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शाहीन बाग़ के बाद भी क्या बीजेपी के लिए दिल्ली अभी दूर है?
- Author, सरोज सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
दिल्ली विधानसभा चुनाव के लिए कुछ घंटों में चुनाव प्रचार ख़त्म हो जाएगा. जैसे-जैसे मतदान की तारीख़ नज़दीक आ रही है, वैसे-वैसे -- आंतकवादी, शाहीन बाग़, गोली, फायरिंग, रेप, बिरयानी और हनुमान चालीसा --- जैसे शब्दों का इस्तेमाल ज़्यादा होता जा रहा है और बिजली, पानी, स्वास्थ्य सेवाएं, शिक्षा जैसे शब्दों का इस्तेमाल कम होता दिख रहा है.
साफ़ दिख रहा है कि चाहे बीजेपी हो या आम आदमी पार्टी हर कोई दूसरे दल को क्लीन बोल्ड करने की पूरी कोशिश में लगा है लेकिन किन पिचों पर दोनों पार्टियां अच्छा खेल सकती हैं आइए डालते हैं एक नज़र.
राष्ट्रवाद का मुद्दा
2019 के दिसंबर महीने में जब दिल्ली के शाहीन बाग़ में आम लोग सरकार के नागरिकता संशोधन क़ानून का विरोध करने बैठे थे, तब किसी को अंदाज़ा नहीं रहा होगा कि दिल्ली चुनाव में उनकी भूमिका इतनी अहम हो जाएगी.
जब आम आदमी पार्टी और दिल्ली के उप-मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने एक निजी टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में कहा कि वो शाहीन बाग़ में बैठे लोगों के साथ हैं, तो बीजेपी को जैसे बैठे-बिठाए एक मुद्दा मिल गया.
बीजेपी में दिल्ली के नेता हों या दूसरे राज्यों से आए स्टार प्रचारक, सबने एक सुर में पूरे चुनावी कैम्पेन को राष्ट्रवाद के नेरेटिव के इर्द-गिर्द बुनना शुरू कर दिया. फिर चाहे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का 'बिरयानी' वाला बयान हो, या फिर केन्द्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर का 'गोली मारो' वाला बयान हो, या फिर पश्चिमी दिल्ली के सांसद परवेश वर्मा का पहले 'घर में घुसकर रेप करने वाला' बयान.
परवेश वर्मा ने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को 'आतंकवादी' कह डाला, उसके बाद परवेश वर्मा के बयान को केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने भी सही ठहरा दिया.
सेंटर फ़ॉर स्टडी ऑफ़ डेवलपिंग सोसाइटीज़ (सीएसडीएस) के संजय कुमार के अनुसार भाजपा के पास इसके आलावा कोई दूसरा विकल्प ही नहीं था.
बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "वो दिल्ली की सत्ता से पिछले 20 साल से बाहर हैं. ऐसे में उनके पास अपना काम दिखाने के लिए कुछ है नहीं और शाहीन बाग़ ने उनको बैठे बिठाए एक मुद्दा दे दिया है."
यही वजह है कि बीजेपी के नेता केजरीवाल को बार-बार ललकार रहे हैं कि वे शाहीन बाग़ क्यों नहीं जाते, केजरीवाल अगर शाहीन बाग़ जाते तो बीजेपी का काम आसान हो जाता.
बीजेपी केजरीवाल को हिंदू विरोधी, राष्ट्र विरोधी और मुसलमान परस्त साबित करने का अभियान चला सकती थी. लेकिन केजरीवाल ऐसा करने की जगह, बीजेपी पर आरोप लगा रहे हैं कि वह जान-बूझकर प्रदर्शनकारियों को नहीं हटा रही है ताकि धरने का राजनीतिक इस्तेमाल किया जा सके.
आम आदमी पार्टी के दावों की पोल खोल
झारखंड हो, हरियाणा हो या फिर महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव, तीनों ही राज्यों में बीजेपी ने राष्ट्रवाद के मुद्दे पर चुनाव लड़ा और प्रदर्शन उनके मन मुताबिक़ नहीं आया. झारखंड और महाराष्ट्र में सत्ता उसके हाथ से निकल गई, हरियाणा में किसी तरह दुष्यंत चौटाला की मदद से पार्टी सरकार बना सकी.
तो क्या राष्ट्रवाद की राजनीति दूसरे राज्यों के विधानसभा चुनावों में फेल हो गई?
इस सवाल के जवाब में संजय कुमार कहते हैं, "एक दूसरी रणनीति हो सकती थी, आम आदमी पार्टी के पिच पर जाकर खेलने की. जिसमें वो आम आदमी पार्टी के दावों की पोल खोल सकते थे. कुछ हद तक उन्होंने इसकी कोशिश भी की."
गृह मंत्री अमित शाह हों या सांसद गौतम गंभीर हों, या फिर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे पी नड्डा हों, ट्विटर पर इनकी टाइमलाइन देखने पर आपको इसका अहसास भी होगा.
चाहे शिक्षा के क्षेत्र में क्लासरूम बनाने का दावा हो या फिर मोहल्ला क्लीनिक बनाने का दावा, बीजेपी के स्थानीय नेता हों या फिर राज्यसभा या लोकसभा के नेता, सबने आम आदमी पार्टी के दावों की पोल खलने की पूरी कोशिश की.
जब भी ऐसे वीडियो बीजेपी के किसी बड़े नेता ने पोस्ट किया आम आदमी पार्टी की सोशल मीडिया टीम उतनी ही तेज़ी से इसका खंडन करती नज़र आई.
एक बार फिर मोदी ही बने चेहरा
मदनलाल खुराना, साहेब सिंह वर्मा, विजय कुमार मल्होत्रा, और डॉक्टर हर्षवर्धन. ये पांच अब तक दिल्ली बीजेपी के पांच प्रमुख चेहरे रहे हैं.
साल 2015 के विधानसभा चुनाव में आख़िरी कुछ दिनों में मुख्यमंत्री पद के लिए किरण बेदी के नाम का एलान किया था. बीजेपी के कई बड़े नेताओं को आज भी लगता है कि ये पिछले चुनाव में बीजेपी के हार की सबसे बड़ी भूल थी.
पार्टी ने इस भूल को सुधाराते हुए इस पर मोदी के चेहरे पर चुनाव लड़ने का फ़ैसला किया है. लेकिन आम आदमी पार्टी ने पूरी कोशिश की है बीजेपी पर मुख्यमंत्री के नाम का एलान करने का दवाब बनाए. हालांकि अमित शाह ने अब तक इस मामले में पत्ते नहीं खोले हैं.
कुछ समय पहले तक बीजेपी के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी के नाम को लेकर अटकलें चल रही थीं, लेकिन जब बीजेपी के स्टार प्रचारकों की लिस्ट में उनका नाम 24वें नंबर पर आया तो साफ़ हो गया कि पार्टी उन्हें सीएम पद के दावेदार के तौर पर नहीं देख रही है.
उसके बाद एलान कर दिया गया कि दिल्ली की जनता ही उनका मुख्यमंत्री पद का चेहरा है. बीजेपी के राजनीति को करीब से समझने वाले कहते हैं ये उनकी चुनावी रणनीति का सबसे बड़ा हिस्सा है. अगर मुख्यमंत्री पद के नाम का एलान पहले से कर दिया जाए, तो पार्टी में गुटबाज़ी का ख़तरा हो सकता है, जैसा किरण बेदी के समय हुआ.
हालांकि संजय कुमार इससे इत्तेफ़ाक नहीं रखते, उनके मुताबिक़ मोदी के नाम पर चुनाव लड़ना पार्टी की च्वाईस कम और मजबूरी ज्यादा है.
भाजपा का संगठित वोट बैंक
2015 में दिल्ली विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को तीन सीटें मिली थी. बावजूद इसके दिल्ली में उनका वोट शेयर करीब 32 फ़ीसदी रहा था.
दिल्ली के इतिहास में हाल के दिनों में ये बीजेपी का सबसे ख़राब प्रदर्शन था. पिछले पांच चुनावों के आंकड़े देखे तो बीजेपी को हमेशा 32 से 34 फ़ीसदी वोट मिले हैं. इस आधार पर ये कहना ग़लत नहीं होगा की दिल्ली में बीजेपी का कोर वोटर हमेशा उसको वोट करता ही है.
लोकसभा चुनाव में ये वोट सीटों में तब्दील हो जाते हैं लेकिन विधानसभा चुनाव में ऐसा नहीं हो पाता. इस बार बीजेपी की कोशिश रहेगी कि वो इस कोर वोट को सीटों में बदल सके.
सीएसडीएस के संजय कुमार कहते हैं, "इस चुनाव में बीजेपी को केवल अपने कोर वोट के सहारे रहने से काम नहीं बनेगा. उसको दो और बातों का ख़याल रखना होगा. पहला ये कि दिल्ली का मुक़ाबला दो पार्टियों के बीच का न रह जाए क्योंकि ऐसा होना आम आदमी पार्टी के पक्ष में रहेगा. और दूसरा उनके जो पक्के वोटर हैं वो बिखरे हुए न हों."
दूसरा मामला है वोटों के बिखराव का. भारतीय जनता पार्टी के रणनीतिकार इस बार पर भी ज़ोर दे रहे हैं कि 32-34 फ़ीसदी वाला उनका कोर वोटर एकमुश्त होकर हर विधानसभा में वोट करे.
संजय कुमार के मुताबिक़ 2015 के आंकड़ों के आधार पर इसे और बेहतर समझा जा सकता है. जब बीजेपी को 3 सीट पर जीत मिली थी और वोट शेयर 32 फीसदी था, उस वक्त आम आदमी पार्टी का वोट शेयर 54 फ़ीसदी था. दोनों के बीच तकरीबन 22 फीसदी के वोट शेयर का अंतर था. इस बार भी भाजपा के साथ ऐसा हुआ तो बात बिगड़ सकती है.
केंद्र सरकार की योजनाओं का लाभ
मंगलवार को दिल्ली के द्वारका में रैली के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, "केंद्र सरकार की बहुत-सी योजनाओं को लागू करने से पहले ही राज्य सरकार ने इनकार कर दिया. दिल्ली की ग़रीबों का क्या गुनाह है कि पांच लाख तक मुफ्त इलाज की सुविधा देने वाली आयुष्मान योजना का लाभ नहीं मिल पा रहा है?"
दिल्ली में केजरीवाल सरकार ने आयुष्मान योजना को लागू क्यों नहीं किया, बीजेपी ने इसे एक चुनावी मुद्दा बनाने की पूरी कोशिश की. बीजेपी ने इस बार इसे अपने चुनावी घोषाणा पत्र में शामिल भी किया.
केंद्र सरकार की दूसरी स्कीम जिससे लोकसभा चुनाव में अच्छा असर देखने को मिला वो है उज्ज्वला योजना. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक दिल्ली में उज्ज्वला योजना के 77000 कनेक्शन ही मिले. राज्यों में दिल्ली में उज्ज्वला स्कीम के लाभार्थी सबसे कम हैं, ऐसा केन्द्र सरकार का दावा है.
जानकारों की मानें तो दिल्ली का ये विधानसभा चुनाव न सिर्फ़ अमित शाह के लिए प्रतिष्ठा का सवाल है, बल्कि पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा के लिए भी है. राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने जाने के बाद ये उनकी पहली परीक्षा है.
इन सबके उलट आम आदमी पार्टी मुद्दों के नाम पर अपना रिपोर्ट कार्ड लेकर घर-घर घूम रही है. राष्ट्रवाद के मुद्दे पर उन्होंने फूंक-फूंक कर कदम रखना शुरू किया है. वो सिर्फ़ बीजेपी के हमलों का जवाब दे रही है. ख़ुद से सेल्फ़ गोल करने से बच रही है.
राष्ट्रवाद केवल बीजेपी का मुद्दा नहीं है, अरविंद केजरीवाल ख़ुद को पक्का देशभक्त बताते हैं, वे टीवी चैनलों पर कह रहे हैं कि उनकी पार्टी की एकमात्र देशभक्त पार्टी है, उन्होंने पार्टी के मेनिफेस्टो में दिल्ली के सरकारी स्कूलों में देशभक्ति का पाठ्यक्रम शुरू करने की बात की है. यह केजरीवाल की बीजेपी की राष्ट्रवादी रणनीति की काट करने की कोशिश है.
आम आदमी पार्टी के तरकश के तीर
आम आदमी पार्टी के पास अरविंद केजरीवाल के रूप में एक चेहरा भी है, जिसका अच्छा ट्रैक रिकॉड दिखाकर अगले पांच साल उन्हीं को देने की बात वो सामने रख रहे हैं.
उनको उम्मीद है कि जनता उनको पांच साल के काम पर वोट देगी. 200 यूनिट मुफ्त़ बिजली, 20,000 लीटर मुफ्त पानी, 400 के करीब नए मोहल्ला क्लीनिक, महिलाओं को मुफ्त़ बस सेवा, हर सभा में उनके नेता इसी को गिना रहे हैं. उनको लगता है कि इन्हीं मुद्दों के सहारे वो अपना पिछला प्रदर्शन दोहरा पाएंगे.
पार्टी ने टीवी शो और डिबेट में हिस्सा लेने के लिए संजय सिंह को छोड़ दिया है. अरविंद केजरीवाल रोड शो और साक्षात्कार के सहारे भी अपनी बात जनता तक रख रहे हैं. उनकी पत्नी और बेटी ने आगे बढ़ कर उनके विधानसभा क्षेत्र में प्रचार का काम संभाला है. बाकी पार्टी के हर उम्मीदवार को अपने-अपने विधानसभा क्षेत्रों पर ध्यान देने के निर्देश हैं. यही वजह है कि पार्टी की प्रेस कॉन्फ्रेंस में आपको आतिशी, दिलीप पांडे और गोपाल राय कम ही दिखते हैं.
वैसे ये तो 11 फ़रवरी को ही पता चलेगा कि दिल्ली की जनता ने भाजपा के दांव-पेंच का सम्मान किया या फिर आप की रणनीति का.
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