑफ़ इंडिया' में लिखते हैं, "1949 से 1952 के बीच रूसी के पिता सर होमी मोदी उत्तर प्रदेश के राज्यपाल हुआ करते थे. नेहरू नैनीताल आए हुए थे और राज्यपाल मोदी के साथ ठहरे हुए थे. जब रात के 8 बजे तो सर मोदी ने अपने बेटे से कहा कि वो नेहरू के शयन कक्ष में जा कर उन्हें बताएं कि मेज़ पर खाना लग चुका है और सबको आपका इंतज़ार है."
"जब रूसी मोदी ने नेहरू के शयनकक्ष का दरवाज़ा खोला तो उन्होंने देखा कि नेहरू ने एडविना को अपनी बाहों में भरा हुआ था. नेहरू की आँखें मोदी से मिलीं और उन्होंने अजीब सा मुंह बनाया. मोदी ने झटपट दरवाज़ा बंद किया और बाहर आ गए. थोड़ी देर बाद पहले नेहरू खाने की मेज़ पर पहुंचे और उनके पीछे-पीछे एडविना भी वहाँ पहुंच गईं."
दोनों के बीच पैदा हुई चिंगारी
आख़िर ऐसी क्या बात थी कि नेहरू और एडविना एक दूसरे की तरफ़ आकर्षित हुए, ख़ासतौर से ये देखते हैं कि भारत उन दिनों राजनीतिक झंझावात से गुज़र रहा था.
पामेला हिक्स कहती हैं, "नेहरू बहुत ही अच्छी बातचीत करने वाले विद्वान और करिश्माई शख़्स थे. नेहरू की पत्नी बहुत पहले मर चुकी थीं. उनकी बेटी इंदिरा शादीशुदा थीं. उनके दो बच्चे थे और वो उन दिनों दिल्ली से बाहर रहती थीं. नेहरू ने अपनी बहन विजयलक्ष्मी पंडित को राजदूत के रूप में मॉस्को भेज रखा था. तभी उनकी मुलाक़ात एक बहुत ही आकर्षक महिला से होती है. दोनों के बीच एक तरह की चिंगारी पैदा होती है और दोनों एक दूसरे के प्यार में डूब जाते हैं."
माउंटबेटन को बुरा नहीं लगा था एडविना का नेहरू से नज़दीकी बढ़ाना
अब सवाल उठता है कि इन अंतरंग संबंधों को एडविना के पति लॉर्ड माउंडबेटन ने किस तरह से लिया?
नेहरू और एडविना के बीच गहरे भावनात्मक संबंधों को देखते हुए माउंटबेटन और उनकी बेटी पामेला दोनों ने जानबूझ कर एक दूसरे के साथ समय बिताने का मौका दिया.
एंड्रू लोनी हाल ही में प्रकाशित किताब द माउंटबेटंस - देयर लाइव्स एंड लवर्स में लिखते हैं कि एडविना और माउंटबेटन दोनों शादी के बाद प्रेमी रहे हैं.
एफ़बीआई की हाल ही में डिक्लासीफ़ाई की गई फ़ाइलों में बताया गया है कि माउंटबेटन समलैंगिक थे.
1947 आते आते दोनों एडविना और उनके बीच आकर्षण उतार पर था. लेकिन वो उनका इस्तेमाल ये जानने के लिए कर रहे थे कि भारतीय नेता उनके प्रस्ताव के बारे में क्या सोच रहे हैं.
पामेला हिक्स भी अपनी किताब 'डॉटर ऑफ़ एम्पायर' में लिखती हैं, "हाल के महीनों में जब भी मेरे पिता मेरी माँ को गुडनाइट करने जाते, उन्हें उनके आरोपों का सामना करना पड़ता कि वो उन्हें समझते नहीं हैं, वो उनकी अनदेखी कर रहे हैं, उनका व्यवहार बहुत रूखा है और वो उनका ख़याल नहीं रखते, वगैरह वगैरह."
"वो उनसे माफ़ी ज़रूर माँगते थे, बिना ये जाने हुए कि उनसे ग़लती कहाँ हुई है. लेकिन नेहरू के साथ कुछ दिन पहाड़ मे बिताने के बाद मेरी माँ की तरफ़ से आने वाले ताने बंद हो गए थे. अब जब मेरे पिता ऊपर जाते तो वो मेरी माँ को पॉकेट एटलस देखते हुए पाते. वो उनपर मुस्करातीं और चहक कर अपने डिकी डार्लिंग को गुडनाइट कहतीं."
नेहरू को दी अपनी पन्ने की बेशकीमती अँगूठी
आख़िर वो घड़ी भी आ गई जब एडविना और नेहरू ने एक दूसरे से विदा ली. भारतीय मंत्रिमंडल ने उनके सम्मान में विदाई भोज दिया. बीबीसी ने पामेला हिक्स से पूछा कि उनकी माँ के लिए नेहरू से विदा लेना कितना तकलीफ़देह था?
पामेला हिक्स का जवाब था, "उनके लिए ये दिल तोड़ने जैसा था. जाने से पहले उन्होंने अपनी एक बहुत सुंदर और कीमती पन्ने की अंगूठी निकाली और उसे उन्होंने नेहरू की बेटी इंदिरा को दिया. हालांकि, नेहरू एक अमीर परिवार से आते थे, लेकिन उन्होंने अपना सब कुछ देश को दान कर दिया था."
"एडविना ने इंदिरा से कहा कि वो ये अँगूठी नेहरू को इसलिए नहीं दे रही हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि वो इसे नहीं लेंगे. अगर कभी भी उन्हें पैसे की ज़रूरत पड़े तो तुम इस अंगूठी को बेच देना."
आम की पेटी और आत्मकथा
हिक्स आगे बताती हैं, "अगली सुबह जब नेहरू गवर्नमेंट हाउज़ पहुंचे तो उन दोनों ने उपहारों का आदान-प्रदान किया. एडविना ने उन्हें 18वीं सदी का सोने का बना एक फ्रेंच डिब्बा दिया. नेहरू उनके लिए एक पुराना सिक्का, पके आमों का एक क्रेट और अपनी आत्मकथा की एक प्रति लाए."
"जब एडविना जहाज़ में बैठीं तो वो अपने आँसुओं को नहीं रोक पाईं. उन्होंने अपने गले से सेंट क्रिस्टोफ़र का एक क्रिस्टल निकाला और अपनी पीए से कहा कि आप जहाज़ से नीचे उतरे और इसे किसी ऐसे सख़्स को दीजे जो इसे नेहरू तक पहुंचा दे. जहाज़ की लंबी यात्रा के दौरान मेरी माँ ने एक शब्द भी नहीं कहा."
लंदन में मुलाकातें
लेकिन इसके बाद भी नेहरू और एडविना की मुलाकातों का सिलसिला जारी रहा. नेहरू जब भी राष्ट्रमंडल शिखर सम्मेलन में भाग लेने लंदन जाते, एडविना के साथ कुछ दिन ज़रूर बिताते.
उन दिनों लंदन में भारतीय उच्चायोग में काम करने वाले खुशवंत सिंह ने अपनी आत्मकथा 'ट्रूथ, लव एंड लिटिल मेलिस' में लिखा है, "नेहरू के विमान ने जब हीथ्रो के रनवे को छुआ तो काफ़ी रात हो चुकी थी. अगली सुबह जब मैं दफ़्तर पहुंचा तो मेरी मेज़ पर कृष्ण मेनन का नोट रखा हुआ था कि मैं उनसे तुरंत मिलूँ."
"मेरी मेज़ पर ही 'द डेली हैरल्ड अख़बार' पड़ा हुआ था जिसके पहले पन्ने पर ही नेहरू और लेडी माउंटबेटन की तस्वीर छपी थी, जिसमें वो अपना नाइट गाउन पहने हुए नेहरू के लिए अपने घर का दरवाज़ा खोल रही थीं. उसके नीचे कैप्शन था, 'लेडी माउंटबेटन्स मिड नाइट विज़ीटर."
"ख़बर में ये भी लिखा गया था कि लॉर्ड माउंटबेटन इस समय लंदन में नहीं हैं. जब मैं मेनन के पास पहुंचा तो वो मुझ पर दहाड़े, 'तुमने आज का हैरल्ड देखा? प्रधानमंत्री तुमसे बहुत नाराज़ हैं.' मैंने कहा, 'मेरा इससे कोई लेना-देना नहीं. मुझे क्या पता था कि पंडितजी हवाईअड्डे से अपने होटल जाने के बजाए माउंटबेटन के घर जा पहुंचेंगे."
सोहो के रेस्तराँ में एडविना की दावत
इसी तरह की एक घटना तब हुई जब एक बार नेहरू ने एडविना को सोहो के एक ग्रीक रेस्तराँ में रात के खाने पर बुलाया.
खुशवंत सिंह लिखते हैं, "रेस्तराँ के मालिक ने उन दोनों को पहचान लिया और अपने रेस्तराँ का प्रचार करने के उद्देश्य से प्रेस को फ़ोन कर दिया. अगले दिन के अख़बारों में दोनों की अगल-बगल बैठे हुए तस्वीर छपी. मैं समझ गया कि मेरी फिर शामत आने वाली है."
"मेरी मेज़ पर फिर मेनन का नोट रखा हुआ था कि प्रधानमंत्री मुझसे तुरंत मिलना चाहते हैं. मैंने क्लारिजेस होटल पहुंच कर प्रधानमंत्री के कमरे के दरवाज़े पर 'नौक' किया. नेहरू ने मुझे देख कर पूछा, 'आपकी तारीफ़?' मैंने कहा, 'आपने मुझे बुला भेजा था. मैं लंदन में आपका जनसंपर्क अधिकारी हूँ.' उन्होंने मुझे ऊपर से नीचे देख कर कहा 'जनसंपर्क के बारे में आपकी सोच बड़ी अजीब है."
नेहरू के प्रेम पत्र
1960 में जब एडविना माउंटबेटन का बोर्नियो में निधन हुआ तो उनके बिस्तर के आसपास नेहरू के कई प्रेम पत्र पाए गए. बाद में ये सारे पत्र लॉर्ड माउंटबेटन के पास पहुंचाए गए.
पामेला हिक्स बताती हैं, "अपनी वसीयत में भी मेरी माँ ने नेहरू के लिखे सारे ख़त मेरे पिता के लिए छोड़े थे. एक पूरा सूटकेस इन ख़तों से लबालब भरा हुआ था. मैं उन दिनों 'ब्रॉडलैंड्स' में अपने पिता के साथ रह रही थी. एक दिन उन्होंने मुझसे कहा, क्या तुम इन ख़तों को मेरे लिए पढ़ सकती हो? हालांकि मैं समझता हूँ कि 99.9 फ़ीसदी इन ख़तों में ऐसा कुछ नहीं निकलेगा जिससे मुझे तकलीफ़ पहुंचे."
हाथ से लिखे ख़त
पामेला आगे बताती हैं, "कुछ दिनों तक मैं ऐसा करने की हिम्मत नहीं जुटा पाई. लेकिन कुछ दिनों बाद मैंने उन ख़तों को पढ़ा. वो ग़ज़ब के थे. वो असल में भारत को बनाने की एक डायरी थी. उन ख़तों की शुरुआत हमेशा एक वाक्य से होती थी कि वो मेरी माँ को कितना 'मिस' कर रहे हैं और वो उनके लिए बहुत ख़ास हैं."
"ख़त का अंत भी वो एक निहायत निजी टिप्पणी से करते थे. उनमें कुछ भी शारीरिक नहीं था. ये सारे ख़त सुबह दो बजे से चार बजे के बीच लिखे गए थे और इन सभी को नेहरू ने अपने हाथ से लिखा था."
मैक्सफ़ैक्टर लिपस्टिक की फ़रमाइश
नेहरू और एडविना की नज़दीकी इस हद तक थी कि वो नेहरू ने बिना किसी संकोच के उपहार की माँग कर सकती थीं.
पामेला हिक्स बताती हैं, "शायद 1948 या 49 के क्रिसमस के दिनों की बात है. नेहरू केनेडा की सरकारी यात्रा पर जा रहे थे. उन दिनों इग्लैंड में अभी भी राशनिंग जारी थी. मेरी माँ मैक्सफ़ैक्टर लिपिस्टिक लगाती थीं. उन्होंने नेहरू को लिखा, क्या आप कैनेडा से मेरे ले मैक्सफ़ैक्टर लिपस्टिक ला सकते हैं?"
"हमें इसमें कुछ भी अजूबा नहीं लगा. लेकिन अगर भारत में लोगों को इसका पता चलता कि एक पूर्व वायसराय की पत्नी ने प्रधानमंत्री से एक लिपस्टक लाने के लिए कहा है, तो वहाँ बात का बतंगड़ बन जाता."
जिस्मानी संबंधों से इनकार
सवाल उठता है कि नेहरू और एडविना के बीच प्रेम संबंध 'प्लेटॉनिक' थे या शारीरिक?
माउंटबेटन की बेटी पामेला हिक्स सिरे से शारीरिक संबंधों को ख़ारिज करती हैं.
पामेला कहती हैं, "आजकल हर चीज़ सेक्स तक संकुचित हो गई है. आज की पीढ़ी के लिए ये बात बहुत अजीब लग सकती है कि कोई किसी से बिना सेक्स के इतनी गहराई से जुड़ सकता है. पुराने ज़माने में ये अक्सर होता था. सही बात ये है कि मेरी माँ और नेहरू को अकेले में मिलने का बहुत कम मौका मिला. वो हमेशा लोगों से घिरे रहते थे."
नेहरू को सेक्स से परहेज़ नहीं
लेकिन स्वतंत्र पार्टी के नेता मीनू मसानी के बेटे और इंदिरा गांधी की जीवनी लिखने वाले ज़रीर मसानी ऐसा नहीं मानते.
एंड्रू लोनी को दिए गए इंटरव्यू में वो कहते हैं, "मेरे माता-पिता नेहरू को बहुत अच्छी तरह से जानते थे. नेहरू को सेक्स से परहेज़ नहीं था. मैं ये जानता हूँ कि वो एक दूसरे को रूमानी पत्र लिखा करते थे. पचास के दशक में वो जब भी लंदन जाते थे, वो उनके साथ रात बिताया करते थे."
"हालांकि उनकी ये हरकत भारतीय विदेश सेवा के अधिकारियों को पसंद नहीं आती थी. उनमें से एक मेरे चाचा थे जो बाद में भारत के विदेश सचिव बने. मुझे ऐसा नहीं लगता कि नेहरू एडविना के साथ नहीं सोए होंगे."
विक्टोरियन नैतिकता से एडविना का नाता नहीं
उधर, माउंटबेटन के नाती एशली हिक्स 1 फ़रवरी 2017 को डेली टेलिग्राफ़ को दिए गए इंटरव्यू में दावा करते हैं कि नेहरू की बहन विजयलक्ष्मी पंडित ने उन्हें बताया था कि नेहरू तब तक नपुंसक हो चुके थे. इसलिए उनके एडविना के साथ शारीरिक संबंधों की बात फ़िज़ूल लगती है.
'द माउंटबेटन्स-देअर लाइव्स एंड लव्स' की समीक्षा करने वाले जामिया मिलिया इस्लामिया के एसोसिएट प्रोफ़ेसर शेख़ मुजीबुर रहमान बताते हैं, "अगर आप दोनों के ख़तों की भाषा उपहारों और फ़ोटोग्राफ़्स को देखें तो हमें पता चलता है कि ये संबंध रोमांटिक था. दोनों ने कभी स्वीकार नहीं किया कि दोनों के बीच कोई शारीरिक संबंध था."
"मेरा मानना है कि दोनों के बीच संबंध रोमांस से आगे बढ़ चुका था. उनके शारीरिक संबंध स्थापित करने की संभावना कहीं अधिक थी. ये बात किसी से छिपी नहीं है कि एडविना के दूसरे मर्दों के साथ संबंध रहे थे. ये पहला मौका नहीं था कि उन्होंने अपने पति के साथ बेवफ़ाई की थी. उनके पति के भी दूसरे लोगों से संबंध थे. वो विक्टोरियन नैतिकता को मानने वाली महिला नहीं थीं. इसलिए अगर मैं ये कहूँ कि दोनों के बीच संबंध रोमांस से कहीं आगे बढ़ चुके थे तो शायद ग़लत नहीं होगा."
ये भी पढ़ेंः
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)