कश्मीर: जहां दिहाड़ी मज़दूरी करने के लिए मजबूर है पत्रकार

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- Author, प्रियंका दुबे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, कश्मीर घाटी से लौटकर
भारत प्रशासित कश्मीर के अनंतनाग ज़िले में यह एक बर्फ़बारी से भरा दिन है. राजधानी श्रीनगर से तक़रीबन 60 किलोमीटर दूर,अनंतनाग शहर के लाल चौक पर हमारी मुलाक़ात होती है 29 वर्षीय मुनीब-उल-इस्लाम से.
फिरन के आम कश्मीरी पहनावे से इतर, मुनीब मोटे कार्गो पैंट्स और ऊनी टोपी में मुस्तैद खड़े हैं और बीते 7 सालों से दक्षिण कश्मीर में बतौर फ़ोटो जर्नलिस्ट काम कर रहे थे. लेकिन अनुछेद 370 हटने के बाद पिछले 6 महीनों से उनका काम लगभग बंद हो गया है. पर एक फ़ोटो जर्नलिस्ट की तरह मज़बूत ग्रिप वाले जूतों और फ़ील्ड के कपड़ों में मुस्तैदी से तैयार रहने की उनकी पुरानी आदत आज भी क़ायम है.
किनारों पर बर्फ़ से ढकी कीचड़ भरी गलियों से होते हुए मुनीब हमें बाज़ार के आख़िरी छोर पर बने एक दुकान नुमा दफ़्तर में ले जाते हैं.
दफ़्तर में उर्दू भाषा के एक दैनिक अख़बार में लिखने वाले उनके मित्र अपने लैपटॉप पर कुछ लिख रहे हैं. हमें देखते ही बोले, "लिखने का भी क्या फ़ायदा? भेज कहाँ पाउँगा? यह कम्प्यूटर भी सारे बिना इंटरनेट के सिर्फ़ बंद मशीनों से लगते हैं."
बातचीत शुरू होने से पहले ही कमरे में अवसाद की एक छाया पसर जाती है. कश्मीर घाटी में काम कर रहे पत्रकारों की स्थिति पर आगे की बातचीत के दौरान यह तनाव गहराता ही गया.

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300 पत्रकारों की हालत एक जैसी
एक सक्रिय पेशेवर फ़ोटो जर्नलिस्ट से दिहाड़ी मज़दूरी करने पर मजबूर हो जाने तक की अपनी यात्रा के बारे में बताते हुए मुनीब उदासी में डूब जाते है. हालांकि पेशे में अपने शुरुआती दिनों को याद करके आज भी उनकी आँखों में चमक आ जाती है.
मुनीब कहते हैं, "मैं अपने लोगों के लिए कुछ करने से जज़्बे और इस पेशे के लिए अपने जुनून की वजह से पत्रकारिता में आया था. 2012 में मैंने अनंतनाग में बतौर फ़्रीलांसर अपनी शुरुआत की. फिर 2013 में डेली रौशनी और 'कश्मीर इमेजस' में काम किया और इसके बाद 'कश्मीर रीडर' के लिए भी तस्वीरें खींची."
"2015 से मैंने दोबारा फ़्रीलांस काम करना शुरू किया, इस बार क्विंट, टेलीग्राफ़, द गार्जियन, थोमसेन रॉयटर्स ट्रस्ट और वॉशिंगटन पोस्ट तक में मेरी तस्वीरें प्रकाशित हुईं. 2012 से लेकर अगस्त 2019 तक मैंने अनंतनाग और आसपास के दक्षिण कश्मीर के इलाक़े को ख़ूब कवर किया... तस्वीरें भी बहुत छपीं... लेकिन अनुछेद 370 के ख़त्म होने के बाद से सब बंद है."
5 अगस्त को घाटी में इंटरनेट के प्रतिबंधित हो जाने के बाद से कमोबेश यही हालत कश्मीर घाटी में मौजूद तक़रीबन 300 पत्रकारों की है.
370 के हटने के बाद का वक़्त याद करते हुए मुनीब बताते हैं, "4 अगस्त को पूरा अनंतनाग बंद था. फिर 5 को किसी तरह कोशिश करके मैं कलेक्ट्रेट तक पहुँचा... तो देखता हूँ कि दूध बेचने वालों तक को कर्फ़्यू पास बांटे जा रहे थे लेकिन हमें नहीं दिए गए. प्रशासन ने हमें कर्फ़्यू पास देने से साफ़ इंकार कर दिया.. फिर क्या करते, कई दिनों तक ऐसे ही बैठे रहे."

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अनुछेद 370 का हटना भारत के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय पत्रकारों के लिए भी राजनीतिक और सामरिक तौर पर महत्वपूर्ण घटना थी. ऐसे में गृह राज्य होने के बावजूद रिपोर्ट न कर पाने की वेदना आज भी मुनीब के चेहरे पर साफ़ देखी जा सकती है.
सितम्बर में फ़ोन लाइनें चालू होने के बाद उन्होंने फिर से एक स्टोरी करने की कोशिश तो की लेकिन उसमें कमाई से ज़्यादा निवेश करना पड़ा.
वो कहते हैं, "मैंने दिल्ली की एक न्यूज़ वेबसाइट के लिए अखरोट उगाने वाले किसानों पर 370 के हटने के प्रभाव पर स्टोरी करने का प्रस्ताव भेजा. उन्हें पसंद आया और स्टोरी कमीशन भी हो गयी. लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में मुझे उन्हें मेल करने के लिए दो बार श्रीनगर जाना पड़ा. अपनी गाड़ी में तेल डालना, श्रीनगर आना जाना.. सब मिलाकर 5-6 हज़ार का ख़र्च बैठ गया. इतना पैसा तो कहानी छपने के बाद मिलना ही नहीं था. इतना नुक़सान होने के बाद मैं चुप बैठ गया."

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मजबूरी में करनी पड़ी मज़दूरी
चार महीने के फ़ाके के बाद दिसम्बर महीने से मुनीब ने धीरे-धीरे दोबारा काम शुरू किया. लेकिन इन चार महीनों में काम और आय की ना-मौजूदगी ने उनकी आर्थिक रीढ़ को तोड़ दिया. यहां तक की कैमरा उठाने वाले अपने हाथों से मुनीब को गारा-मिट्टी उठाकर मज़दूरी करनी पड़ी.
संघर्ष के उन दिनों के बारे में बात करते हुए वो हाथ जोड़ते हैं, "अभी पिछले साल ही मेरी शादी हुई है. घर का ख़र्च तो वैसे भी मेरा छोटा भाई ही चला रहा है... लेकिन बीमार पत्नी के इलाज के लिए तो उनसे पैसे नहीं मांग सकता था. कुछ समझ नहीं आ रहा था और पैसों की तंगी बढ़ती ही जा रही थी तो फिर मैंने मज़दूरी शुरू कर दी."
"कैमरा घर में पड़ा रहता था.. और मैं पास बन रही एक इमारत में एक कन्स्ट्रक्शन लेबर की तरह काम करने लगा. दिनभर मज़दूरी करने के बाद 500 रुपये मिलते. उस वक़्त मेरे दिमाग़ में सिर्फ़ एक बात आती थी - किसी भी तरह पैसे कमाकर पत्नी की दवाई का इंतज़ाम करना है."

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मुनीब की ही तरह, अनंतनाग में काम करने वाले पत्रकार रूबायत ख़ान ने पत्रकारिता छोड़ दी है. अब राज्य के 'उद्यमिता विकास संस्थान' में डेरी फ़ार्म शुरू करने का प्रशिक्षण ले रहे रूबायत घाटी में पत्रकारों की स्थिति से गहरे दुखी हैं.
शहर से कुछ दूरी पर मौजूद एक भवन निर्माण स्थल पर हुई बातचीत में वो कहते हैं, "यहां काम करने का मतलब सिर्फ़ खोना ही खोना है. पहले से भी मुसीबतें कुछ कम नहीं थीं जो अब इंटरनेट भी बंद हो गया. कश्मीर एक कॉन्फ़्लिक्ट ज़ोन है. यहां रिपोर्टिंग करते वक़्त हर पल मौत का ख़तरा रहता है. मैंने 4 साल तक कुलगम और अनंतनाग से जितनी भी रिपोर्टिंग की, उसके दौरान अपनी आँखों के सामने कितने ही लोगों को मरते देखा."
"तनख़्वाह भी इतनी कम मिलती थी और इतना कुछ होने सहने के भी कई बार आमलोग हमें सरकार का एजेंट समझ लेते थे. कोई इज़्ज़त नहीं है यहां पत्रकारों की... इसलिए मैंने रिपोर्टिंग का काम छोड़ दिया. हालांकि पत्रकारिता को लेकर जुनून आज भी बहुत है मुझमें... लेकिन अब और नहीं होता."
इंटरनेट इस्तेमाल करने की वजह बतानी होती है
दिसम्बर 2019 से ज़िले के राष्ट्रीय सूचना केन्द्र या एनआइसी पर कुछ कम्प्यूटरों के साथ सीमित इंटरनेट की व्यवस्था तो की गयी लेकिन उससे भी मुनीब और रूबायत जैसे स्थानीय पत्रकारों की तकलीफ़ों में कोई कमी नहीं आयी.

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एनआइसी की दिक्कतों के बारे में मुनीब बताते हैं, "पहले तो यह समझना होगा कि श्रीनगर के मीडिया सेंटर की तरह यह सेंटर सिर्फ़ पत्रकारों के लिए नहीं है. सिर्फ़ 4 कंप्यूटर हैं और उस पर ज़िले का सारा सरकारी काम होता है, लोग अपनी नौकरियों का आवेदन और छात्र अपने दाख़िले के फ़ॉर्म भी यहीं से भरते हैं. इसलिए यहां हमेशा बहुत भीड़ होती है. स्पीड इतनी कम है कि हम जीमेल के अलावा कुछ भी नहीं खोल पाते.. यहां तक की अपना छपा काम तक नहीं देख पाते."
इन सब बातों के अलावा एनआइसी से अपनी स्टोरी या तस्वीरें भेजना पत्रकारों के लिए इसलिए भी मुश्किल है क्योंकि यहां उनकी सम्पादकीय स्वतंत्रता प्रभावित होने का भी ख़तरा है.
रूबायत कहते हैं, "वहां हमें यह दिखाना और बताना पड़ता है की हम कौन सी तस्वीरें अख़बार को भेज रहे हैं और क्यों. इसके बाद भी कई बार इंटरनेट मिलने में मुश्किल होती है."
कहानी लिखने वाला ख़ुद बन गया कहानी
बर्फ़ से ढका अनंतनाग का मेहंदी पुल और उससे आगे पड़ने वाले बर्फ़ीले खेत पार करते हुए हम शहर से 20 किलोमीटर दूर स्थित कुलगाम ज़िले आ पहुंचे हैं. यहां मुख्य बाज़ार से कटकर निकलती एक पतली गली में मौजूद एक बदरंग मकान में हमारी मुलाक़ात क़ासिम और रफ़ीक से होती है.
कुलगाम में काम कर रहे स्थानीय पत्रकारों की स्थिति भी घाटी के बाक़ी जिलों से अलग नहीं है. बीते पांच सालों के दौरान कई समचार पत्रों और टीवी चैनलों के लिए कुलगाम से रिपोर्टिंग कर चुके क़ासिम के पास आज अपनी मोटरसाइकिल में पेट्रोल भरवाने तक के पैसे नहीं हैं.

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बीबीसी से बातचीत में वो कहते हैं, "पिछले 6 महीनों से काम पूरी तरह बंद है. हालांकि फ़ोन लाइनें खुलने के बाद मैंने एक-दो बार ख़बरें फ़ोन पर बताकर लिखवाने की कोशिश की... लेकिन किस दफ़्तर में लोगों के पास आज इतनी फ़ुर्सत होती है? अपनी ख़बर तो ख़ुद ही लिखकर भेजनी पड़ती है.. लेकिन भेजें कैसे? इंटरनेट के नहीं होने से हमारे हाथ बंधे हुए हैं."
साथ ही बैठे रफ़ीक पत्रकारों से आम लोगों से टूटते सामुदायिक रिश्तों की ओर इशारा करते हुए कहते हैं, "ठीक है - हम 370 पर कुछ नहीं लिखेंगे... लेकिन बाक़ी ख़बरें तो कम से कम हमें फ़ाइल करने दी जाएँ! जैसे बर्फ़बारी की वजह से हाइवे का बंद होना, सेब की फ़सल का बर्बाद होना, अखरोट और बाक़ी व्यपार ठप्प होना... कितन कुछ है जो बाहर लोगों तक नहीं पहुंच रहा. लेकिन हम कुछ भी नहीं लिख पा रहे हैं क्योंकि इंटरनेट नहीं है."
"ऐसे में कौन सा दफ़्तर इतने महीने हमें नौकरी पर रखेगा? काम नहीं करने का जो नुक़सान रुपए पैसे से होता है वो तो है ही... उससे इतर अपने लोगों के बीच सालों की मेहनत से बनाए गए हमारे संबंध ख़राब होते हैं. एक पत्रकार की पूँजी आम लोगों के साथ उसका संवाद ही है. और लंबे समय से फ़ील्ड पर काम न कर पाने की वजह से हमारा लोगों से यह संवाद टूटने की कगार पर है."
न्यूयॉर्क की जानकारी लेकिन सोपोर का पता नहीं
कुलगाम से 70 किलोमीटर दूर, राजधानी श्रीनगर में अंग्रेज़ी दैनिक 'कश्मीर इमेजेस' के संस्थापक सम्पादक बशीर मंज़र बताते हैं कि वो बीते 6 महीनों से सिर्फ़ 'नाम' के लिए अख़बार छाप रहे हैं.

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बशीर मंज़र कहते हैं, "अख़बार का लाइसेंस ज़िंदा रखने के लिए हर महीने निश्चित प्रतियां छापना ज़रूरी होता है इसलिए छापना पड़ रहा है नहीं तो बाक़ी के स्टाफ़ की नौकरियां भी ख़तरे में आ जाएँगी. लेकिन इंटरनेट के बंद होने के तुरंत बाद मैंने एक संपादकीय लिखकर जनता को सूचित किया था कि आगे आने वाले दिनों में हम घटनाओं को लेकर उतने ही अनभिज्ञ रहने वाले हैं जितने की वो."
"हमारे अख़बार के लिए लिखने वाले सभी लोग- जो राजनीति, अर्थव्यवस्था और व्यापार जैसे तमाम विषयों पर लिखते थे - वह अपने लेख भेज नहीं पा रहे हैं. पाठक ऑनलाइन अख़बार पढ़ नहीं पा रहे हैं... हमारे रिपोर्टर ज़िलों से अपनी ख़बरें नहीं भेज पा रहे हैं... टीवी के ज़रिए आज मुझे इस बात की जानकारी है कि न्यूयॉर्क में क्या हो रहा है लेकिन मेरे पड़ोस में सोपोर में क्या हो रहा है, यह नहीं मालूम. अब ऐसे में अख़बार कैसे निकलेगा?"
घाटी में प्रतिबंधित इंटरनेट को अंततः देश में लोकतंत्र के लिए हानिकारक बताते हुए बशीर कहते हैं, "हमारे आस-पास क्या हो रहा है यह जान पाने का अधिकार जागरूकता लाने के साथ-साथ लोकतंत्र को भी मज़बूत करता है. 6 महीने से घाटी में इंटरनेट बंद होने का बुरा असर आख़िरकार लोकतंत्र पर ही नज़र आएगा."
इंटरनेट सेवाएं बहाल करने की फ़रियादें रहीं नाकाम :
अपने अख़बार के लिए ब्रॉडबैंड सेवा शुरू करने की माँग के बारे में बताते हुए बशीर जोड़ते हैं, "कम से कम अख़बार के दफ़्तरों में ब्रॉडबैंड सेवा ही बहाल कर दी जाती. ब्रॉडबैंड की लाइन पर तो आसानी से निगरानी भी रखी जा सकती है जिसके लिए हम तैयार भी हैं. इस संबंध में हमने कश्मीर में सक्रिय पत्रकारों के संगठन के साथ मिलकर कितनी ही बार सरकार को आवेदन दिए, निवेदन किए उनके सामने... लेकिन आज तक कोई सुनवाई नहीं हुई."
इस संबंध में सरकार का पक्ष जानने के लिए बीबीसी ने राज्य सरकार के आधिकारिक प्रवक्ता और प्रमुख सचिव स्तर के सभी उच्च अधिकारियों को विस्तृत सवाल भेजे, लेकिन एक हफ़्ते बाद भी कोई जवाब नहीं आया है.
राजधानी श्रीनगर के मीडिया सेंटर में घाटी के तक़रीबन 300 पत्रकारों के लिए आज भी दो दर्जन से भी कम कंप्यूटर हैं. कभी मरियल स्पीड तो कभी भीड़ से जूझते रिपोर्टर यहां अक्सर वाई-फ़ाई पासवर्ड की भीख सी माँगते नज़र आ जाते हैं.
लेकिन राजधानी के बाहर ज़िलों में काम करने वाले पत्रकारों की स्थिति कॉन्फ़्लिक्ट ज़ोन के हाशिए पर खड़े उस पत्रकार जैसी है जिसकी ज़िंदगी दो धारी नहीं बल्कि तीन-तीन तेज़ तलवारों पर एक साथ खड़ा रहता है.
कश्मीर घाटी के इस कॉन्फ़्लिक्ट ज़ोन में काम करने के अपने अनुभव के बारे में रफ़ीक बताते हैं, "मिलिटेंटो को लगता है कि हम सरकार के मुख़बिर हैं, फ़ौज को लगता है कि हम मिलिटेंटों के मुख़बिर हैं. जनता भी अपनी संवेदना के हिसाब से हमें तौलती परखती और नकारती रहती है. मसलन अगर उनका झुकाव फ़ौज की तरफ है तो उन्हें लगेगा कि हम चरमपंथियों के लिए ख़बर लिख रहे हैं."
"दफ़्तर न हमारा साथ देता है और न ही पैसे. रोज़ जब घर से निकलते हैं तो मालूम नहीं होता की वापस आएँगे भी या नहीं. ऐसे में इतनी मुश्किलों के बाद भी हम यह काम इसलिए करते हैं क्योंकि हमारे अंदर सच के लिए जुनून है. और अब इंटरनेट बंद करके वो एक जूनून भी हमसे छीन लिया गया है"
रफ़ीक की भीतर की घुटन अब जैसे उनके चेहरे पर उतर आयी है. यही घुटन घाटी के हर पत्रकार के चेहरे पर महसूस की जा सकती है. 6 महीने लम्बे इंटरनेट प्रतिबंध ने यहां के पत्रकारों से उनका जज़्बा और जुनून छीन लिया है. वापस दिल्ली की तरफ़ मुड़ते हुए मुझे लगा जैसे बाहर पड़ती बर्फ़ ने शहर के साथ-साथ कीबोर्ड पर बजने वाली पत्रकारों की उँगलियों को भी जाम कर दिया हो.
(लोगों की सुरक्षा के लिहाज़ से कुछ नाम बदल दिए गए हैं)

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