उषा चौमड़: मैला ढोने वाली बनीं मिसाल

    • Author, सुशीला सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

एक समय अपने सिर पर मैला ढोने वाली राजस्थान के अलवर ज़िले की उषा चौमड़ को बधाई देने के लिए उनके घर लोगों का तांता लगा हुआ है.

वो उन सभी लोगों को लड्डू खिलाने में व्यस्त हैं, जो एक ज़माने में उनकी परछाईं या उन्हें देखकर दूरी बना लिया करते थे.

उषा चौमड़ बताती हैं कि उनके घर वाले बहुत गर्व महसूस कर रहे हैं और उनका कहना है कि उन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि उन्हें कभी इतना बड़ा पुरस्कार पदमश्री मिलेगा.

अपने लंबे सफ़र को याद करते हुए वो कहती हैं कि उन्होंने अपनी मां के साथ सात साल की उम्र में मैला ढोना शुरू किया था. दस साल की उम्र में शादी हुई और 14 साल की उम्र में गौना हो गया. ससुराल में सास, दो ननद, देवरानी और जेठानी के साथ मैला ढोना शुरू कर दिया.

उषा के अनुसार उनके समाज के लोगों के साथ बहुत छुआछूत हुआ करता था, अगर कभी प्यास लगती थी तो पानी भी ऊपर से पिलाया जाता था.

वो बताती हैं कि कुछ घरों से उन्हें इस काम के बदले पुराने कपड़े तो कुछ के घर से रात का बासी खाना, झोली में दूर से डाला दिया जाता था. पगार के तौर पर एक घर के एक सदस्य के एवज़ में 10 रुपए मिलते थे और वो फेंक कर दिए जाते थे. परिवार की औरतें क़रीब 300 रुपए महीने के कमा लेती थी और घर के पुरुष साफ़ सफ़ाई का काम करते थे.

लेकिन साल 2003 में उनके जीवन में बड़ा बदलाव उस समय आया, जब वे सुलभ इंटरनेशनल के संस्थापक डॉ. बिंदेश्वर पाठक से मिलीं.

उन्हें तारीख़ तो याद नहीं है, लेकिन वो बताती हैं कि वो गर्मियों का मौसम था और वे मैला ढोने जा रही थी. बिंदेश्वर जी ने हमें रोका और कहा कि मेरी बात सुनो, हम सब घूंघट में थीं. मैंने सोचा पता नहीं कौन फ़ालतू में बात करना चाहता है और डर भी गए क्योंकि पराए मर्दों से हम बात नहीं करते थे. उन्होंने फिर टोका.

हमें बात करने का सलीका तो नहीं था और हमने सोचा नेता होंगे जो बिजली, पानी की बात करेंगे. हमने कहा अच्छा जल्दी बताओ हमें मैला ढोने जाना है. उन्होंने कहा कि ये काम क्यों कर रहे हो, कितने पैसे मिलते हैं. हमने कहा कि हमारे पुरखे सालों से ये काम करते आ रहे हैं हम कैसे छोड़ दें.

वो भावुक हो गए और कहा कि तुम्हारे घर का काम कैसे चल जाता है. फिर उन्होंने हमें समझाने की कोशिश की. हमने कहा कि आप चलिए और देखिए हम कैसे रहते हैं. वो आए और उन्होंने हमें दिल्ली आने का न्यौता दिया और कहा कि तुम लोग और कोई काम करना पसंद करोगे.

हमने कहा करेंगे लेकिन पैसे कितने मिलेंगे, उन्होंने कहा मैं तुम लोगों के लिए संस्था खोलूंगा और 1500 रुपए महीने दूंगा.

उषा डॉ. बिंदेश्वर की संस्था 'नई दिशा' से अलवर में जुड़ीं और वहां काम करना शुरू किया. उन्होंने जानकारी दी कि गांववाले परेशान थे कि अगर हम ये काम छोड़ देंगे तो उनके घर का मैला कौन ढोएगा. पहले मेरे घरवालों ने भी थोड़ी हिचक दिखाई लेकिन बाद में वे भी मान गए.

वो बताती हैं कि पहले समूह में 28 महिलाएँ गईं. हमें सेवई, पापड़, दीए की बाती, सिलाई, कढ़ाई और जूट का बैग बनाने का काम दिया गया. लेकिन जब हम सेवई और बत्तियां बनाते तो उनका रंग काला पड़ जाया करता था.

उन्होंने आगे बताया कि हम बिना नहाए जाते थे, हमें सुबह नहाने की आदत नहीं थी क्योंकि दिन में मैला ढोने का काम करते थे. हमें संस्था की दीदी सुमन चाहर ने समझाया कि तुम बिना नहाए, बिना बाल बनाए क्यों आती हो और अगर साफ़ सुथरी होकर नहीं आओगी तो काम नहीं करने दिया जाएगा.

नई दिशा की निदेशक सुमन चाहर का कहना है कि उषा को पद्मश्री मिलना ऐसा है मानो जैसे उन्हें ही ये सम्मान मिल गया हो. वे बताती है मैला ढोने वाली 115 महिलाओं को प्रशिक्षण दिया गया है और उनका पुनर्वास किया गया है.

इसी काम के ज़रिए उन्हें अमरीका, पेरिस और दक्षिण अफ्रीका जाने का मौक़ा मिला. जब वे न्यूयॉर्क में कैटवॉक करने का ज़िक्र करती हैं और उनकी आवाज़ में अलग ही खनक सुनाई पड़ती है.

वे गर्व से बताती हैं कि हमने साड़ियां पहनीं और उसके बॉर्डर की कढ़ाई हमने ही की थी. वो खिलखिलाते हुए बताती हैं कि हम 36 महिलाओं जिसमें मेरी देवरानी और जेठानी शामिल थी सबने बड़ी ठुमक ठुमक के कैटवॉक किया.

वो सुलभ संस्था के ज़रिए ही प्रधानमंत्री से मिलकर उन्हें कई बार राखी बांध चुकी हैं और स्वच्छता अभियान के साथ जुड़कर बनारस स्थित अस्सी घाट की साफ़ सफ़ाई में भी योगदान दे चुकी हैं.

उषा मानती हैं कि पढ़ाई जीवन के लिए सबसे अहम हैं. उनके तीन बच्चे हैं, दो बेटे नौकरी करते हैं और लड़की बीए कर रही है जो अपनी मां की तरह एक अलग मुक़ाम हासिल करने का ख़्वाब रखती है.

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