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पश्चिम बंगाल अस्पतालों में वार्ड मास्टर की नौकरी के लिए डॉक्टर, इंजीनियर भी लाइन में!
- Author, प्रभाकर मणि तिवारी
- पदनाम, कोलकाता से बीबीसी हिन्दी के लिए
सामान्य सरकारी नौकरियों के लिए पोस्टग्रेजुएट और भारी-भरकम डिग्रियों वाले उम्मीदवारों के आवेदन का मामला तो अक्सर सामने आता है.
कहीं-कहीं तो चपरासी के पद के लिए पीएचडी वाले उम्मीदवार भी आवेदन करते रहे हैं. लेकिन सरकारी अस्पतालों में वार्ड मास्टर या फ़ैसिलिटी मैनेजर के पद पर होम्योपैथ और आयुर्वेदिक डॉक्टरों के अलावा भारी तादाद में इंजीनियरों के आवेदन का पहला मामला पश्चिम बंगाल में सामने आया है.
राज्य स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों का दावा है कि यह मामला बेमिसाल है. इससे पहले कभी ऐसा देखने में नहीं आया था. यह पद ग्रुप सी का होता है.
बंगाल में यह स्थिति तब है जब ममता बनर्जी सरकार लाखों की तादाद में नौकरियां पैदा करने का दावा करती रही है. बीते सोमवार को अपने बजट भाषण के दौरान ही वित्त मंत्री अमित मित्र ने दावा किया था, "बेरोज़गार युवकों को रोज़गार प्रदान करने में राज्य सरकार अव्वल रही है. वर्ष 2019-20 के दौरान अब तक 9.11 लाख लोगों को रोज़गार मुहैया कराया गया है."
हेल्थ रिक्रूटमेंट बोर्ड (एचआरबी) ने हाल में पश्चिम बंगाल के विभिन्न सरकारी अस्पतालों के लिए फ़ैसिलिटी मैनेजर के 829 पदों के लिए प्राथमिक तौर पर जिन 16 हज़ार उम्मीदवारों की सूची तैयार की है उनमें होम्योपैथ और आयुर्वेद की डिग्री वाले डॉक्टरों के अलावा इंजीनियरों और मैनेजमेंट की डिग्री वाले उम्मीदवारों की भरमार है.
एचआरबी के चेयरमैन तापस मंडल कहते हैं, "फ़ैसिलिटी मैनेजर पद के न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता ग्रेजुएशन है. इसलिए हमने ग्रेजुएशन में मिले नंबरों के आधार पर उम्मीदवारों की सूची तैयार की है. इसमें शीर्ष 20 फ़ीसदी में काफ़ी तादाद में ऐसे उम्मीदवार हैं जिनके पास होम्योपैथ, आयुर्वेदिक, इंजीनियरिंग या मैनेजमेंट की डिग्री है."
वह कहते हैं कि उम्मीदवारों की सूची तैयार करने का काम सरकारी दिशानिर्देशों के अनुरूप ही किया गया है.
स्वास्थ्य विभाग के सूत्रों ने बताया कि फ़ैसिलिटी मैनेजर के 829 पदों के लिए अप्रैल, 2019 में विज्ञापन निकला था. उसके जवाब में तीन लाख से ज़्यादा उम्मीदवारों ने आवेदन किया था. उनमें से लिखित परीक्षा के लिए 16 हज़ार 393 उम्मीदवारों को चुना गया है. ओपन कैटेगरी में जो 4,217 उम्मीदवार हैं उनमें लगभग 1,100 यानी 25 फ़ीसदी से भी ज़्यादा उम्मीदवार बीएचएमएस, बीएएमएस, बीई, बीटेक और बीबीए-एमबीए पास हैं.
आवेदन करने वाले डॉक्टर, इंजीनियर क्या कहते हैं?
इस पद के लिए आवेदन भेजने वाले एक होम्योपैथ डॉक्टर मुंशी अतीक़उज्ज़मान ने वर्ष 2017 में कोलकाता के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ होम्योपैथी से वर्ष 2017 में बीएचएमएस की डिग्री ली थी. फ़िलहाल वह बांकुड़ा ज़िले के जयपुर ब्लाक अस्पताल में ठेके पर मेडिकल ऑफ़िसर के तौर पर काम कर रहे हैं. लेकिन डॉक्टर होने के बावजूद उन्होंने ग्रुप सी पद के लिए आवेदन क्यों किया है?
अतीक़ बताते हैं, "ठेके पर नौकरी के एवज़ में उनको हर महीने 25 हज़ार रुपये मिलते हैं. लेकिन फ़ैसिलिटी मैनेजर का वेतन कम से कम 34 हज़ार रुपये है. इसके अलावा पक्की नौकरी और दूसरी सरकारी सुविधाएं तो हैं ही."
कंप्यूटर साइंस में बी.टेक की डिग्री हासिल करने वाले मोहम्मद इरफ़ान बीते चार साल से छोटी-मोटी नौकरियां कर रहे हैं. उन्होंने भी वार्ड मास्टर पद के लिए आवेदन किया है. वह कहते हैं, "नौकरी ही नहीं है तो बी.टेक की डिग्री का क्या फ़ायदा. किसी तरह सरकारी नौकरी मिल जाए तो जीवन चैन से गुज़रेगा."
इस ग्रुप सी पद के लिए आवेदन करने वालों में इंजीनियरिंग की डिग्री वाले उम्मीदवार सबसे ज़्यादा हैं. पश्चिम बंगाल के इंजीनियरिंग कालेजों में दाख़िले की परीक्षा संचालित करने वाले ज्वाइंट एंट्रेंस बोर्ड के पूर्व चेयरमैन भास्कर गुप्त कहते हैं, "यह तस्वीर सिर्फ़ बंगाल की ही नहीं, पूरे देश की है. मौजूदा आर्थिक-सामाजिक परिस्थिति और रोज़गार का अभाव ही इसकी सबसे प्रमुख वजह है. इंजीनियरों को नौकरी नहीं मिल रही है. इसलिए सरकारी नौकरियों में उनकी दिलचस्पी बढ़ रही है."
ऐसे आवेदनों से खड़ी हुई समस्या
स्वास्थ्य राज्य मंत्री चंद्रिमा भट्टाचार्य कहती हैं, "ऊंची डिग्री वाले युवकों में सरकारी नौकरियों के प्रति बढ़ता आकर्षण अच्छी बात है."
लेकिन ऊंची डिग्रीधारी उम्मीदवारों की भीड़ ने हेल्थ रिक्रूटमेंट बोर्ड के अधिकारियों के लिए एक नई परेशानी पैदा कर दी है. उनका कहना है कि इन ऊंची डिग्रीधारकों की वजह से निकट भविष्य में फ़ैसिलिटी मैनेजर पद के लिए दोबारा परीक्षा लेनी पड़ सकती है.
एक अधिकारी बताते हैं. "अमूमन मेधावी और ऊंची डिग्रीवाले उम्मीदवार ऐसी नौकरी जॉइन तो कर लेते हैं लेकिन साथ ही बेहतर अवसरों की तलाश में रहते हैं. मौक़ा मिलते ही ऐसे लोग नौकरी छोड़ चले जाते हैं. इससे समस्या जस की तस रहती है. लेकिन इसके बावजूद बोर्ड के हाथ नियमों से बंधे हैं."
विपक्ष कर रहा खिंचाई
ममता बनर्जी सरकार के रोज़गार सृजन के दावों के बावजूद ज़मीनी हक़ीक़त अलग है. तमाम विपक्षी दल सरकार पर इस मामले में हवाई दावे करने के आरोप लगाते रहे हैं. इसके अलावा समय-समय पर रोज़गार पर श्वेतपत्र जारी करने की भी मांग उठती रही है.
बीजेपी के राष्ट्रीय सचिव राहुल सिन्हा कहते हैं, "बंगाल में न तो नए उद्योग लग रहे हैं और न ही रोज़गार मिल रहा है."
सीपीएम ने भी सरकार पर रोज़गार के मामले में आंकड़ों की हेराफेरी का आरोप लगाया है. सीपीएम नेता सुजन चक्रवर्ती कहते हैं, "सरकार रोज़गार और उद्योगों के आंकड़ों को बढ़ा-चढ़ा कर पेश कर रही है." उनका सवाल है कि अगर सरकारी दावों के मुताबिक़ राज्य में हर साल रोज़गार के लाखों नए अवसर पैदा हो रहे हैं तो लाखों युवा हर साल बंगाल छोड़ कर दूसरे राज्यों में क्यों जा रहे हैं?
कांग्रेस नेता अधीर चौधरी भी सरकार से रोज़गार के आंकड़ों में हेरा-फेरी करने का आरोप लगाते हैं. वह कहते हैं कि सरकारी दावा हक़ीक़त के ठीक उलट है.
सीपीएम से जुड़े छात्र और युवा संगठन अक्सर रोज़गार की मांग में रैलियों का आयोजन करते रहते हैं. एसएफ़आई के प्रदेश सचिव श्रीजन भट्टाचार्य कहते हैं, "बंगाल के लिए शिक्षा के स्तर में गिरावट कोई मुद्दा नहीं है. राज्य से बड़े पैमाने पर उच्चशिक्षा और नौकरियों के लिए छात्र दूसरे राज्यों में जाते रहे हैं."
दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस सरकार विपक्ष पर इस मुद्दे पर आम लोगों को गुमराह करने का आरोप लगाती है. संसदीय कार्य मंत्री पार्थ चटर्जी दावा करते हैं, "राज्य में बेरोज़गारी की दर तेज़ी से कम हुई है और अब यह दूसरे राज्यों के मुक़ाबले काफ़ी कम है."
उनका कहना है कि बेरोज़गारी दर का राष्ट्रीय सूचकांक जहां 6.1 फ़ीसदी है वहीं बंगाल में यह दर महज़ 4.6 फ़ीसदी है. यह विकसित राज्यों में सबसे कम है.
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