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कश्मीर: आईटी एक्ट की असंवैधानिक धारा का इस्तेमाल क्यों
- Author, फ़ैसल मोहम्मद अली
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
भारत प्रशासित कश्मीर में पुलिस ने सोशल मीडिया के कथित ग़ैर-क़ानूनी इस्तेमाल के लिए जिस आईटी एक्ट का इस्तेमाल किया है, सुप्रीम कोर्ट ने उसे पाँच साल पहले ही समाप्त कर दिया था.
देश की सबसे ऊंची अदालत ने आईटी एक्ट 2000 की धारा 66-ए को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के ख़िलाफ़ बताते हुए इसे असंवैधानिक क़रार दिया था.
मार्च 2015 में दिए गए फ़ैसले में अदालत का ये भी कहना था कि 66-ए विधिसंगत प्रतिबंध अनुच्छेद 19 (2) के दायरे में भी नहीं आता है.
यूएपीए और दूसरी धाराएं
श्रीनगर साइबर पुलिस ने 'सोशल मीडिया के दुरुपयोग' के लिए कई लोगों के ख़िलाफ़ अनलॉफ़ुल एक्टिविटीज़ प्रिवेंशन एक्ट (यूएपीए), भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं और आईटी एक्ट 66-ए (बी) के तहत केस दर्ज किया है.
सोमवार को जारी प्रेस रिलीज़ में पुलिस ने कहा है कि ये मुक़दमा उन सोशल पोस्ट के मद्देनज़र दर्ज किया गया है जिनका इरादा आतंकवादी गतिविधियों और आतंकवादियों का गुणगान करना है और उपद्रवी तत्वों द्वारा वीपीएन के ज़रिए डाले गए ये सोशल मीडिया पोस्ट अलगाववादी विचारधारा को बढ़ावा देते हैं.
पुलिस के अनुसार इस मामले में बहुत सारी सामग्रियां उनके हाथ लगी हैं.
सुप्रीम कोर्ट के वकील और साइबर मामलों के जानकार पवन दुग्गल ने कश्मीर पुलिस की ओर से 66-ए (आईटी एक्ट) के इस्तेमाल को 'क़ानून की पूरी जानकारी नहीं होने और सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले की अनदेखी' बताया.
पवन दुग्गल ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि श्रेया सिंघल बनाम भारत सरकार मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद 66-ए और उसके दो और सेक्शन बी, सी आईटी एक्ट, 2000, का हिस्सा हैं ही नहीं.
सुप्रीम कोर्ट के असंवैधानिक बताने और समाप्त करने के बावजूद 66-ए आईटी एक्ट के जारी इस्तेमाल को लेकर अदालत ने नाराज़गी ज़ाहिर की थी और पिछले साल मामले पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा था.
आईटी पॉलिसी की कमी
कर्नाटक हाईकोर्ट ने साल की शुरुआत में एक व्यक्ति के ख़िलाफ़ इस धारा में केस दर्ज करने के लिए दो पुलिस अधिकारियों को 10-10 हज़ार रुपए जुर्माना भरने का आदेश दिया था.
पवन दुग्गल कश्मीर में इस केस को लेकर पैदा हुई स्थिति के लिए लिए इंफॉर्मेशन टेक्नॉलॉजी क्षेत्र में एक विस्तृत पॉलिसी की कमी को भी ज़िम्मेदार मानते हैं.
श्रीनगर में जो मुक़दमा दर्ज किया गया है उसमें वीपीएन का ज़िक्र किया गया है.
वीपीएन या वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क वो सिस्टम है जिसके इस्तेमाल से ऑनलाइन होने के बावजूद आपकी पहचान उजागर नहीं होगी. इसके माध्यम से आप एक प्राइवेट नेटवर्क को पब्लिक नेटवर्क की तरह इस्तेमाल कर किसी रिमोट साइट से जोड़ सकते हैं. इसके इस्तेमाल से कई यूज़र्स को भी साथ जोड़ा जा सकता है.
वीपीएन को जोड़ने के लिए इंटरनेट एक माध्यम है.
आज के साइबर युग में वीपीएन का इस्तेमाल बहुत सारे प्राइवेट कार्यालयों जैसे देश में मौजूद लाखों बीपीओज़ और व्यक्तिगत तौर भी हो रहा है.
लेकिन सरकार अभी तक इंक्रिप्शन को लेकर एक पॉलिसी तैयार नहीं कर पाई है.
पवन दुग्गल कहते हैं कि ज़रूरत इस बात की है कि भारत फ़ैसला करे कि वो इंक्रिप्शन से कैसे निबटेगा.
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