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कोरोना वायरस: चीन से लौटे भारतीयों की आपबीती
- Author, बुशरा शेख़
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
"रात में नींद नहीं आती थी, सारा समय बच्ची को चेक करता रहता था कि कहीं उसे कुछ दिक़्क़त तो नहीं है, सब सही तो है, अपने से ज़्यादा चिंता परिवार की थी. इन सबकी वजह से मुझे लगातार तीन या चार दिन रात को नींद नहीं आयी. बस ये सोचता रहता था की किसी तरह हम लोग को यहाँ से बाहर निकाल लिया जाए"
चीन के हुबे प्रांत से लौटे डॉ. नागेन्द्र प्रसाद यादव बनारस के रहने वाले हैं और अपने परिवार के साथ पिछले छह साल से चीन में रह रहे हैं. हुबे साइंस एंड टेक्नॉलोजी कॉलेज में डॉ. नागेन्द्र प्रसाद प्रोफ़ेसर है और फ़िलहाल वो भारत वापस लौट कर ख़ुश हैं.
चीन का वुहान और हुबे प्रांत कोरोना वायरस से सबसे ज्यादा प्रभावित है. चीन के राष्ट्रीय स्वास्थ्य आयोग के ताज़ा आँकड़ों के अनुसार कोरोना वायरस से अब तक वहाँ लगभग 2000 मौत हो चुकी है. वहाँ फँसे भारतीयों को अब यहां लाया जा रहा है. गत 1 और 2 फरवरी को 406 भारतीय दिल्ली पहुँचे जिन्हें गुरुग्राम में आईटीबीपी (भारत-तिब्बत सीमा पुलिस) के बनाए गए आइसोलेशन सेंटर में रखा गया है.
इन लोगों को यहाँ रखने का मक़सद है, चीन से आने वालों की जाँच करके यह पता लगाया जा सके कि कहीं वो कोरोना वायरस से संक्रमित तो नहीं हैं.
चीन से आए यात्रियों में अधिकतर महिलाएँ है जिनमे कामकाजी महिलाओं के अलावा मेडिकल की पढ़ाई करने वाली छात्राएँ भी हैं.
महाराष्ट्र की अदिति पाटिल वुहान यूनिवर्सिटी से मेडिकल की पढ़ाई कर रही हैं.
वो बताती हैं, "वहाँ पर लोग डरे हुए थे पहले तो एपिडेमिक फैलने के बाद हमारे पास ख़बर आयी और हमें बोला गया कि हम वुहान नहीं जा सकते और दो दिन में हमारा शहर भी पूरी तरह से बंद हो गया, लोग सार्वजनिक जगहों पर जाने और लोगों से बातचीत करने से डर रहे थे. कोई किसी के पास भी नहीं जाता था अगर कोई सामने आ भी जाता था तो झट से साइड हो जाते थे."
कई लोग ऐसे भी थे जो इस वायरस को अफ़वाह समझ रहे थे. चीन से लौटी एक महिला बताती हैं, "हम लोगों ने सोचा ये चीज़ें तो आम होती रहती हैं. बीमारी है पता नहीं कोई अफ़वाह है या कोई मज़ाक़ है. हम लोगों ने इसको अफ़वाह समझ कर छोड़ दिया था कि हम लोग वापस नहीं जाएँगे. कुछ दिनो में हालात ठीक हो जाएँगे, हम लोग यहीं रहेंगे. हम लोग कौन सा बाहर घूमने जा रहे हैं."
कोरोना वायरस से होने वाले संक्रमण को रोकने के लिए चीन में दवाई, होटलों, खाने की दुकानों और स्वास्थ्य सेवाओं के अलावा सभी दुकानें बंद करने के आदेश दिए गए हैं. जिसकी वजह से लोगों को काफ़ी दिक़्क़तों का सामना भी करना पड़ा.
"सबसे ज़्यादा परेशानी हमें खाने पीने की थी जो हम बाहर से खाना माँगते थे. ऑनलाइन ऑर्डर करते थे लेकिन वो सारी सुविधाएँ उन्होंने बंद कर रखी थी. बच्चों के पीने के लिए दूध भी नहीं था"
हालाँकि मेडिकल की पढ़ाई कर रही इंशा का कहना है, "हमें यूनिवर्सिटी से बाहर निकलने की सख़्त मनाही थी और हमारे खाने पीने की पूरी व्यवस्था यूनिवर्सिटी ने करायी थी तो हम लोगों को खाने-पीने की दिक़्क़त नहीं हुई"
चीन से आए इन लोगों की पहले एयरपोर्ट पर स्क्रीनिंग होती है उसके बाद इन्हें गुरूग्राम स्थित आइटीबीपी के सेंटर ले जाया जाता है जहाँ उन्हें 14 दिन की गहन जाँच में रखा जाता है.
आइटीबीपी के सीएमओ डॉ. एपी जोशी बताते हैं, "इनको एक सीमित क्षेत्र में रखा जाता है ताकि ये आम लोगों से दूर रहें और इनके लिए कुछ प्रोटोकाल बनाए दिए जाते हैं जैसे कि मास्क और दस्ताने हमेशा पहन के रखना है. सेनिटाइज़र का प्रयोग बार बार करना है और एक दूरी बनाए रखने के दिशा- निर्देश दिए गए हैं."
वो आगे बताते हैं, "हमारे डॉक्टर इन लोगों की सैम्पल लेते हैं और उसे फिर जाँच के लिए पुणे स्थित नेशनल इन्स्टिच्यूट ऑफ़ वायरोलॉजी में भेजा जाता है. उसकी रिपोर्ट आने के बाद हमें पता चलता है कि ये लोग निगेटिव हैं या पॉज़िटिव. हमारे लिए ये ख़ुशी की बात है कि अभी तक सारी रिपोर्ट निगेटिव ही आयी है."
आइटीबीपी के इस सेंटर में रखे गए इन लोगों के लिए कई सुविधाओं का बंदोबस्त किया गया है जैसे बिल्डिंग में ही इनके खाने-पीने, टीवी देखने, खेलने, और वाइफ़ाई की व्यवस्था की गई है.
14 दिन के बाद इन लोगों को डिस्चार्ज किया जा रहा है लोग काफ़ी ख़ुश है कि वो सेफ़ हैं और अब वो अपने घर लौट सकते हैं.
डॉ. नागेन्द्र के चेहरे से उनकी ख़ुशी साफ़ झलक रही है.
नागेन्द्र अपनी पत्नी और छह साल की बेटी के साथ इस सेंटर में 14 दिन बिता चुके हैं और वे अपने घर लौटने वाले हैं.
वो कहते हैं, "कल से ही अच्छा लग रहा है कि काफ़ी लोग अपने घर लौट रहें हैं, काफ़ी ख़ुश माहौल है अब यहाँ."
घर वापस लौटने वालों में इंशा भी हैं जो कश्मीर से हैं.
इंशा कहती हैं, "फ़िलहाल तो हम लोग घर जाएँगे, हमारी यूनिवर्सिटी ने हमारी ऑनलाइन क्लास शुरू करवाई है जो 24 फ़रवरी से है लेकिन हमें मसला है कि हम कश्मीर से हैं और वहाँ इंटरनेट की सुविधा नहीं है, हो सकता है कुछ दिन घर रहने के बाद हम लोग वापस कहीं इंडिया में आ जाएं ताकि हम अपनी ऑनलाइन क्लास ले सकें."
फ़िलहाल चीन से लौटे ये भारतीय ख़ुश तो हैं लेकिन वो अपनी नौकरी और पढ़ाई के छूटने को लेकर फ़िक्रमंद हैं.
डॉ. नागेन्द्र बताते है कि "जॉब की चिंता है, अगर लम्बे समय के लिए ये रहता है तो चीन की सरकार और यूनिवर्सिटी क्या फ़ैसला लेती है ये सोच कर अंदर से डर बना हुआ है."
वापस चीन लौटने के सवाल पर नागेन्द्र की पत्नी कहती हैं, "बच्चे के लिए थोड़ा डर है और इसलिए मैं कुछ समय के लिए अपनी बेटी को अपने पेरेंट्स के पास छोड़ कर जाऊँगी और जब ठीक हो जाएगा तो फिर उसे साथ ले जाऊँगी."
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