कृष्ण मेनन से परमाणु वैज्ञानिक होमी भाभा इतना चिढ़े क्यों रहते थे?

कृष्ण मेनन
    • Author, रेहान फ़ज़ल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
News image

कृष्ण मेनन को अलग-अलग समय पर कई नामों से पुकारा गया... 'रासप्यूटिन', 'ईविल जीनियस', 'फ़ॉर्मूला मैन' और 'वर्ल्ड्स मोस्ट हेटेड डिप्लोमैट' वगैरह-वगैरह.

जवाहरलाल नेहरू के बहुत क़रीबी होने के बावजूद शीत युद्ध के दौरान अमरीकी खेमे में वीके कृष्ण मेनन की जितनी छीछालेदर हुई उतनी शायद किसी की भी नहीं.

ब्रिटिश उनके कम्युनिस्ट प्रेम और अक्खड़पन से इतने नाराज़ थे कि जब वो ब्रिटेन में भारत के उच्चायुक्त थे, उन्होंने सारे कूटनीतिक नियमों को दरकिनार करते हुए न सिर्फ़ उनके फ़ोन टैप किए बल्कि चोरी छिपे उनके ख़त भी पढ़े.

भारत में मेनन को सबसे बड़ी वाहवाही तब मिली जब उन्होंने 1957 में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कश्मीर पर आठ घंटे लंबा भाषण दिया.

हाल ही में प्रकाशित पुस्तक 'अ चीकर्ड ब्रिलियंस द मैनी लाइव्स ऑफ़ वीके कृष्ण मेनन' के लेखक और पूर्व पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश बताते हैं, ' 1952 से लेकर 1957 तक कृष्ण मेनन को 'फ़ॉर्मूला मेनन' कहा जाता था. कहीं भी कोई समस्या हो कोरिया में, अफ़्रीका में, कॉंगो में, स्वेज़ में, हर जगह माँग उठती थी कृष्ण मेनन को बुलाओ.

1957 में उन्होंने सुरक्षा परिषद में कश्मीर पर आठ घंटे का भाषण दिया. चार घंटे एक दिन और फिर चार घंटे दूसरे दिन. इस भाषण के तुरंत बाद वो बेहोश होकर गिर पड़े और उन्हें होश में लाने के लिए डॉक्टर को बुलाना पड़ा.

जयराम रमेश
इमेज कैप्शन, 'अ चीकर्ड ब्रिलियंस द मैनी लाइव्स ऑफ़ वी के कृष्ण मेनन' के लेखक और पूर्व पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश और रेहान फ़ज़ल

तब तक लोग मान कर चलते थे कि संयुक्त राष्ट्र संघ में कश्मीर पर पाकिस्तान का केस बहुत मज़बूत है, लेकिन कृष्ण मेनन ने अपने भाषण से पूरा नक्शा बदल दिया और भारत का केस मज़बूत हो गया.

वो राष्ट्रीय हीरो बन गए. ये भाषण देने के बाद जब वो मुंबई के साँताक्रूज़ हवाई अड्डे पर उतरे तो वहाँ रहने वाले बहुत से कश्मीरियों ने उनका स्वागत किया.

इसके बाद उन्होंने मुंबई से बहुत बड़ी जीत हासिल की और वहाँ से जीत कर लोकसभा पहुंचे. इस चुनाव में उन्होंने एक दिन भी प्रचार नहीं किया. उनके चुनाव प्रचार की ज़िम्मेदारी उठाई बलराज साहनी. ख़्वाजा अहमद अब्बास, राज कपूर, नूतन, नर्गिस, देवानंद और दिलीप कुमार ने.'

कृष्ण मेनन

इमेज स्रोत, Penguin Books

इमेज कैप्शन, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कृष्ण मेनन ने 8 घंटे का भाषण दिया था. जिसके बाद वो बेहोश हो गए थे.

मेनन की तुनकमिजाज़ी और ग़ुस्सा

सुरक्षा परिषद की उसी बैठक में जब पाकिस्तान के प्रतिनिधि सर फ़िरोज़ नून ख़ाँ ने कश्मीर में जनमत संग्रह की माँग उठाई तो कृष्ण मेनन खड़े हो कर अध्यक्ष की तरफ़ देखते हुए चिल्लाए, 'प्लेबेसाइट,प्लेबेसाइट, प्लेबेसाइट, इन महाशय से पूछिए इनके देश ने बैलट बॉक्स का मुँह भी पहले कभी देखा है?'

लेकिन ये सही है कि बहुत बड़े बुद्धिजीवी होने के बावजूद मेनन बहुत बड़े तुनकमिजाज़ और ग़ुस्सैल शख़्स थे, जिनके व्यवहार के बारे में कोई भविष्यवाणी नहीं की जा सकती थी.

कृष्ण मेनन

इमेज स्रोत, Book Cover

जयराम रमेश कहते हैं, 'मेनन दोस्तों को भी अपना दुश्मन बना लेते थे. 1960 के बाद सैनिक जनरलों से उनके संबंध अच्छे नहीं रहे और उसका नतीजा हमें 1962 के भारत चीन युद्ध में देखने को मिला. उनकी ज़ुबान बहुत तीखी थी. लेकिन वो ज़माना गोरों का ज़माना था... अमरीका, इंग्लैंड, फ़्राँस और रूस का बोलबाला था.'

'तब ये काला शख़्स उठ कर बोलता था मेरे विचारों को सुनिए, मेरे नज़रिए को सुनिए. मेनन उन सभी देशों के नुमाइंदे बन गए जो उभर रहे थे और अभी-अभी आज़ाद हुए थे. अमरीका और ब्रिटेन को ये पसंद नहीं आया. इन्होंने ही पहली बार कहा था कि हम न तो अमरीका के साथ हैं और न ही रूस के साथ. हमारी आवाज़ स्वतंत्र आवाज़ है. 1950 में इस तरह के विचार रखना बहुत क्राँतिकारी था.'

कृष्ण मेनन

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कृष्ण मेनन ने 8 घंटे का भाषण दिया था.

अपनी पसंद के लोगों से घिरे रहना चाहते थे मेनन

दूसरों के बारे में तुरंत कोई राय बनाना कृष्ण मेनन की शख़्सियत का हिस्सा था. इस समय अरीज़ोना में रह रही कृष्ण मेनन की पौत्री जानकी राम बताती हैं, 'मैं नहीं समझती कि दूसरों को परखने की मेनन की क्षमता में कोई खोट था. लेकिन वो किसी शख़्स को या तो पसंद करते थे या नापसंद. लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि जिसे वो नापसंद करते हों, वो उनके पीछे ही पड़ जाते थे. वो बेवकूफ़ों को आसानी से बर्दाश्त नहीं करते थे. वो उन लोगों से घिरे रहना पसंद करते थे जिन्हें वो पसंद करते थे. जनसंपर्क के मामले में वो निरे अनाड़ी थे. उनका मानना था कि जनसंपर्क के बजाए काम करना बेहतर विकल्प है.'

ऑडियो कैप्शन, क्या चीन से हार के लिए कृष्ण मेनन थे जिम्मेदार?

इंग्लैंड में रह कर भारत की आज़ादी के लिए किया काम

मेनन 1924 में जब इंग्लैंड पढ़ाई करने गए थे तो सोच कर गए थे कि छह महीने बाद भारत वापस लौट आएंगे. लेकिन लंदन में वो पूरे 28 साल रुके.

लंदन स्कूल ऑफ़ इकॉनॉमिक्स में वो प्रोफ़ेसर हारोल्ड लास्की के ख़ास शिष्य थे. भारत की आज़ादी के लिए मेनन की प्रतिबद्धता का अंदाज़ा मशहूर पत्रकार राज थापर की बताई एक कहानी से लगाया जा सकता है.

राज थापर अपनी आत्मकथा 'ऑल दीज़ इयर्स' में लिखती हैं, 'एक बार कृष्ण मेनन मेरे पति रोमेश थापर से मिलने हमारे घर आए. मेरे पिता ने दरवाज़ा खोला और मेनन को अंदर आने के लिए कहा. रोमेश शायद बाथरूम में थे. मेरे पिता ने मेनन से यूँ ही पूछ डाला, 'आप जीविका के लिए क्या करते हैं मेनन साहब?' मेनन का जवाब था,' मैं जीविका के लिए काम नहीं करता. मैं भारत की आज़ादी के लिए काम करता हूँ.''

कृष्ण मेनन

इमेज स्रोत, Getty Images

एक दिन में 22 प्याली चाय

कृष्ण मेनन की गिनती उन राज नेताओं में होती है जिन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी चाय और बिस्किट पर गुज़ार दी. कहा जाता है कि वो एक दिन में 22 प्याली चाय पिया करते थे. फिरोज़ गांधी उनके बारे में अक्सर एक मज़ाक सुनाया करते थे कि वो शायद अकेले शख़्स थे जो कॉफ़ी हाउस में जा कर चाय का ऑर्डर देते थे.

जयराम रमेश बताते हैं, ''उनकी खाने की आदतें बहुत अनियमित थीं. उनके व्यवहार में जो अस्थिरता आती थी उसका बहुत बड़ा कारण उनका खाना था. वो न तो शराब और न ही सिगरेट पीते थे. उनकी निजी आदतों में बहुत अनुशासन था. लेकिन उनको गठिया और पीठ दर्द की शिकायत थी. वो इसके लिए दवाइयाँ लिया करते थे. इन दवाइयों के कारण ही उनमें 'मूड स्विंग' हुआ करता था. सुबह जब वो उठते थे तो उनमें बहुत उत्साह हुआ करता था लेकिन शाम ढ़लते ढ़लते वो 'डिप्रेशन' में चले जाते थे. उसी हालत में वो नेहरूजी को पत्र लिखा करते थे कि आप मुझे पसंद नहीं करते. आप मुझे नज़रअंदाज़ कर रहे हैं. कई बार तो वो नेहरू को ख़ुदकुशी करने की धमकी भी देते थे. '

कृष्ण मेनन

इमेज स्रोत, Getty Images

खाना वापस करवाया

जब कृष्ण मेनन ब्रिटेन में भारत के उच्चायुक्त थे तो वो उच्चायुक्त के निवास में न रह कर उच्चायोग के ही एक छोटे से कमरे में रहा करते थे. उस ज़माने में शाँतिमोय मुखर्जी भारतीय उच्चायोग में 'इंटर्न' हुआ करते थे.

एक दिन शाम को करीब 6 बजे जब सब लोग अपने घर चले गए, तो मेनन अपने कमरे से बाहर निकले. जानकी राम बताती हैं, 'जैसे ही मेनन अपने कमरे से बाहर निकले उनकी नज़र शाँतिमोय पर पड़ गई. उन्होंने उनसे कहा कि वो उनके लिए खाने का इंतेज़ाम करें. मेनन को ख़ुश करने की कोशिश में मुखर्जी ने चावल, चपाती, सब्ज़ी, करी और दही का भारतीय खाना ऑर्डर किया. जब खाना आ गया तो वो उसे ख़ुद ले कर मेनन के कमरे में गए. मेनन ने खाने से भरी ट्रे पर एक नज़र डाली और ज़ोर से चिल्लाए, 'तुम्हें पता है मैं ये सब नहीं खाता.'

निराश मुखर्जी वो खाना ले कर वापस उच्चायोग की कैन्टीन में पहुंचे. उसके अंग्रेज़ संचालक ने कहा, 'मुझे पता है कि मेनन को क्या पसंद है.' ये कह कर उन्होंने ट्रे में चाय का एक पॉट और बिना मक्खन लगे हुए तीन टोस्ट रख दिए. इस बार ट्रे देखते ही मेनन की बाँछें खिल गईं. उन्होंने पहले लाया हुआ भोजन दोबारा मंगवाया और शाँतिमोय मुखर्जी से कहा कि वो उसे खा जाएं.'

कृष्ण मेनन

इमेज स्रोत, Getty Images

स्टायलिश सूट पहनने के शौकीन

कुछ लोगों को ये बात थोड़ी अजीब सी लगे लेकिन कृष्ण मेनन को ज्योतिष में बहुत विश्वास था और उन्हें वॉकिंग स्टिक और खिलौने जमा करने का शौक था. कृष्ण मेनन को अच्छे कपड़े पहनने का भी शौक था और वो हमेशा सूटेड-बूटेड रहते थे.

जिस ज़माने में मेनन लंदन में भारत के उच्चायुक्त थे, खुशवंत सिंह उनके साथ जनसंपर्क अधिकारी के रूप में काम किया करते थे. खुशवंत सिंह अपनी आत्मकथा 'ट्रूथ,लव एंड लिटिल मेलिस ' में लिखते हैं, 'वो हमेशा अच्छे कपड़ों में रहते थे और अच्छे दर्ज़ियों से सिले हुए सूट पहनते थे.

उनको ये बर्दाश्त नहीं था कि उनके आसपास काम करने वाले लोग ख़राब कपड़े पहनें. एक बार उन्होंने अपनी एक महत्वपूर्ण बैठक रद्द कर दी और मुझे अपनी कार में बैठा कर सेविल रो' दर्ज़ी ले गए. वहाँ उन्होंने सूट के कपड़े ख़रीदे और दर्ज़ी से दो सूटों के लिए मेरी नाप लेने के लिए कहा. मैं समझा कि वो मुझे सूट तोहफ़े में दे रहे हैं, इसलिए मैंने उन्हें तहेदिल से शुक्रिया कहा. लेकिन वो तोहफ़ा नहीं था. बाद में मुझे उन सूटों के लिए अपनी जेब से कई सौ पाउंड देने पड़े. लेकिन ये कहना पड़ेगा कि मैंने इतने अच्छे सूट अपनी ज़िंदगी में पहले नहीं पहने थे. ये सूट करीब 20 साल तक मेरे पास रहे.'

कृष्ण मेनन

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, जवाहरलाल नेहरू के साथ कृष्ण मेनन

कई महिलाएं मरती थीं कृष्ण मेनन पर

कृष्ण मेनन बहुत एकांतप्रिय व्यक्ति थे. बहुत सुंदर न होते हुए भी कई महिलाएं उनकी तरफ़ आकर्षित हुईं, लेकिन उन्होंने किसी से शादी नहीं की और ताउम्र अकेले ही रहे.

इंडिया लीग में काम करने वाली मेरी सेटों, अना पोलक और एलिस थॉर्नर के दिल में उनके लिए 'सॉफ़्ट कॉर्नर' था. जानकी राम बताती हैं, 'बारबरा मैक्नमारा से वो ज़रूर शादी करना चाहते थे. वो उन्हें 1932 में भारत भी लाए थे और उन्हें मेरी दादी से मिलवाया भी था. लेकिन बात बन नहीं पाई. इस मामले में महिलाएं अनिश्चित काल तक तो इंतेज़ार कर नहीं सकतीं. इसलिए बारबरा ने उन्हें छोड़ दिया. इसका मेनन पर इतना बुरा असर पड़ा कि उन्हें नर्वस ब्रेकडाउन हो गया.

कमला जसपाल से उनका ज़रूर बाक़ायदा इश्क चला. मेरी दादी ने उनसे कहा भी कि तुम उससे शादी क्यों नहीं कर लेते? उनका जवाब था कि वो शादी के फंदे से बहुत मुश्किल से बच कर आए हैं और उस मुसीबत में दोबारा नहीं पड़ना चाहते. दूसरे उन दोनों के बीच उम्र का करीब 30 साल का अंतर था. लेकिन वो बहुत बुद्धिमान और सुंदर महिला थीं.' खुशवंत सिंह यहाँ तक कहते हैं कि कमला जसपाल से उनकी नज़दीकी यहाँ तक थी कि उनकी रॉल्स रॉयस कार कमला को रोज़ उनके घर छोड़ा करती थीं.

कमला जसपाल

इमेज स्रोत, Penguin Books

इमेज कैप्शन, कमला जसपाल से कृष्ण मेनन इश्क़ करते थे.

गोवा अभियान में मेनन की भूमिका

दिलचस्प बात ये है कि केरल के जिस कोज़ीकोड शहर में पुर्तगाल के वास्कोडिगामा ने 1498 में पहली बार क़दम रखा था, उसी कोज़ीकोड में जन्मे कृष्ण मेनन ने 450 साल बाद गोवा से पुर्तगालियों को हटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

जयराम रमेश बताते हैं, 'गोवा की आज़ादी के अभियान को रूप देने और उसका नेतृत्व करने में कृष्ण मेनन की बड़ी भूमिका थी. इस मामले में पंडितजी थोड़ा सावधानी के साथ चलना चाहते थे क्योंकि पुर्तगाल नेटो का सदस्य था और अमरीका और ब्रिटेन नहीं चाहते थे कि गोवा में कोई सैनिक अभियान हो. वो चाहते थे कि बातचीत से इस समस्या का समाधान हो जाए.

लेकिन कृष्ण मेनन ने कहा कि बातचीत का विकल्प अब समाप्त हो चुका है. इस बात के प्रमाण हैं कि उन्होंने पंडितजी पर दबाव बनाया कि सशस्त्र कार्रवाई के अलावा कुछ नहीं हो सकता.

गोवा की आज़ादी के बाद मेनन लोगों के हीरो बन गए. तीन महीने बाद जब उन्होंने बंबई से दोबारा चुनाव लड़ा तो उनकी भारी जीत हुई. 'दो फ़रवरी 1962 को 'टाइम' पत्रिका ने अपने कवर पर कृष्ण मेनन की तस्वीर छापी. गांधी और नेहरू के बाद टाइम के कवर पर जगह बनाने वाले वो तीसरे भारतीय बने.

अमरीका से छत्तीस का आँकड़ा

इस बीत कृष्ण मेनन लगातार अमरीकियों की आँखों की किरकिरी बने रहे. 1962 में जब हेनरी किसिंजर की उनसे पहली बार मुलाक़ात हुई तो वो ये देख कर दंग रह गए कि उन्होंने भारत के क़रीबी समझे जाने वाले अमरीकी राजदूत जे के गालब्रायथ से कहा, 'हमें गले लगाने की कोशिश मत करिए. हम अपने दोस्त ख़ुद चुनते हैं.'

इससे पहले अमरीकी राष्ट्रपति आइज़नहावर ने 14 जुलाई, 1955 को अपनी डायरी में लिखा, 'मेनन में सलीका नहीं है. वो अपने आप को दूसरों से बौद्धिक रूप से बेहतर समझते हैं और इसको बहुत बारीकी से शराफ़त और विनम्रता के चोले में पेश करते हैं. वो ख़तरनाक शख़्स भी है, क्योंकि वो शब्दों को तोड़ने मरोड़ने में उस्ताद हैं. वो ये दिखाने के लिए भी तत्पर रहते हैं कि वो दुनिया के बहुत बड़े जुगाड़ू नेता हैं.'

कृष्ण मेनन

इमेज स्रोत, Penguin Books

इमेज कैप्शन, व्हाइट हाउस में अमरीकी राष्ट्रपति आइज़नहावर, कृष्ण मेनन और जीएल मेहता

होमी भाभा को नापसंद करते थे मेनन

दिलचस्प बात ये है कि नेहरू के इतने क़रीब रहने के बावजूद मेनन की नेहरू के दूसरे नज़दीकी लोगों से नहीं बनती थी. नेहरू के ज़हन में जगह बनाने के लिए उनकी बहन विजयलक्ष्मी पंडित और कृष्ण मेनन के बीच ज़बर्दस्त प्रतिद्वंदिता हुआ करती थी.

नेहरू के एक और क़रीबी परमाणु वैज्ञानिक होमी भाभा के लिए भी मेनन के मन में कोई गर्मजोशी नहीं थी. भाभा की नज़र में मेनन कुछ ज़्यादा ही वामपंथी थे जबकि मेनन की राय थी कि भाभा हमेशा अमरीकियों को ख़ुश करने के प्रयास में रहते थे.

मेनन हमेशा परमाणु हथियारों के खिलाफ़ रहे. उनकी मौत से पाँच महीने पहले जब 18 मई, 1974 को भारत ने अपना पहला परमाणु परीक्षण किया था तो इंदिरा गांधी को अपने अस्पताल में बुला कर अपनी नाराज़गी व्यक्त की थी.

कृष्ण मेनन

इमेज स्रोत, Penguin Books

इमेज कैप्शन, परमाणु वैज्ञानिक होमी भाभा के साथ कृष्ण मेनन

वरिष्ठ फ़ौजी अफ़सरों से अनबन

मेनन के राजनीतिक जीवन का सबसे विवादास्पद क्षण तब आया जब 1959 में तत्कालीन सेनाध्यक्ष जनरल थिमैया से उनकी अनबन हो गई. ये अनबन इस हद तक बढ़ी कि थिमैया ने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया.

जयराम रमेश बताते हैं, 'उस समय के सभी वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों की ट्रेनिंग ब्रिटिश सेना में हुई थी. मेनन को ये चीज़ पसंद नहीं थी. हालांकि शुरुआत में कोई समस्या नहीं थी. उनको हर जगह से वाहवाही मिली. आज हमारे देश में हथियार बनाने के कारखाने हैं, टैंक और युद्धक विमान या विमानवाहक पोत बन रहे हैं, तो ये सब कृष्ण मेनन की वजह से है. लेकिन वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों के साथ उनका व्यवहार बहुत ख़राब हुआ करता था. सेना में पद की वरिष्ठता और अनुशासन का बहुत महत्व है. लेकिन मेनन का इससे दूर-दूर का वास्ता नहीं था. सीनियर अफ़सरों को उनके सामने जूनियर अफ़सरों से बात करने की मेनन की आदत अखरती थी. इसी वजह से थिमैया और मेनन के बीच दूरी बढ़ती चली गई.'

कृष्ण मेनन

इमेज स्रोत, Penguin Books

इमेज कैप्शन, तत्कालीन सेनाध्यक्ष जनरल थिमैया के साथ जवाहरलाल नेहरू और कृष्ण मेनन

जनरल थिमैया का इस्तीफ़ा

मैंने जयराम रमेश से पूछा कि थिमैया के इस्तीफ़ा देने के पीछे असली वजह क्या थी? जयराम रमेश का कहना था, 'दरअसल, एक बार जब थिमैया नेहरू से मिलने गए तो उन्होंने ऐसे ही उनसे पूछ लिया कि मंत्रालय में सब ठीक ठाक तो चल रहा है न? थिमैया ने मेनन के कामकाज पर अपनी निराशा व्यक्त की. नेहरू ने थिमैया से कहा कि वो इस बारे में मेनन से बात करेंगे जो उन्होंने बाद में की भी. इसके बाद आग बबूला मेनन ने थिमैया को बुला कर उन्हें बुरी तरह से डाँटा और उन पर मंत्री को बाईपास करते हुए नेहरू के पास सीधे जाने का आरोप लगाया. थिमैया ने बहुत सफ़ाई दी कि उन्होंने तो नेहरू के सवाल का जवाब भर दिया था. लेकिन मेनन पर इस दलील का कोई असर नहीं हुआ. मेनन के व्यवहार से क्षुब्ध हो कर थिमैया ने उसी वक्त इस्तीफ़ा देने का फ़ैसला कर लिया. जब ये ख़बर अख़बारों में छपी तो हाहाकार मच गया. अटलबिहारी वाजपेई और आचार्य कृपलानी जैसे साँसदों ने कृष्ण मेनन की जम कर आलोचना की.'

जनरल थिमैया ही नहीं सैम मानेक शॉ और पी सी लाल को भी कृष्ण मेनन के गुस्से का शिकार होना पड़ा. बाद में इन दोनों ने भारतीय सेना और वायु सेना का सफल नेतृत्व किया. मानेक शॉ से मेनन की शिकायत थी कि वो जो मुँह में आया बोल देते थे. उन्हें ये बात भी पसंद नहीं थी कि उन्होंने अपने दफ़्तर में रॉबर्ट क्लाइव और वॉरेन हैस्टिंग्स की तस्वीर लगा रखी थी.

सैम मानेक शॉ
इमेज कैप्शन, सैम मानेक शॉ भी कृष्ण मेनन के गुस्से का शिकार बने

क्या चीन से हार के ज़िम्मेदार मेनन थे ?

1962 में चीन से मिली हार का ठीकरा भी मेनन के सिर पर फोड़ गया. जयराम रमेश बताते हैं, 'उन्हें बलि का बकरा बनाया गया. उनका मानना था कि चीन से सीमा विवाद को बातचीत से हल करना चाहिए. दस साल तक वो यही बात कहते रहे. पंडितजी उनका समर्थन करते थे, लेकिन उनके मंत्रिमंडल के सदस्य गोविंद वल्लभ पंत इसके ख़िलाफ़ थे.''

''संसद मे भी अधिकतर लोग इसके ख़िलाफ़ थे. मीडिया में भी एक ऐसा माहौल पैदा हो गया था कि हम चीन के साथ बातचीत नहीं करेंगे. कृष्ण मेनन को 1962 के संदर्भ में एकमात्र खलनायक के रूप में देखना मेरी समझ में गलत है. ग़लतियाँ बहुत हुईं, सेना से हुई, राजनीतिक नेतृत्व से हुई, ग़लतियाँ संसद में भी हुईं क्योंकि वहाँ ऐसा माहौल बन गया कि चीन से बातचीत करना फ़िज़ूल है. चीन से पराजय एक सामूहिक ज़िम्मेदारी थी. किसी एक शख़्स की ज़िम्मेदारी नहीं थी.'

कृष्ण मेनन

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, तत्कालीन चीनी राष्ट्रपति के साथ कृष्ण मेनन

मेनन का इस्तीफ़ा

पूरे भारत में मेनन का इतना विरोध हुआ कि पंडितजी के न चाहने के बावजूद कृष्ण मेनन को अपने पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा. जयराम रमेश कहते हैं, 'इंदिरा गांधी राष्ट्रपति राधाकृष्णन के पास गईं और उनसे कहा कि मेरे पिता को कृष्ण मेनन से बचाइए. वो मेनन का इस्तीफ़ा लेने के लिए तैयार नहीं हैं. वो पिछले सात दिनों से उनका इस्तीफ़ा अपनी जेब में लिए घूम रहे हैं. आखिरी दिन सात नवंबर, 1962 को कांग्रेस संसदीय दल की सुबह 10 बजे बैठक हुई. उसमें महावीर त्यागी ने कहा, ' पंडितजी अगर आप कृष्ण मेनन से इस्तीफ़ा नहीं लेंगे तो आपको इस्तीफ़ा देना पड़ेगा.' उसी दिन चार बजे पंडितजी ने मेनन का इस्तीफ़ा स्वीकार कर लिया.'

कृष्ण मेनन

इमेज स्रोत, Getty Images

देवानंद से आख़िरी मुलाक़ात

इस्तीफ़े के बाद वो 1971 में सांसद बने लेकिन एक ज़माने में नेहरू के उत्तराधिकारी समझे जाने वाले कृष्ण मेनन का जलवा जाता रहा. अपनी मौत से कुछ दिन पहले वो मुंबई की यात्रा पर गए.

उनको नज़दीक से जानने वाले अभिनेता देवानंद अपनी आत्मकथा 'रोमाँसिंग विद लाइफ़' में लिखते हैं, ''एक दिन मैं अपने घर की खिड़की के पास खड़ा हुआ था. मैंने देखा कि नीचे गेट पर एक दुबला पतला बुज़ुर्ग शख़्स अपनी छड़ी से मेरे लकड़ी के गेट को खोलने की कोशिश कर रहा है. वो दक्षिण भारतीय स्टाइल में सफ़ेद रंग की धोती पहने हुए थे. इससे पहले कि मेरा चौकीदार उन्हें रोकने की कोशिश करता मैंने उन्हें पहचान लिया.''

देवानंद

इमेज स्रोत, JH THAKKER VIMAL THAKKER

मैं उनका स्वागत करने नीचे दौड़ा. उनके साथ कोई पुलिस या सेना की गाड़ी नहीं थी और न ही कोई अंगरक्षक था. मैंने उनका अभिवादन किया, लेकिन उन्होंने मुझे बीच में ही ये कहते हुए रोक दिया कि मैं तुम्हें डिस्टर्ब नहीं करना चाहता था. इस समय रात के साढ़े ग्यारह बज रहे हैं. मैंने कहा सर, आप अंदर क्यों नहीं आते?

मुझे पता है आप चाय के शौकीन है. मेरा रसोइया मिनटों में आपके लिए चाय बना देगा. लेकिन तभी पास खड़ी एक कार ने हॉर्न बजाया. मेनन ने कहा नहीं, अब विदा लेने का समय है. अपना ख़याल रखना. ये कह कर वो कार की तरफ़ बढ़ गए. कार के अंदर ड्राइवर सिगरेट पी रहा था. उसने उतर कर उस शख़्स के लिए कार का दरवाज़ा खोलना भी मुनासिब नहीं समझा जो एक ज़माने में भारत का रक्षा मंत्री हुआ करता था. ये मेरी कृष्ण मेनन से आख़िरी मुलाक़ात थी. कुछ दिनों बाद मैंने पढ़ा कि उनका देहावसान हो गया.'

कृष्ण मेनन

इमेज स्रोत, PENGUIN BOOKS

इसमें कोई संदेह नहीं कि कृष्ण मेनन ने प्रसिद्धि की सभी ऊँचाइयों को छुआ. साथ ही वो बदनामियों की सबसे नीची गहराइयों की तरफ़ भी गए.

उनके जितने प्रशंसक रहे, उतने ही आलोचक भी रहे. वॉल्ट व्हिटमैन की एक पंक्ति उन पर पूरी तरह से लागू होती है, ' आई एम लार्ज. आई कन्टेन मल्टीट्यूड्स' यानी मैं व्यापक हूँ और मुझमें बहुत कुछ समाहित है.

यह भी पढ़ें:

स्पोर्ट्स विमेन ऑफ़ द ईयर

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)