सेना में औरतें: सुप्रीम कोर्ट के आदेश का मतलब क्या है?

    • Author, जुगल पुरोहित
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

एक धीमी बहती नदी में अगर कोई बड़ा पत्थर फेंका जाए तो शायद धारा का रुख़ ही बदल जाए, या नहीं भी, लेकिन इस झटके से ऐसी लहर ज़रूर पैदा होती है जो दूर तक जाती है.

नई दिल्ली के साउथ ब्लॉक में स्थित भारतीय रक्षा मंत्रालय के मुख्यालय में कई लोग ऐसा ही झटका और लहर देख रहे हैं.

सुप्रीम कोर्ट के कमरा नंबर 8 में जब सोमवार सुबह साढ़े दस बजे जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ सिंह ने फ़ैसला सुनाया तो इन सबकी निगाहें सुप्रीम कोर्ट पर ही लगी थी.

रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने ट्वीट करके अदालत के फ़ैसले को दिल से स्वीकार किया. लेकिन हर कोई इतना स्पष्ट नहीं था.

एक सैन्य अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, "ये आदेश हमें जहां लेकर आया है हम पहले कभी वहां नहीं पहुंचे थे. ये अनसुलझा क्षेत्र है. लेकिन ये शीर्ष अदालत का आदेश है और इसका पालन किया जाएगा. हमारी क़ानूनी टीम इसे देखेगी. हालांकि, ऐसा नहीं है कि सेना महिला अधिकारियों को भर्ती करना नहीं चाहती है. हमने साल 1992 से क़दम दर क़दम सेना को महिलाओं के लिए खोला है. इस आदेश के आने से पहले भी हमने कई क़दम उठाए हैं. हम भले ही धीमे चलते हुए दिख रहे हैं लेकिन हम विवेकपूर्ण होना चाहते हैं."

क्या हुआ है?

सेना की महिला अधिकारियों को हर लिहाज़ से पुरुष अधिकारियों के बराबर माना गया है.

आगे बढ़ने से पहले समझते हैं कि सेना में स्थायी कमीशन के मायने क्या हैं.

इसका मतलब है कि रैंक के हिसाब से रिटायर होना. स्थायी कमीशन न होने का मतलब ये होता है कि समय से पहले या ज़बरदस्ती रिटायर किया जा सकता है.

शीर्ष अदालत ने कहा है कि स्थायी कमिशन पाने वाली महिला अधिकारियों को सभी भत्ते दिए जाएं जिनमें पदोन्नति और वित्तीय भत्ते भी शामिल हैं.

ये आदेश उन सभी महिला अधिकारियों पर लागू होगा जो सेवा में हैं या जिन्होंने अदालत का दरवाज़ा खटखटाया और अदालत में ये मामला लंबित रहने के दौरान रिटायर हो गई हैं.

हालांकि, ये सेना की उन शाखाओं पर ही लागू होगा जिनमें पहले से महिलाओं को काम करने की अनुमति है.

अभी ये हैं, जज एडवोकेट जनरल, आर्मी एजुकेशन कॉर्प्स, सिगनल्स, इंजीनियर्स, आर्मी एविएशन, आर्मी एयर डिफ़ेंस, इलेक्ट्रॉनिक्स एंड मेकेनिकल इंजीनियर्स, आर्मी सर्विस कॉर्प्स, आर्मी आर्डिनेंस कॉर्प्स और इंटेलिजेंस.

हालांकि युद्ध क्षेत्र में लड़ने वाली शाखाओं में महिलाएं नहीं हैं. ये हैं इंफेंट्री, आर्टिलरी और आर्मर्ड कॉर्प्स.

शीर्ष अदालत ने ये भी कहा है कि वो सभी महिलाएं जो शार्ट सर्विस कमीशन पर सेना के साथ जुड़ती हैं उन्हें भी स्थायी कमीशन के योग्य माना जाएगा.

शीर्ष अदालत ने इस आदेश का पालन करने के लिए सेना को तीन महीनों का वक़्त दिया है.

क्या नहीं हुआ है?

ये सोचना कि महिलाओं ने सबकुछ हासिल कर लिया है, सही नहीं होगा.

सुप्रीम कोर्ट के सामने सरकार ने कहा था कि वह महिलाओं को सेना में अन्य भूमिकाएं देने के लिए उत्सुक है.

सरकार का दरअसल मतलब ये था कि महिलाएं संघर्ष क्षेत्रों में तैनात नहीं होंगी.

युद्ध क्षेत्र में नियुक्ति न सिर्फ़ बहुत अहम होती है बल्कि जब किसी अधिकारी के पास सिर्फ़ एक ही विकल्प होता है तो ज़ाहिर तौर पर इससे पदोन्नति प्रभावित होती है.

फ़िलहाल, महिलों को सिर्फ़ अधिकारी स्तर पर भर्ती दी जाती है. जवान या किसी अन्य रैंक पर उनकी भर्ती नहीं होती है.

भारतीय सेना के लिए आगे क्या?

सेना अगले कुछ दिनों या सप्ताह में क्या करेगी ये देखना अहम होगा.

सेना जहां ये ज़रूरत समझती है कि उसे कुछ खुला होना चाहिए, वह साथ ही सीमाओं पर अपनी चुनौतियों को भी समझती है.

नियंत्रण रेखा जैसे संघर्ष क्षेत्रों में महिलाओं को नियुक्त करने या चरमपंथ विरोधी अभियानों में या सियाचीन या भारत-चीन सीमा जैसे क्षेत्रों में उन्हें तैनात करने की अपनी चुनौतियां हैं.

सेना के सूत्र बताते हैं कि फ़िलहाल सेना के पास महिलाओं को इन क्षेत्रों में तैनात करने के लिए ज़रूरी इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं है.

एक अधिकारी बताते हैं, "समय के साथ इंफ्रास्ट्रक्चर भी विकसित हो जाएगा, लेकिन सियाचीन जैसी जगह पर तैनाती के दौरान एक महिला अधिकारी को पांच जवानों के साथ एक छोटे टैंट में भी रहना पड़ सकता है. नियंत्रण रेखा पर पुरुषों और महिलाओं को ही एक बंकर में रहना पड़ सकता है. हमें और वक़्त और इस पर और चर्चा की ज़रूरत है."

भले ही युद्ध क्षेत्र में भूमिका को दायरे से बाहर माना जाता हो लेकिन सिग्नल, इंजीनियर, आर्मी एविएशन, आर्मी एयर डिफेंस, इलेक्ट्रानिक्स एंड मैकेनिकल इंजीनियर्स और यहां तक की इंटेलिजेंस की भूमिका के दौरान भी सीमा या अग्रणी क्षेत्रों में रहना पड़ सकता है.

दूसरी तरह से कहा जाए तो महिलाएं संघर्ष क्षेत्रों के पास तो रही ही हैं.

अब जब महिलाओं और पुरुषों को पूरी तरह बराबर मान लिया गया है, सेना अब ऊपर बताई गई सभी शाखाओं में महिला को कमांडिग अफ़सर तैनात करने के लिए अपने आप को तैयार कर रही है.

ये सेना के लिए अपनी तरह की पहली बड़ी चीज़ होगी.

एक कमांडिग अफ़सर के रूप में, महिलाएं से पुरुषों की ही तरह, उम्मीद की जाएगी कि वो मुश्किल से मुश्किल परिस्थितियों में तैनात बलों से मिलने जाएं.

सेना अपने आप को एक और चीज़ के लिए तैयार कर रही है. सेना में भविष्य की संभावनाएं बेहतर हो जाने के बाद बहुत सी महिलाओं की दिलचस्पी अब सेना में नौकरी करने की होगी.

एयरफ़ोर्स और नौसेना में क्या स्थिति है?

भारतीय वायुसेना में लड़ाकू विमान उड़ाने से लेकर सभी शाखाओं में महिला अफ़सरों को स्वीकार कर लिया गया है.

लेकिन यहां भी वे सिर्फ़ अधिकारी स्तर पर ही हैं और अन्य रैंक यानी ओआर पर नहीं है.

आज की स्थिति में वायुसेना में अन्य बलों के मुक़ाबले सबसे ज़्यादा महिला अफ़सर हैं. जून 2019 में भारतीय वायुसेना में 13.2 प्रतिशत महिलाएं थीं.

वहीं भारतीय नौसेना में 6.7 प्रतिशत पदों पर महिला अफ़सर तैनात हैं.

इसकी तुलना में भारतीय सेना के सबसे बड़े बल, थलसेना में सिर्फ़ 3.89 प्रतिशत पदों पर ही महिलाएं तैनात हैं.

वहीं भारतीय नौसेना में वो सभी शाखाएं महिलाएं अफ़सरों के लिए खुली हैं जिनमें समंदर में तैनाती नहीं होती है.

भारतीय नौसेना भविष्य के लिए नए जहाज़ ख़रीद रही है. इन पर महिला और पुरुष अफ़सरों को एक साथ प्रशिक्षण देने की योजना है.

जैसा की रक्षा मंत्रालय ने पिछले साल मार्च में कहा था, इस क़दम से सेना की सभी शाखाओं में महिलाओं को शामिल करने का रास्ता साफ़ हो जाएगा.

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