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दिल्ली चुनाव: खिलेगा कमल या एक बार फिर केजरीवाल
मंगलवार को तस्वीर स्पष्ट हो जाएगी कि दिल्ली में किसकी सरकार बनेगी - भाजपा, आम आदमी पार्टी या फिर कांग्रेस की.
दिल्ली की 70 विधानसभा सीटों के लिए आठ फ़रवरी को मतदान हुआ था जिसके बाद मंगलवार को वोटों की गिनती होने वाली है.
माना जा रहा है कि यहां मुख्य टक्कर अरविंद केजरीवाल की सत्ताधारी आम आदमी पार्टी और भाजपा के बीच है.
मतदान के बाद आए विभिन्न एग्ज़िट पोल्स में आम आदमी पार्टी को सबसे अधिक सीटें मिलने का अनुमान लगाया गया था.
एग्ज़िट पोल्स की मानें तो आम आदमी पार्टी आराम से सरकार बना लेगी लेकिन बीजेपी अध्यक्ष मनोज तिवारी ने दावा किया है कि दिल्ली चुनाव में बीजेपी की 48 सीटें आएँगी.
वहीं दिल्ली कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष सुभाष चोपड़ा ने एक क़दम आगे बढ़ाकर दावा किया है कि असल नतीजा एग्ज़िट पोल्स से अलग होगा.
उनका कहना है कि दिल्ली में न तो केजरीवाल एक बार फिर सरकार बना सकेंगे और न ही बीजेपी को 20 से अधिक सीटें मिलेंगी.
मतदान के बाद चर्चा में रहा चुनाव आयोग
दिल्ली में शनिवार को हुए मतदान के बाद मत प्रतिशत के जारी आंकड़ों को लेकर चुनाव आयोग की आलोचना हुई थी.
चुनाव आयोग ने मतदान ख़त्म होने के क़रीब बीस घंटे बाद रविवार को देर शाम क़रीब सवा सात बजे मतदान का आंकड़ा जारी किया.
इसे लेकर कई लोगों ने सवाल उठाया कि आख़िर मत प्रतिशत का आंकड़ा बताने मनें आयोग को इतनी देरी क्यों हो रही है.
अरविंद केजरीवाल ने भी सोशल मीडिया पर सवाल किया, "मतदान के कई घंटों बाद भी आंकड़े जारी क्यों नहीं किए जा रहे हैं?"
दिल्ली में चुनाव के मुद्दे
दिल्ली की सत्ता से बीजेपी बीते 20 सालों से दूर रही है. पाँच सालों से यहां अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी के हाथों में सत्ता है. इससे पहले यहां पंद्रह साल तक कांग्रेस सत्ता पर काबिज़ रही थी.
देशभर में हुए भ्रष्टाचार विरोधी संघर्ष और प्रदर्शनों के बाद ये पार्टी 2012 नवंबर को अस्तित्व में आई थी जिसके बाद पार्टी ने साफ़ सुथरी सरकार के वादे के साथ विधानसभा चुनाव लड़ा और 2013 में 15 साल से लगतार सत्ता में रही कांग्रेस को हरा कर सत्ता में आई. लेकिन कुछ दिनों बाद केजरीवाल ने इस्तीफ़ा दे दिया. इसके बाद 2014 में हुए चुनावों में आम आदमी पार्टी ने दिल्ली में बहुमत वाली सरकार बनाई थी.
2017 में दिल्ली में हुए म्युनिसिपल चुनावों में आम आदमी पार्टी को मामूली जीत मिली थी. पार्टी ने पहली बार एमसीडी का चुनाव लड़ा था और वो कुल 270 वार्ड और तीन म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन में से 49 में जीत हासिल करने में सफल हुई थी.
म्युनिसिपल चुनावों में जीत का परचम बीजेपी ने फहराया था और इससे पहले साल 2012 में भी दिल्ली की एमसीडी बीजेपी के ही पास रही थी.
दिल्ली में इस बार आम आदमी पार्टी ने चुनाव से पहले ही बीजेपी को चुनौती दी थी कि ये चुनाव वो विकास के नाम पर लड़ने वाली है और बीजेपी भी विकास की बात करें.
चुनाव प्रचार के दौरान यहां केंद्र का नागरिकता संशोधन क़ानून, नागरिकता रजिस्टर, इन मुद्दों को लेकर लगातार हो रहे विरोध प्रदर्शन छाए रहे.
बीजेपी ने अपनी पूरी ताकत प्रचार में झोंक दी. दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रैलियां करते नज़र आए, गृह मंत्री अमित शाह डोर-टू-डोर कैंपेन करते दिखे तो बीजेपी शासित प्रदेशों के मुख्यमंत्री भी रैलियों को संबोधित करते दिखाई दिए.
पूरे प्रचार के दौरान बीजेपी राष्ट्रवाद के मुद्दे को सामने लाती रही. पार्टी के नेता कई जगहों पर स्पष्ट तौर पर समुदाय विशेष, और 'देश के गद्दारों...' जैसे से जुड़ी की बात करते नज़र आए और इस कारण उन्हें चुनाव आयोग ने नोटिस भी दिया.
वहीं आम आदमी पार्टी ने अपने कार्यकर्ताओं के दम पर ही पूरा चुनाव प्रचार संभाला. पार्टी से साफ़ तौर पर नागरिकता संशोधन क़ानून जैसे मुद्दों से दूरी बनाए रखी और इन मामलों पर टिप्पणी करने से भी बचती दिखी. पार्टी ने बिजली, पानी, शिक्षा और महिला सुरक्षा जैसे मुद्दों को आगे रख कर वोट की अपील की.
मंगलवार को मतों की गिनती के बाद ये स्पष्ट हो जाएगा कि दिल्ली की जनता विकास के मुद्दों को अधिक महत्व देती है या फिर यहां भी राष्ट्रवाद का मुद्दा हावी रहा है.
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