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कश्मीर के सियासी मुद्दों पर घाटी के यूट्यूब सितारों की 'ख़ामोशी'
- Author, आमिर पीरज़ादा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, श्रीनगर से
"मेरा नाम मेमे है. यहां इंटरनेट छह महीने से बंद है. तो क्या हुआ? हज़ार तस्वीरें इकट्ठा करूंगा और इंटरनेट शुरू होने पर सभी तस्वीरों को फ़ेसबुक पर अपलोड कर दूंगा."
"मेमे! मेरी तरफ़ देखो. इंटरनेट छह महीने से बंद है तो तुम तस्वीरें क्यों खींच रहे हो? तुम इन्हे कहां पब्लिश करोगे? रेडियो पर या अख़बार में..."
"शुक्र है खुद का, जब से इंटरनेट बंद हुआ है, मेरी आंखें सुकून से हैं. नहीं तो मुझे फ़ेसबुक पर इस मेमे की डरावनी तस्वीरें देखनी पड़तीं."
ये कुछ आवाज़ें हैं कश्मीरी यूट्यूब चैनल 'कश्मीरी कलख़राब' की टीम के साथियों की.
हंसी मज़ाक से भरपूर इस चैनल में सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक मुद्दों पर बात की जाती है.
घाटी में 'कश्मीरी कलख़राब' को पसंद करने वाले लोग बड़ी तादाद में हैं.
'कश्मीरी कलख़राब'
लेकिन अगस्त में जब से कश्मीर में इंटरनेट पर पाबंदी लगी है, 'कश्मीरी कलख़राब' जैसे यूट्यूब प्लेटफ़ॉर्म्स पूरी तरह से खामोश हो गए हैं.
बीबीसी ने हालात को समझने के लिए उन लोगों से समझने के लिए उन लोगों से मुलाक़ात की, जिनका दिमाग इस यूट्यूब चैनल के पीछे लगा हुआ है.
इस यूट्यूब चैनल की शुरुआत साल 2017 में परवेज़ अहमद ने की थी. दो साल के भीतर ही इस यूट्यूब चैनल के फ़ॉलोअर्स की संख्या साढ़े चार लाख पार कर गई.
परवेज़ बताते हैं, "मैंने कश्मीरी लोगों को हमेशा ही उदास और तनाव में देखा है. मैंने ऐसा कुछ करने का फ़ैसला किया जो लोगों की ज़िंदगी में खुशियां लाए. और ये फ़ैसला था यूट्यूब से लोगों का मनोरंजन करना. तो हमें आइडिया खोजने के लिए ज़्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी. फिर हमने हास्य विनोद वाली शैली में इसे पेश किया."
पाँच अगस्त के बाद...
लेकिन 'कश्मीरी कलख़राब' पांच अगस्त, 2019 के बाद एक भी वीडियो पब्लिश नहीं कर पाया है.
ये वो तारीख़ थी जब जम्मू और कश्मीर का स्पेशल स्टेटस ख़त्म कर दिया गया. और तब से ही कश्मीर में इंटरनेट पर पूरी तरह से पाबंदी है.
इन हालात में मजबूर होकर 'कश्मीरी कलख़राब' को श्रीनगर में अपना स्टूडियो बंद करना पड़ा. ये स्टूडियो उन्होंने किराये पर लिया था.
पिछले पाँच महीने में उनकी कमाई ज़ीरो पर पहुंच गई है.
परवेज़ बताते हैं, "अगस्त से पांच महीने तक तो सब कुछ पूरी तरह से बंद था. पूरा कश्मीर ही ठहरा हुआ था, इसलिए हम भी कुछ नहीं कर रहे थे. लेकिन फिर हालात में सुधार होना शुरू हुआ. स्कूल, कॉलेज फिर से खोले गए, लेकिन कश्मीर में इंटरनेट सेवाएं नहीं बहाल हुईं. अब हम सदमे में है, मुझे तनाव से मुक्ति के लिए दवाएं लेनी पड़ रही हैं. ये हमारा मुस्तकबिल था. हम किससे कहें, कोई नहीं समझ पाएगा. अब तो हम किसी से नौकरी भी नहीं मांग सकते."
ब्रॉडबैंड सेवाओं की बहाली
पिछले हफ़्ते कश्मीर में ब्रॉडबैंड सेवाएं बहाल कर दी गईं. लेकिन ये सहूलियत अनिवार्य सेवाएं देने वाली कुछ चुनिंदा संस्थाओं को ही दी गई है. अनिवार्य सेवाएं देने वाली ये संस्थाएं हैं हॉस्पिटल, बैंक, यूनिवर्सिटी और कुछ सरकारी दफ़्तर.
सुप्रीम कोर्ट में इंटरनेट पर पाबंदी को लेकर सवाल उठाए जाने के हफ़्ते भर के भीतर ये ब्रॉडबैंड सेवाओं की बहाली के लिए ये आदेश आया. कोर्ट ने इस फ़ैसले पर पुनर्विचार के लिए कहा था.
पेशे से पत्रकार हिलाल अहमद कहते हैं, "कुछ महकमों के लिए इंटरनेट की बहाली की बात लोगों की भरमाने वाली है. अगर आप वो सरकारी आदेश पढ़ें तो उसमें लिखा है कि इन विभागों को एक नोडल ऑफ़िसर नियुक्त करना होगा जो पासवर्ड नियमित रूप से बदलते रहेंगे और इंटरनेट तक पहुंच रखने वाले लोगों पर नज़र रखेंगे."
"इसके साथ ही मुझे लगता है कि ये आम लोगों पर निगरानी रखने का एक तरीका है. जब आप 80 लाख लोगों के लिए इंटरनेट कियोस्क बना रहे हैं और लोगों को उन कियोस्क के बाहर कतारों में खड़ा कर रहे हैं तो ये एक तरह से आम लोगों पर निगरानी रखना ही है."
परवेज़ कहते हैं कि कश्मीर पर लगी पाबंदी की वजह से वे अपने यूट्यूब चैनल के कॉन्टेंट के बारे में फिर से सोच रहे हैं.
परवेज़ कहते हैं, "हम राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक मुद्दों पर अपने वीडियो बनाते थे. हमें स्थानीय लोगों का समर्थन था लेकिन अब हमें बहुत सचेत रहना है. हमें नहीं लगता कि अब हम कश्मीर के राजनीतिक मुद्दों के बारे में बात कर पाएंगे. क्योंकि सरकार ने इंटरनेट पर पाबंदी लगाकर पहले ही हमारे मुस्तक़बिल का कत्ल कर दिया है. अब मैं अपने यूट्यूब चैनल पर पाबंदी बर्दाश्त नहीं कर पाऊंगा."
कश्मीर में इस समय केवल 301 वेबसाइट ऐसी हैं जिन्हें नई रियायतों के तहत देखा जा सकता है. सरकार के लिए ये व्हाइट लिस्टेड वेबसाइट्स हैं.
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