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कुणाल कामरा पर अर्नब मामले में लगा बैन नियमों के हिसाब से ठीक है?
इंडिगो की फ़्लाइट में कॉमेडियन कुणाल कामरा ने टीवी पत्रकार अर्नब गोस्वामी के साथ जैसा बर्ताव किया, उस बारे में सोशल मीडिया पर चर्चा हो रही है.
जिस तरह अर्नब को निशाना बनाते हुए कुणाल कामरा ने उनसे सवाल पूछे, फ़्लाइट में उनका वीडियो बनाया, उसकी काफ़ी लोगों ने आलोचना की है और उसे 'कुणाल की मुँहज़ोरी' बताया है.
वहीं बहुत से लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने अर्नब गोस्वामी के टीवी चैनल 'रिपब्लिक' का एक वीडियो शेयर किया हैं जिसमें उनकी रिपोर्टर आरजेडी नेता तेजस्वी यादव से फ़्लाइट में उसी तरह सवाल पूछे जा रही हैं, जैसे कुणाल अर्नब से पूछ रहे थे.
इस पुराने वीडियो के आधार पर कई लोग कुणाल कामरा का बचाव कर रहे हैं.
मंगलवार शाम को 'कुणाल-अर्नब का वीडियो' सामने आने के बाद 'इंडिगो एयरलाइंस' के साथ-साथ सरकारी विमान कंपनी 'एयर इंडिया' ने भी कुणाल कामरा के अपने विमानों में यात्रा करने पर छह महीने की रोक लगा दी थी. स्पाइसजेट और गो एयर ने भी कुणाल पर पाबंदी लगाई है.
लेकिन सवाल उठता है कि किसी विमान कंपनी के एक यात्री पर इस किस्म के बैन के बारे में, नियम-क़ानून क्या कहते हैं?
भारत में विमान कंपनियाँ नागरिक उड्डयन मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले नागरिक उड्डयन महानिदेशालय यानी डीजीसीए के बनाए नियमों के अनुसार काम करती हैं.
मंगलवार को नागरिक उड्डयन मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने ख़ुद ट्वीट कर कुणाल कामरा के व्यवहार को 'भड़काने वाला' बताया था और अन्य विमान कंपनियों से भी उनपर बैन लगाने की बात कही थी. एक वजह तो ये है कि कुणाल के मामले में तेज़ी से कार्रवाई हुई.
डीजीसीए के अनुसार अगर कोई यात्री विमान में किसी अन्य यात्री से मारपीट करता है, उसे धमकाता है या डांटता है, तो एयरक्राफ़्ट रूल-161 के तहत उसे एक साल जेल की सज़ा तक हो सकती है.
डीजीसीए के अनुसार अगर ऐसी कोई घटना विमान के पायलट या फिर चालक दल के किसी सदस्य के साथ होती है, तो इसे अधिक सख़्ती से लिया जाएगा.
पुराना मामला...
लेकिन डीजीसीए के दिशा-निर्देशों के अनुसार 'कुणाल ने उड़ान के दौरान वीडियो बनाकर नियमों का उल्लंघन किया' क्योंकि उड़ान के दौरान किसी की निजता का हनन करना, वीडियो बनाना या उनकी असुविधा का कारण बनना नियमों का उल्लंघन समझा जाता है.
हालांकि इन्हीं नियमों के तहत बीजेपी सांसद प्रज्ञा ठाकुर के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं हुई थी जिनपर फ़्लाइट को क़रीब एक घंटा लेट करवाने का आरोप लगा था.
डीजीसीए के मुताबिक़ अगर कोई यात्री हवाई अड्डे पर खड़े विमान में इन नियमों का उल्लंघन करता है, ख़ासकर चालक दल के किसी सदस्य या पायलट के साथ, तो उनकी शिक़ायत पर यात्री को गिरफ़्तार भी किया जा सकता है.
मार्च 2017 में इसी तरह का मामला सामने आया था, जब एयर इंडिया के एक कर्मचारी पर चप्पल से हमला करने के आरोप में शिवसेना के सांसद रवींद्र गायकवाड़ पर फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडियन एयरलाइंस (एफ़आईए) ने प्रतिबंध लगा दिया था.
फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडियन एयरलाइंस में इंडिगो, स्पाइस जेट और गो एयर शामिल हैं.
तब एयर इंडिया और एफ़आईए के सदस्यों ने सरकार से यह अपील की थी कि 'विमान में बदतमीज़ी करने वालों के ख़िलाफ़ और भी स्पष्ट नियम क़ानून बनाए जाएं और उनकी सज़ा क्या हो, यह भी स्पष्ट होना चाहिए'.
सितंबर 2017 में विमान कंपनियों से विमर्श के बाद नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने 'हंगामा करने वाले' यात्रियों के लिए कुछ नए नियम बनाए थे. साथ ही ऐसे यात्रियों की एक 'नेशनल लिस्ट' बनाए जाने की बात कही थी.
'यात्रियों की सुरक्षा के लिए...'
तत्कालीन नागरिक उड्डयन मंत्री (राज्य प्रभार) जयंत सिन्हा ने कहा था कि 'यात्रियों और चालक दल समेत विमान की सुरक्षा को ध्यान में रखकर ये नियम बनाए गए हैं. पासपोर्ट नंबर या फिर आधार नंबर से ऐसे यात्रियों की पहचान की जाएगी और उनकी एक लिस्ट बनेगी ताकि बवाल करने वाले यात्री किसी भी विमान में यात्रा ना कर सकें'.
'राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय, दोनों तरह की सेवाएं देने वाली विमान कंपनियाँ यह लिस्ट इस्तेमाल कर सकेंगी'.
सरकार ने इन नियमों को तीन श्रेणियों में बाँटा हुआ है.
- पहली श्रेणी में 'मौखिक दुर्व्यवहार' को रखा गया है जिसके लिए यात्री पर तीन महीने तक का ट्रैवल बैन लग सकता है.
- दूसरी श्रेणी में हाथापाई करने की सज़ा छह महीने तक का बैन बताई गई है.
- वहीं तीसरी श्रेणी में बात की गई है यात्री के ऐसे व्यवहार की जिससे किसी अन्य के जीवन पर ख़तरा हो, और इसकी सज़ा कम से कम दो साल का बैन हो सकती है.
नियमों के अनुसार किसी यात्री के ख़राब व्यवहार की शिक़ायत मुख्य पायलट के माध्यम से आनी चाहिए जिसपर एयरलाइन कंपनी की आंतरिक कमेटी को जाँच करनी होगी.
इस कमेटी में कोई रिटायर्ड सेशन जज, किसी अन्य विमान कंपनी का प्रतिनिधि और यात्रियों की एसोसिएशन का कोई सदस्य ज़रूर होना चाहिए.
नए नियमों के अनुसार आंतरिक कमेटी को 30 दिन के भीतर फ़ैसला लेना होगा और बताना होगा कि यात्री पर कितने समय का बैन होना चाहिए. यात्री कमेटी के फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील भी कर सकते हैं.
नियम के मुताबिक़ जब तक कमेटी का फ़ैसला नहीं आ जाता, तब तक एयरलाइन कंपनी उस यात्री को अपने विमानों में चढ़ने से रोक सकती है.
'सज़ा को लेकर मनमर्ज़ी'
डीजीसीए यह भी कहता है कि अगर कोई एक विमान कंपनी किसी यात्री को बैन करती है, तो यह ज़रूरी नहीं कि अन्य विमान कंपनियाँ भी उस यात्री को बैन करें.
लेकिन विशेषज्ञों ने इन नियमों की यह कहते हुए आलोचना की थी कि 'सरकार को नो-फ़्लाई लिस्ट में शामिल यात्रियों के बैन की अवधि निर्धारित करनी चाहिए, कंपनी की मर्ज़ी पर यह निर्णय छोड़ देना ग़लत होगा.
क्योंकि छह महीने के बाद सीधे दो साल तक का बैन एक बड़ा अंतराल है. ऐसे में विमान कंपनियाँ किसी की सज़ा को लेकर काफ़ी मनमर्ज़ी कर सकती हैं'.
वहीं एयर पैसेंजर एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया के संस्थापक सुधाकर रेड्डी ने कहा था कि 'सरकार को बिल्कुल साफ़ शब्दों में यह बताना चाहिए कि किस आरोप के लिए कितनी सज़ा होगी. सरकार ने जो प्रस्ताव रखा है, उसी भाषा बहुत गोलमोल है. अगर कोई व्यक्ति किसी से बहस करता है, किसी की निजता का उल्लंघन करता है या ख़राब व्यवहार करता है, तो इसकी क्या सज़ा हो सकती है, सरकार को खुलकर बताना चाहिए. सभी के लिए एक सी सज़ा कैसे हो सकती है?'
हालांकि जो नियम विमान में वीडियो बनाने पर कुणाल कामरा पर लागू होते हैं, वो नियम अर्नब गोस्वामी की टीवी रिपोर्टर पर क्यों नहीं लागू हुए, ये सवाल भी लोग पूछ रहे हैं.
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